विवेक की कप्तानी में इंडिया ने मलेशिया में जीता पहला मैच

सुल्तान ऑफ जौहर कप में जापान को दी शिकस्त गांव में जीत की मनायी खुशियां गांधी मैदान पर भारत की जीत में जश्न मनाते साथी खिलाड़ी

सुल्तान ऑफ जौहर कप में जापान को दी शिकस्त
गांव में जीत की मनायी खुशियां
गांधी मैदान पर भारत की जीत में जश्न मनाते साथी खिलाड़ी
इटारसी। एक छोटे से गांव से निकले लड़के ने मलेशिया में जाकर देश का डंका बजाया। न सिर्फ देश को गर्व करने का मौका मिला बल्कि इटारसी जैसे शहर को भी खुशियां मनाने का अवसर दिया है। मलेशिया में सुल्तान ऑफ जौहर कप के पहले मैच में इटारसी के पास शिवनगर चांदौन के विवेक के नेतृत्व में अंडर 19 भारतीय टीम ने जापान को 3-2 की शिकस्त दी। टीम की जीत ने जहां देश को खुशियां मनाने का अवसर दिया वहीं विवेक के साथी खिलाडिय़ों ने भी दोपहर में मैच देखा और उसकी जीत पर खुशियां मनायीं। विवेक के गांव में तो कई घंटे जश्न का माहौल रहा।
यहां गांधी मैदान पर विवेक के साथी हॉकी खिलाडिय़ों ने आतिशबाजी करके भारत की जीत का जश्न मनाया और ढोल की थाप पर जमकर नाचे। सीएम एकेडमी में खिलाडिय़ों को कोचिंग देने वाले सीनियर खिलाड़ी कन्हैया गुरयानी ने कहा कि इस शहर को हॉकी की नर्सरी कहा जाता है, यहां से अच्छे खिलाड़ी निकलते हैं, यह बात साबित हो गई है।
इटारसी से 15 किलोमीटर दूर आदिवासी ब्लॉक केसला में आर्डनेंस फैक्ट्री एस्टेट के पास है, गांव शिवनगर चांदौन। यहां के विवेक सागर के नेतृत्व में भारतीय टीम मलेशिया में सुल्तान ऑफ जोहर कप के लिए गई है। विवेक में हॉकी का जुनून इस कदर है कि एक वक्त उसके पास खेलने के लिए हॉकी स्टिक और जूते नहीं होते थे। दोस्तों से स्टिक-जूते लेकर बड़े मैच के लिए अभ्यास करता था।
विवेक के पिता रोहित प्रसाद प्राइमरी स्कूल में सहायक शिक्षक हैं। परिवार गरीब है और शीट की छत वाले छोटे से घर में रहता है। इसी घर से निकला है भारतीय जूनियर हॉकी टीम का कप्तान विवेक सागर प्रसाद। उसके पिता रोहित प्रसाद ने बताया कि वे विवेक को इंजीनियर बनाना चाहता थे, और विवेक के हॉकी खेलने के खिलाफ थे। विवेक की मां कमला देवी बताती हैं कि बेटे की पिटाई नहीं हो इसलिए कई बार उसके पिता से झूठ बोलना पड़ा। वो घर नहीं आता तो कह देती सब्जी लेने गया है। जब विवेक देरी से आता तो बहन पूजा उसे दूसरे दरवाजे से घर के भीतर लेकर आती थी। भाई विद्यासागर से दोस्त कहते थे कि यह बहुत आगे जाएगा तो फिर उन्होंने पापा को भरोसे में लिया और साईं हॉस्टल के लिए राजी किया, फिर अकादमी के लिए। उसकी सफलता देखकर लगता है मेहनत सफल हुई, लेकिन अभी यह शुरुआत है।

माता-पिता ने आज देखा मैच
विवेक अपनी टीम में मिड फील्ड सेंटर हाफ पोजीशन पर तेजी से गेंद लेकर चलता है तो दर्शक मानकर चलते हैं कि विरोधी टीम पर गोल तय है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि विवेक के माता, पिता, भाई ने अब तक विवेक को मैदान पर खेलते हुए नहीं देखा था। उन्होंने आज ही उसे जापान के साथ मैच देखा है। आर्डनेस फैक्ट्री निवासी खिलाड़ी सोनू अहिरवार ने विवेक को हॉकी के लिए प्रेरित किया। सोनू कहते हैं मुझे तो भरोसा था, इसीलिए 8 साल की उम्र से ही उसे हॉकी थमा दी थी। टीकमगढ़ साईं हॉस्टल ले गया।

अशोक ध्यानचंद ने प्रतिभा को पहचाना
अकोला में एक टूर्नामेंट के दौरान मशहूर हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद की नजर विवेक पर पड़ी। उन्होंने उसका नाम पता लिया और फिर अपने पास बुलाया। कुछ दिनों तक अपने घर में ही ठहरवाकर उसका मन हॉकी के लिए तैयार किया। आज वे बहुत खुश हैं। कहते हैं, लाखों में ऐसा खिलाड़ी निकलता है जिसका मैदान पर अलग विजन होता है, ऐसा है विवेक।

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