आज बापू होते तो…!

गांधी जयंती पर हमारी भूमिका सवालों के घेरे में

गांधी जयंती पर हमारी भूमिका सवालों के घेरे में
आज देश ही नहीं अपितु विश्व में विभिन्न स्थानों पर गांधी जयंती मनाई,बापू के आदर्शों और विचारों पर भाषण, सभाएं, रैलियां, भजन-कीर्तन आदि हुए, प्रतिमाओं पर फोटो पर फूल-माला चढ़ाए, संगोष्ठियां हुईं, पर इन सब के बीच सभी लोग उन बातों को तो भूल ही गये जो असल में बापू की जयंती मानने और उन्हें अपने सच्चे श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए जरूरी है।
शहर में एकमात्र गांधी प्रतिमा के आमदिनों के हालात की बात करें तो वहां न ही कोई माला चढ़ाने जाता है और ना ही प्रतिमा की धूल साफ करने। स्वच्छता का संदेश देने वाले गांधी की प्रतिमा गंदगी में ही रहती है। आज जब देश में स्वच्छता अभियान चलाये जा रहे हैं तो एक और बात हास्यास्पद सी लगती है और वो यह कि, जयंती की वजह से बापू के आसपास की सफाई करके उन्हें तो साफ सुथरा कर दिया परंतु शहर में लगी अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं धूल से घिरी हैं, यहां सफाई के लिए इनकी जयंती या पुण्यतिथि का इंतजार है। बस स्टेंड पर लगी सुभाषचंद्र बोश् की प्रतिमा पर से तो महीनो पुरानी सड़ी-गली माला भी किसी ने उतारने की सुध नहीं ली। इन सब के लिए केवल नेता, अधिकारी या विभाग जिम्मेदार नहीं हैं अपितु वे सब लोग भी हैं जिन्होंने आज अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स पर बापू के प्रति प्यार जताया। बापू खुद कहते थे कि किसी भी देश को साफ रखना सिर्फ वहां के प्रशासन, नेता या अधिकारी के वश में नहीं है अपितु देश की जनता का भी कर्तव्य है कि वे किसी की परवाह किये बिना स्वयं आगे आयें और देश को अपना घर समझकर साफ-सुथरा रखें। कुछ हद तक इन सब में अधिकारी, नेता और विभाग जिम्मेदार हैं क्योंकि उनका तो ये कार्य है कि वे सभी जगह को साफ-सुथरा रखें पर हमारी मानसिकता सिर्फ किसी त्यौहार को मनाने की रह गयी है न की उसे मनाने से मिलने वाली सीख को अपनाने से। बापू ने सर्वप्रथम यह कहा था कि अगर भारत की जनता को स्वस्थ रहना है तो स्वच्छता करनी होगी और वो भी किसी पर आश्रित होकर नहीं अपितु स्वविवेक से। परंतु लोग सिर्फ उनके जन्मदिन की तारीख याद रखे हुए हैं उनके आदर्शो और विचारों को नहीं। ये आदर्श या विचार केवल भाषणों में दिखते हैं। हालांकि इस बात पर एक बड़ी बहस हो सकती है, कि गांधी जयंती के पूर्व ही चलाये गये स्वच्छता पखवाड़े में सिर्फ गांधी जी के आसपास ही सफाई की जायेगी, बाकि महापुरुषों को सिर्फ उनके स्मरण दिवसों पर ही याद किया जायेगा। अगर देखा जाये तो यह हालात सिर्फ इटारसी शहर के ही नहीं है बल्कि संपूर्ण जिले, प्रदेश और शायद देश के भी है। प्रत्येक शहर में कही न कही कुछ जगहें तो आपको ऐसी दिख ही जायेगी जहां ऐसी ही किसी प्रकार की गंदगी होगी।
आज जिले को प्रदेश के मुखिया ने खुले में सोच से मुक्त घोषित किया है जिसके लिए सभी अधिकारी, प्रशासन और विभाग बधाई के पात्र हैं परंतु शहर में सुबह से ही प्रभात फेरी निकली, सभी पार्टियों के नेता और विभागों के अधिकारियों ने बापू की प्रतिमा पर पुष्प-माला चढ़ाएं, दीप जलाये, बापू के जीवन से जुड़े छोटे बड़े किस्से और भाषण देकर खूब वाहवाही बटोरी पर किसी भी जगह जाकर बापू के आदर्शों या विचारों से जुडी किए बात को अमल में नहीं लाया। हो सकता है आजकल जमाना बादलने से लोगों के पास समय का अभाव है और लोग अपना समय इन सब बातों पर खर्च कर सकते हो पर बापू द्वारा बताये किसी नेक काम को करने में असमर्थ। कुछ लोगों के लिए तो आज का दिन पब्लिक हॉलिडे की तरह निकला, वे सभी आज देर तक सोये होंगे, परिवार के साथ वक्त बिताया होगा, या जरूर कहीं घूमने भी गये होंगे, पर रात को वही लोग घर आकर न्यूज़ चैनल देखकर या फिर कल सुबह अख़बार पढ़कर टिप्पणी करने से नहीं चूकेंगे क्योंकि सिर्फ एक यही कार्य है जिसमें सभी लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और सभी एक दूसरे की बात को काटे बिना अपने विभिन्न प्रकार के विचारों को सबके साथ साझा करते हैं। ऐसे लोग सिर्फ सोशल मीडिया पर या टिप्पणी करके किसी भी प्रकार से बापू को खुश नहीं कर सकते, और तो और अगर बापू होते तो इनके साथ बैठना भी पसंद नहीं करते। क्योंकि किसी को भी ये बात अच्छी नहीं लगेगी कि उसे सिर्फ किसी एक विशेष दिन याद किया जाये, पूछा जाये और बाकी दिनों में उसकी तरफ आंख उठाकर भी न देखा जाये।

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Narmadanchal

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