अभा साहित्य परिषद ने दी माणिक वर्मा को श्रद्धांजलि

इटारसी। बिजली का खंभा तथा मांगीलाल और मैंने जैसे कॉलजयी व्यंग्य लिखने वाले व्यंग्यकार माणिक वर्मा के निधन पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद नर्मदापुरम संभाग ने ईश्वर रेस्टोरेंट सभागार में एक श्रद्धांजलि सभा की जिसमें शहर के कवि, व्यंग्यकार और साहित्यकारों की साथ उनके प्रशंसकों की उपस्थिति रही।
वरिष्ठ कवि माणिक वर्मा के निधन पर साहित्य प्रेमियों ने उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की। शहर के साहित्य जगज के राजेंद्र मालवीय, चंद्रकांत अग्रवाल, विनोद कुशवाहा ने दीप प्रज्वलित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। उपस्थित अन्य साहित्य प्रेमियों ने भी पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि दी। आलोक शुक्ल ने कहा कि कल महफिलों में थे, आज वीराने में, जिसने सारी उम्र गुजारी सबको हंसाने में। बृज मोहन सोलंकी में भावांजलि देते हुए कहा कि समुद्र मंथन किया तो निकले रत्न अनेक, पर व्यंग समुद्र का मथा गया तो निकला माणिक एक। चंद्रकांत अग्रवाल ने कहा की माणिक वर्मा यहां शहर में टेपा सम्मेलन में चार बार आए जबकि सम्मेलन में शामिल होने वाले कवि को केवल एक बार बुलाने की परंपरा थी। यह बात उनके सफल व्यंग्यकार होने का प्रमाण है। ब्रजकिशोर पटेल ने कहा कि व्यंग डंक की तरह होता है। व्यंग में आक्रोश होता है, प्रहार होता है। माणिक वर्मा की कविताएं व्यंग्य की इसी कसौटी पर खरी उतरती हैं। उन्होंने वर्मा के कालजयी व्यंग्य मुक्तक कहा कि, कायरता जिस चेहरे का श्रृंगार करती है, मक्खियां भी उस पर बैठने से इंकार करती हैं। विनोद कुशवाहा ने कहा कि माणिक वर्मा का साहित्यिक जीवन गजलकार के रूप से आरंभ होकर व्यंग्यकार के रूप में समाप्त हुआ। माणिक वर्मा जैसा देखते थे, वैसा लिखते थे। राजेंद्र मालवीय ने कहा माणिक वर्मा ने जिंदगीभर आम आदमी की पीड़ा को व्यंग के रूप में प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी। उनके जाने से व्यंग के क्षेत्र में काफी बड़ी रिक्तता आई है।
श्रद्धांजलि सभा में एसआर धोटे, प्रमिला मेहरा, भगवानदास बेधड़क, रामकिशोर नाविक आदि ने भी भावों के रूप में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। संचालन संचालन राजकुमार दुबे ने एवं आभार ब्रज किशोर पटेल ने माना। कार्यक्रम में जीपी दीक्षित, रामशंकर मेहतो, विनय चौरे, दिनेश सिंह, देवेंद्र सोनी, विकास उपाध्याय, सतीश पाराशर, आनंद दीवान, बाबू चौधरी आदि की उपस्थिति रही।

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