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Home इतिहास होशंगाबाद के बारे में

होशंगाबाद के बारे में

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नाम की व्युत्पत्ति
जिले का नाम इसके मुख्यालय नगर होशंगाबाद पर रखा गया है, जिसकी स्थापना मांडू (मालवा) के द्वितीय राजा सुल्तान हुशंगशाह गौरी द्वारा पन्द्रहवी शताब्दी के आरंभ में की गई थी.

स्थिति
होशंगाबाद जिला मध्य नर्मदा घाटी तथा सतपुड़ा पठार के उत्तरी उपांत पर स्थित है यह 21 अंश 54 मिनिट तथा 22 अंश 59 मिनिट के समानांतर तथा 76 अंश 46 मिनिट तथा 76 अंश 42 मिनिट शिरो बिंदुओं के बीच स्थित है.

सीमाएं
नर्मदा नदी जिले की उत्तरी सीमा के साथ-साथ बहती है. इसकी सहायक नदी दूधी जिले की उत्तरी पूर्वी सीमा का निर्माण करती है. रायसेन, सीहोर, देवास जिले इस जिले के उत्तर में नर्मदा पार पूर्व से पश्चिम में क्रमश: स्थित है. बैतूल जिला दक्षिण में स्थित है. पूर्व में हरदा जिला है. नरसिंहपुर और छिंदवाड़ा जिले क्रमश: उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व सीमाओं से लगे हुए हैं.

प्रशासनिक संरचना
जिले को सात तहसीलों अर्थात होशंगाबाद, बाबई, इटारसी, सोहागपुर, बनखेड़ी, पिपरिया और सिवनीमालवा में विभाजित किया गया है, जो क्रमश: पूर्व से पश्चिम में स्थित है.
इनका प्रशासन तहसीलदार द्वारा किया जाता है.
जिले में कुल चार अनुविभाग होशंगाबाद, इटारसी, पिपरिया और सिवनीमालवा है.
जिनका प्रशासन अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा किया जाता है.
जिले में सात विकासखंड होशंगाबाद, बाबई, केसला, सोहागपुर, बनखेड़ी, पिपरिया तथा सिवनीमालवा है. केसला आदिवासी विकासखंड है.
जिले में कुल 922 गांव और 391 ग्राम पंचायतें, 7 जनपद पंचायत और 14 राजस्व निरीक्षक मंडल हैं.

मुख्य फसलें
रबी फसल : गेहूं, चना, अलसी
खरीफ फसल : सोयाबीन, धान, अरहर.
नोट - होशंगाबाद जिला - एक परिचय ''होशंगाबाद विकास का एक दशक 1993-2003'' जनसंपर्क मध्यप्रदेश से संकलित.

जनसंख्या
जिले का क्षेत्रफल 4,508.23 वर्ग किलोमीटर है. कुल जनसंख्या 10 लाख 85 हजार 11 है. क्षेत्रफल की दृष्टि से यह प्रदेश का औसत आकार का जिला है.

जिला इकाई तथा घटकों का इतिहास
उन्तिवाटिका ताम्रलेख के अनुसार जिला का पूर्वी भाग, विशेषकर सोहागपुर के आसपास का भाग लगभग सातवी शताब्दी में मानपुर नामक स्थान के राष्ट्रकूट वंशीय राजा अभिमन्यु के अधिकार में था. उदय वर्मा के भोपाल शिलालेख में ई. सन् 1199 में विन्ध्य मंडल में नर्मदापुर प्रतिजागरणक के ग्राम गुनौरा के दान में दिये जाने का उल्लेख है. इससे तथा देवपाल देव (ई. सन् 1208) के हरसूद शिलालेख से यह पता उल्लेख है कि जिले के मध्य तथा पश्चिमी भागों पर धार के राजाओं का अधिकार था. मध्यकाल में इस क्षेत्र का ऐतिहासिक अभिलेखों में पहले-पहल उल्लेख मालवा के सुल्तान हुशंगशाह गौरी (ई. सन् 1405 और आगे) के राज्य के दौरान मिलता है, जिसमें होशंगाबाद में एक छोटे दुर्ग का तथा दो अन्य दुर्गों का हंडिया तथा जोगा में निमार्ण करवाया था. बैतूल के समीप स्थित खेडला के राजा के विरूध्द अपने आक्रमण अभियानों में वह सदैव हरदा तथा होशंगाबाद के मार्ग से ही प्रयाण करता रहा. 1567 में मांडू के पतन के पश्चात मालवा मुगल साम्राज्य का सूबा बना दिया गया. हरदा से 21 किमी उत्तर में स्थित हंडिया सरकार की गददी था और उसके महल नर्मदा के दक्षिण में स्थित सिवनी-मालवा, हरदा तथा बिछौला थे. तथापि नर्मदा के पार होशंगाबाद मुख्यालय के उत्तर-पश्चिम में स्थित गिन्नौरगढ़ का दुर्ग गढ़ा मंडला के गौड राजाओं के अधीन ही बना रहा.

अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह जिला सात राजनैतिक संभागों में विभक्त किया गया. सिवनी और हरदा तहसीलों के उत्तरी भाग हंडिया के मुसलमान फौजदार के अधीन थे, जबकि पूर्वी भाग के राजबाड़ा परगना पर चार राजाओं का अधिकार था, गढ़ा मंडला केगौड साम्राज्य के सामंत थे. उस समय होशंगाबाद भी गिन्नौर के अधीन था. बाबई सहित बागरा हवेली, सोहागपुर तहसील में बागरा किले के राजा के अधिकार में थी और वे देवगढ़ (अब छिंदवाडा जिले में) के राजा के अधीन थे, जिसके अधिकारी तरोन में रहते थे, सांवलीगढ़ (जो अब बैतूल जिले में) के राजा का सिवनी तथा हरदा तहसीलों के कुछ भागों पर शासन था. राजा का अधीनस्थ अधिकारी रहटगांव में तैनात किया गया था. कालीभीत के राजा (जो पहले से ही मकड़ाई में रहने लगा था) का पूर्वी निमाड़ की कालीभीत पहाड़ियों, हरदा तहसील के चारवा परगना के अधिकांश भाग तथा तत्कालीन मकडाइ रिसायत पर अधिकार था.
ईसवी सन् 1722 में गिन्नौरगढ़ का भू-भाग जिसमें होशंगबाद का दुर्ग भी शामिल था, इस्लामनगर के नबाव तथा भोपाल राजवंश के संस्थापक दोस्त मोहम्मद खान के अधिकार में चला गया. पेशवा बालाजी ने गंजाल नदी के पश्चिम में स्थित हंडिया सरकार (ई.सन् 1742 में) पर अधिकार कर लिया और वहां के मुसलमान सूबेदार को हटाकर अपना स्वयं का आमिल नियुक्त कर दिया और उसने ई.सन् 1750 में कालीभीत (मकडाई) के राजा को ई.सन् 1750 की संधि द्वारा पेशवा को आधे गांव प्रदान करने के लिए बाध्य किया. 18वीं शताब्दी के अंत-अंत में यह क्षेत्र सिधिया को सौंप दिया गया. गंजाल के पूर्व में स्थित सिवनी-मालवा होशंगाबाद तथा सोहागपुर तहसीलों में आने वाली शेष रियासतों पर धीरे-धीरे ई.सन् 1740 तथा 1755 के मध्य नागपुर के भोंसला राजा का अधिकार होता गया. भंवरगढ़ के उसके सूबेदार बेनीसिंह ने 1796 में होशंगाबाद के किले पर भी अधिकार कर लिया. 1802 से 1808 तक होशंगाबाद तथा सिवनी पर भोपाल के नबाव का अधिकार हो गया, किंतु 1808 में नागपुर के भोंसला राजा ने अंतत: उस पर पुन: अधिकार कर लिया.

वर्ष 1817 के अंतिम अंग्रेज-मराठा युध्द में होशंगाबाद पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तथा उसे सन् 1818 में अप्पा साहेब भोंसला द्वारा किए गए अस्थायी करार के अधीन रखा गया. सन् 1820 में भोंसला तथा पेशवा द्वारा अर्पित जिले सागर, तथा नर्मदा भू-भाग के नाम से समेकित कर दिए गए तथा उन्हें गवर्नर जनरल के एजेंट के अधीन रखा गया, जो जबलपुर में रहता था. उस समय होशंगाबाद जिले में सोहागपुर से लेकर गंजाल नदी तक का क्षेत्र सम्मिलित था तथा हरदा और हंडिया सिंधिया के पास थे. सन् 1835 से 1842 तक होशंगाबाद, बैतूल तथा नरसिंहपुर जिले एक साथ सम्मिलित थे, और उनका मुख्यालय होशंगाबाद था. 1842 के बुंदेला विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें पहले की तरह पुन: तीन जिलों में विभक्त कर दिया गया तथा उनके सामान्य प्रभारी अधिकारियों के पदनाम बदलकर एजेंट के सहायक के स्थान पर डिप्टी कमिश्नर कर दिये गये.सन् 1844 में हरदा हंडिया क्षेत्र के भाग के रूप में अंग्रेजों को सौंप दिया गया तथा उसे होशंगाबाद जिले से संबंध्द कर दिया गया, जो अंतिम रूप से सन् 1860 में सौंप दिया गया. नर्मदा के उत्तर में स्थित नेमावर परगना, जो सन् 1844 में सौंप दिया गया था, सन् 1860 में सिंधिया को लौटा दिया गया. हरदा तहसील का कालीभीत भू-भाग सन् 1905 में पूर्वी निमाड़ की हरदा तहसील को अंतरित कर दिया गया.

चार्ल्स इलियट के 30 वर्षीय बंदोबस्त (1865) के पूर्व जिले के प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए 42 तालुकों में विभाजित किया गया था. ऐसे छोटे अधीनस्थ उप संभागों से बचने के लिए इस बंदोबस्त में तालुकों को छह परगनों में विभाजित किया गया था, जो पूर्व से पश्चिम की ओर स्थित थे, जिसके नाम राजवाड़ा, सोहागपुर होशंगाबाद, सिवनी, हरदा तथा चाखा थे, तथापि इनके स्थान पर शीघ्र ही चार तहसीलों अर्थात सोहागपुर, होशंगाबाद, सिवनी और हरदा का वर्तमान विभाजन लागू कर दिया गया. लगभग 1951 में पमचढ़ी को तहसील बना दिया गया, .किंतु बाद में पहले की भांति उप-तहसील बना दिया गया और वहां अतिरिक्त तहसीलदार नियुक्त किया गया.
सन् 1932 में नरसिंहपुर जिले को उप संभाग के रूप में होशंगाबाद में मिला दिया गया. 1 अक्टूबर, 1956 को इसे पुन: अलग कर दिया. तवा नदी परियोजना का कार्य तेजी से आगे बढ़ाने की दृष्टि से 1972 में इसे एकल जिला संभाग घोषित किया गया, जिसका मुख्यालय पहले भोपाल रखा गया फिर होशंगाबाद स्थानांतरित किया गया.

म.प्र जिला गजेटियर, होशंगाबाद, अध्याय एक सामान्य, पृष्ठ 1-3
 

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