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बहुरंग : समुद्र ही चाहिए …

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– विनोद कुशवाहा

मैंने कब लिखना शुरू किया यह पूरी तरह से याद नहीं। शायद नवमीं में रहा होऊंगा। फिर भी शुरुआत तब से ही मानता हूं। इसका पूरा श्रेय मेरे गुरु उमाशंकर जी शुक्ल को जाता है। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से ही मेरे पढ़ने लिखने का शुभारंभ हुआ। जो आज तक जारी है। जितना मैंने लिखा नहीं उससे कहीं ज्यादा पढा है। इटारसी की शायद ही कोई लायब्रेरी मुझसे छूटी ही। मैंने पिछली बार पाठकों को बताया था कि पढ़ने में मेरी रुचि का कारण मेरी माँ ही रहीं। वे बहुत अध्ययनशील थीं। तो शुरुआत घर से ही हुई और स्कूल में उसको शुक्ला जी ने गति प्रदान की। जहां तक लिखने का प्रश्न है मैं मूलतः कहानीकार हूं। कवितायें मैंने बहुत कम लिखीं हैं। इसलिए मैं स्वयं को कवि नहीं मानता। बावजूद इसके मेरे चार काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक प्रकाशनाधीन है। मेरी पहली रचना साहित्यिक पत्रिका ‘ क्षितिज ‘ में प्रकाशित हुई और पहला संयुक्त काव्य संग्रह वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र सोनी के संपादन में ” उमड़ते मेघ पीड़ाओं के ” शीर्षक से निकला जिसका विमोचन मशहूर शायर कैफ भोपाली ने किया था। इस सबका सम्बन्ध उस बात से है जो मैं आगे कहने जा रहा हूं। अन्यथा अपने बारे में इतनी बकवास मैं कभी करता नहीं।
‘ बहुरंग ‘ में प्रस्तुत कविता उपरोक्त काव्य – संग्रह से ही ली गई है। इसे मैं अपनी *हस्ताक्षर कविता* मानता हूं क्योंकि इसी कविता से मेरी पहचान बनी जबकि मैं कथाकार था और कविताओं से कहीं अधिक मेरी कहानियां प्रकाशित हुई हैं। प्रसारित हुई हैं। …लेकिन इससे मेरी प्रसारित अथवा प्रकाशित कविताओं का महत्व कम नहीं हो जाता। अस्सी के दशक में तो मेरी दो नई कवितायें अविभाजित सोवियत रूस से भी प्रकाशित हुईं। पिछले दिनों ” श्री प्रेमशंकर दुबे स्मृति पत्रकार भवन ” में आयोजित एक कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि सुनील जनोरिया ने अपने उद्बोधन में इसका विशेष रूप से उल्लेख किया था। मेरी एक अन्य प्रतिनिधि कविता ‘ चाँद और रोटी ‘ को तो अपार लोकप्रियता मिली। इस कविता का अनुवाद भी विभिन्न भाषाओं में किया जा रहा है । साथ ही निकट भविष्य में इसके स्कूली पाठ्यक्रम में सम्मिलित् किये जाने की संभावना भी है। कुछ माह पहले इस कविता का प्रसारण मेरे ही स्वर में मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के समस्त आकाशवाणी केंद्रों से किया गया थ । खैर । अब बात ” समुद्र ही चाहिए ” कविता की जो युवा पत्रकार राजेश दुबे की पहली पसंद है। साथ ही ‘ उमड़ते मेघ पीड़ाओं के’ कविता संग्रह की भूमिका लिखते हुए ये निमाड़ के सुविख्यात कवि स्व. श्रीकांत जोशी की भी पसन्द बन गई। उन्होंने अपनी भूमिका में लिखा भी – ” श्री विनोद कुशवाहा ‘अमित’ की पंक्तियों में , मैं सभी कवियों की आभा देखना चाहता हूं –

मुझे तो
उमड़ता लहराता
उछाल मारता
समुद्र ही चाहिये
भले ही जिसका पानी खारा हो । “

तो ऐसी है ‘बहुरंग’ में अंग्रेजी एवं मराठी भाषा में अनुवादित प्रस्तुत कविता। मैं यह कहते हुए स्वयं को बेहद गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूं कि इस कविता का अनुवाद विपिन पंवार ने किया है जो मेरे मित्र ही नहीं बल्कि मुम्बई में उप महाप्रबंधक, राजभाषा , मध्य रेलवे हैं। उनके अनुवाद को मुम्बई ही नहीं बल्कि देश के जाने – माने भाषा विशेषज्ञों ने अनुमोदित किया है। विपिन पंवार स्वयं भी कवि , कथाकार एवं लेखक हैं। उन्होंने विभागीय पत्रिका के अलावा अन्य साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। उनकी रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनके मन में एक उपन्यास की रूपरेखा है जो आत्मकथ्यात्मक भी हो सकता है। अभी तो वे अपने शासकीय दायित्वों के निर्वहन के साथ – साथ अपने आसपास के चरित्रों पर लिख रहे हैं । फिलहाल प्रस्तुत है उनके द्वारा अनुवादित कविता। उल्लेखनीय है कि भाई विपिन पंवार ने इस हेतु “नर्मदांचल” को प्राथमिकता दी जिसके लिये मैं ‘ नर्मदांचल परिवार ‘ की ओर से उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।

0 नई कविता

समुद्र ही चाहिए …

नहीं चाहिए
मुझे वह मिठास
जो
तुम्हारे अंदर
जमी है
सूखी नदी बन
मेरे लिए
मुझे तो
उमड़ता , लहराता
उछाल मारता
समुद्र ही चाहिए
भले ही
जिसका पानी खारा हो ।

– विनोद कुशवाहा, इटारसी (म. प्र.) 

I don’t want
that sweetness
which is frozen
inside you
it’s turns into
a dry river for me
the only thing
I desire is
an overflowing
leaping , roaring sea
even though
it comes with
it’s salty wate .

Translated by –
– Vipin Panwar
Dy. GM, Rajbhasha
Central Railway
Mumbai ( MAHARASHTRA ) .

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नको मला
तो गोड़वा
जो तुझ्या मनात
गोठला आहे
माझ्या साठी
कोरड्या नदी सारखा
मला तर
ओसंडून वाहणारा
लहरी, उसळणारा
गरजणारा
समुद्रच हवा
जरी असो
त्याचं पाणी खारट .

हिंदी से मराठी में अनुवाद – विपिन पंवार

विपिन पंवार
उप महाप्रबंधक, राजभाषा, मध्य रेलवे,
मुख्यालय मुंबई ( महाराष्ट्र )
विनोद कुशवाहा, इटारसी (म. प्र.) 
vipin pawarvinod kushwah
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