इटारसी।ग्राम सेवा समिति निटाया एवं छेड़का द्वारा रविवार को ईश्वर रेस्टॉरेंट में लगाए जैविक कृषि उत्पाद बाजार में अनाजों में गेहूं, चावल, चना, मूंग, उड़द, तुअर दाल, अलसी, कुटकी, सावा, गेहूं का आटा, दलिया, बेसन, हल्दी, मिर्च, धनिया, गरम मसाला, जैविक सब्जियां, नीबू, जैविक साबुन एवं जैविक खाद की प्रदर्शनी एवं विक्रय के लिए स्टॉल लगाए गए। यह सभी उत्पाद मान्यता प्राप्त हैं।
जैविक कृषि उत्पाद बाजार के उद्घाटन समारोह में जैविक खेती के अनुसंधानकर्ता पद्म बाबूलाल दाहिया सतना से आए। उन्होंने ऋषि एवं जैविक खेती के फायदे, तरीके एवं इसकी जरूरतों के संबंध में किसानों, व्यापारियों एवं गणमान्य नागरिकों को जानकारी दी। प्रदर्शनी के आयोजक उन्नत किसान हेमंत दुबे, प्रो. कश्मीर सिंह उप्पल, सुरेश दीवान, नरेन्द्र चौधरी, संस्कार गौर, राजेश सामले, हेमंत नागर, राकेश गौर मौजूद रहे।

जैविक कृषि के क्षेत्र में काम कर रहे उन्नत कृषक हेमंत दुबे ने बताया कि वैश्वीकरण के दौर में आज खेती व्यापार बनती जा रही है, अधिकतम मुनाफे एवं कमाई के लालच में किसान तेजी से रासायनिक एवं जहरीले कीटनाशकों का उपयोग कर रहा है, इससे उत्पादित अनाज एवं सब्जियां खाकर मानव शरीर में संक्रमण बढ़ रहा है। हालात इतने गंभीर हैं कि हर चौथे व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के कैंसर, लीवर, हृदय रोग, कॉलेस्ट्राल, रक्तचाप जैसी बीमारियां हो रही हैं। पंजाब हरियाणा में रसायन खेती का खामियाजा लोग भुगत रहे हैं, जिससे हर चौथे व्यक्ति को कैंसर हो रहा है। यह हालात पूरे देश में हैं, ऐसे में जरूरी है कि हम प्राचीन कृषि व्यवस्था की ओर जाएं और जैविक उत्पादों का प्रयोग करें। इससे हमारी सेहत बनेगी और जमीन की सुरक्षा भी होगी। उन्होंने जैविक बाजार की जानकारी दी।
कार्यक्रम में प्रो. उप्पल ने बताया कि देश की खाद्य नीति में भी बदलाव होना जरूरी है, सरकारी नीतियों में जब तक सुधार नहीं होगा, तब तक कृषि व्यवस्था नहीं बदलेगी, हम मेहनत की कमाई का पैसा देकर भी जहर खरीद रहे हैं और उसका सेवन कर रहे हैं। रासायनिक उत्पादों का निकट भविष्य में गंभीर नतीजा आएगा, इसलिए जरूरी है कि हम जीवन में जैविक उत्पादों का उपयोग करें। समाजसेवी हेमंत दुबे ने बताया कि जल्द ही सभी जैविक उत्पादों को शहर में एक रिटेल काउंटर उपलब्ध कराने एवं सस्ते दामों में इन्हें लोगों को उपलब्ध कराने का प्रयास होगा। साहित्यकार चंद्रकांत अग्रवाल ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि वाकई रासायनिक उत्पादों के सेवन से सेहत बिगड़ रही है। अभियान से जुड़े रोहित नागे का मानना है कि इस दिशा में तेजी से जागरूकता लाने की जरूरत है। प्रदर्शनी में बिकने आए जैविक आम, तरबूज, गेहूं, चांवल, पान, अखबार की लुगदी से बनी इको फ्रेन्डली पेसिंल, भटे, गिलकी, कोदो, कुटकी, बेसन जैसे उत्पाद आकर्षण का केन्द्र रहे, लोगों ने जब जैविक उत्पादों का स्वाद चखा तो वे वाह क्या स्वाद है कहते रहे।
समारोह में शामिल होने आए पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित सतना जिले के उचहरा पिथौराबाद निवासी लोक साहित्यकार बाबूलाल दाहिया आकर्षण का केन्द्र रहा। 75 वर्षीय दाहिया को मप्र आदिवासी लोक साहित्य परिषद ने साहित्य संरक्षण का काम दिया, जब उन्होंने अध्ययन किया तो पाया कि हमारे लोकगीत, पर्वगीतों में पारंपरिक अनाज का वर्णन है, लेकिन ये प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, तभी से उन्होंने बीज संरक्षण का काम किया, दाहिया मप्र-छत्तीसगढ़ की करीब 200 धान की प्रजातियां संरक्षित कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में देश में सैकड़ों प्रजातियां थीं, हरित क्रांति आने के बाद 80 के दशक तक आधी प्रजातियां लुप्त हो गईं। सन 1965 में एक लाख 10 हजार प्रजातियां थी, जिनमें से अब मात्र 10 हजार बचीं हैं। होशंगाबाद के राधेलाल रिछारिया ने स्वयं 22800 पारंपरिक अनाज की प्रजातियां खोजी थीं। प्रजातियां लुप्त होने से इनके गुणधर्म भी चले गए।
श्री दाहिया ने कहा कि जैसे हमारा फैमिली डाक्टर होता है, वैसे ही हमें अब फैमिली किसान बनाने की जरूरत है। हम लगातार रासायनिक फसलों का प्रयोग कर रहे हैं, ऐसे में कई प्रकार के घातक रोग हमें घेर रहे हैं। समय आ गया है कि हमें जैविक खेती और जैविक उत्पादों की ओर जाना होगा। यदि हम फैमिली किसान बना लेंगे तो फैमिली डाक्टर की जरूरत बहुत ही कम पड़ेगी। श्री दाहिया ने वर्तमान में बोयी जा रही ग्रीष्मकालीन मूंग को भी नहीं बोने की सलाह दी है। उनका कहना है कि इस मूंग का उत्पादन कतई उचित नहीं है, इससे भरपूर पानी का दोहन होता है और धरती पानी से खाली होती है। धरती में पानी नहीं होगा तो पेड़ नहीं पनपेंगे और पेड़ नहीं होंगे तो बारिश भी नहीं होगी। हमें एक समझ विकसित करनी होगी और खेती के तरीके को बदलना होगा। श्री दाहिया ने बताया कि हमें परंपरागत फसल की ओर वापस जाना होगा। उन्होंने स्वयं धान की दो सौ प्रजातियां तैयार की है जो परंपरागत हैं। उन्होंने बताया कि किसी जमाने में धाम की एक लाख दस हजार प्रजाति होती थी, आज केवल दस हजार ही शेष बची हंै। उन्होंने कहा कि हमें अनाज की प्रजाति को भी बचाने की जरूरत है।










