कविता : प्रकृति की रंगपंचमी

कविता : प्रकृति की रंगपंचमी

माँ …
होली निकल गई
साथ ही
निकल गया
होली का त्यौहार भी
पर माँ …
होली के रंग तो …..
बहुत पहले ही
पीछे छूट गए थे
वे रंग
जो अब फीके पड़ गए हैं
वे रंग
जो अब बदरंग हो गए हैं
ठीक इसी तरह
रंगपंचमी भी बीत गई
शेष रह गया है तो बस
पांच दिन का ‘ सूनापन ‘
माँ …
कहां खो गया प्रेम
कहां खो गए दोस्त
नहीं रह गईं
हंसती खिलखिलाती भाभियां
कमर में जिनकी झूला करतीं थीं
हमेशा घर की चाबियां
ताक में रखी देतीं थीं
अपनी लाज – शर्म
और
फिर देतीं थीं
रंगबिरंगी गालियां
माँ …
अब
घरों में भी
कहीं नहीं दिखाई देतीं
वे उद्दंड सालियां
सूने पड़े रह गए
रास्ते
सूनी पड़ी हैं
गलियां
अब कोई राधा वल्लभ
नहीं खेलता
पड़ोसन के साथ होली
न ही कोई
खाता है
भांग की प्रेम भरी गोली
सुनो न माँ …
मैं भी
अब
वैसा नहीं रह गया
जो
तुम्हारे रोकने-टोकने के बाद भी
दिन भर
रंग से
सराबोर रहता था
पूरे पांच दिन
रंगों में ही
डूबा रहता था
माँ …
अब मैं
होली पर
रहता हूं अकेला
कर लेता हूं बन्द
अपने को
कमरे में
हाथ में रहता है मोबाईल
सामने टी वी
टेबल पर कंप्यूटर
पलंग पर
अरुंधति की किताब
‘ मामूली चीज़ों का देवता ‘
नेपथ्य में गूंजते
किसी के
ठहाके
किसी का
खिलखिलाना
नहीं दिखाई देता कहीं
वो प्रेम
न ही रह गए हैं
वे दोस्त
न ही रहीं
वो भाभियां
न रहीं
वे सालियां
और
न ही रहा
पड़ोसन के साथ
होली खेलने वाला
वो राधा वल्लभ भी ।

– विनोद कुशवाहा, 96445 43026

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