शहर में बंदर, किसके अंडर? अफसर झाड़ रहे पल्ला

शहर में बंदर, किसके अंडर? अफसर झाड़ रहे पल्ला

इटारसी। शहर के भीतर बंदरों की फौज घुस आयी है। अब ये बंदर किसके अंडर में आते हैं, इससे वन विभाग और नगर पालिका दोनों ही पल्ला झाड़ रहे हैं। वन विभाग का कहना है कि हमारे पास बंदर पकडऩे के साधन नहीं, ये काम नगरीय निकाय किसी संस्था को ठेका देकर करा सकती है, हम ऐसी संस्थाओं के नंबर उनको उपलब्ध करा सकते हैं। नगर पालिका अधिकारी का कहना है कि बंदर वन्य प्राणी है और वन्यप्राणी को पकडऩा हमारा काम नहीं, कभी शहर में शेर घुस गया तो क्या हम उसे पकड़ सकते हैं? इन सबके बीच बंदर आबादी के भीतर कब किस पर झपट जाएं, किसे नोंच लें, घायल कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता।
काले मुंह के बंदर, इन दिनों शहर के मेहमान हैं। जंगलों से खाने की तलाश में शहर के भीतर इनका प्रवेश मानव के लिए खतरा बनता जा रहा है। करीब एक माह से रेलवे स्टेशन पर मेहमानी कर रहे ये बंदर अब शहर के भीतर आबादी वाले इलाकों में घुस आये हैं। पहले गांधीनगर में देखे गये थे, अब न्यास कालोनी, कावेरी एस्टेट क्षेत्र में ये खाने की तलाश में भटक रहे हैं। कहीं भूख की स्थिति में ये किसी पर हमला न कर दें, इसे लेकर लोगों में भय का वातावरण है।

जिम्मेदारी के लिए कोई तैयार नहीं
शहर के लोग बंदरों से परेशान हैं। करीब छह माह पूर्व भी काले मुंह के बंदरों का समूह पहले रेलवे स्टेशन फिर गांधीनगर, आरएमएस आफिस के पास से सूरजगंज, सोनासांवरी नाका होकर न्यास कालोनी, नई गरीबी लाइन होकर वापस हो गया था। अब पुन: बंदरों का यह समूह गांधीनगर से न्यास कालोनी और कावेरी एस्टेट तक आ पहुंचा है। इनसे निजात दिलाने के लिए कोई विभाग तैयार नहीं है। वन विभाग के अफसर कहते हैं, हमारे पास इनको पकडऩे के साधन नहीं होते हैं, तो नगर पालिका का कहना है कि वन्य प्राणी को पकडऩे का काम वन विभाग का ही होता है।


खाने की लालच में आ जाते हैं
दरअसल, बंदरों को खाने के लिए जंगलों में काफी चीजें होती हैं। वे बेल फल, कबीट, जामुन, आम, महुआ सहित अन्य फलों का खाकर अपना पेट भर लेते हैं। लेकिन लोगों ने इनको खाने की चीजें देकर वनों में मिलने वाली खाद्य वस्तुओं से दूर कर दिया है। जंगलों से निकलने वाली रोड किनारे ये बंदर वाहनों से फैकी जाने वाली चीजों के लालच में बैठे रहते हैं, और कई बार ये जान भी गंवा बैठते हैं। अब वहां खाने को नहीं मिल रहा है तो ये बस्ती की तरफ चले आये। कुछ दिन रेलवे स्टेशन पर गुजारा और अब वहां खाने को नहीं मिला तो शहर की तरफ रुख कर लिया है।

यहां नहीं मिलेगा तो जाएंगे जंगल
यदि इन बंदरों को रोड किनारे खाना मिलना बंद हो जाए तो इनके पास जंगलों में वापस जाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होगा। शहर के भीतर भी लोग इनको खाना देकर यहीं रुकने को मजबूर कर देते हैं। यदि जहां हैं, वहां पटाखा आदि का शोर करके, लंबे बांस से या अन्य तरीके से डराकर भगाएं तो ये दोबार उस क्षेत्र में नहीं आएंगे। वन विभाग के अधिकारी कहते हैं कि इनको मारने की बजाय डराना चाहिए। गुलेल से छोटा पत्थर इनके आसपास फैकना चाहिए, पटाखा चलाकर शोर करना चाहिए, जहां बैठे हैं वहां लंबे बांस से दीवार पर मारकर इनको डराना चाहिए।

ये कहते हैं अधिकारी
यह काम नगर पालिकाओं को देखना होता है, हम केवल मदद कर सकते हैं। मथुरा में बंदर पकडऩे वालों का ग्रुप है, उनका नंबर हम उपलब्ध करा देंगे, नगर पालिका उनसे संपर्क करके बंदर पकडऩे का ठेका दे सकती है। उनको बुलायें और बंदर पकड़वायें।
अजय कुमार पांडेय, डीएफओ

हमारे पास तो बंदर पकडऩे के कोई साधन होते नहीं हैं, प्रायवेट संस्था इनको पकड़ती है। उनसे ही संपर्क करना होगा। लोग चने, मूंगफली या अन्य खानेपीने की चीजें इनको देते हैं तो ये शहर की तरफ भागते हैं, यह बंद हो तो ये बंदर शहर में नहीं आएंगे।
जयदीप शर्मा, रेंजर

बंदर वन्यप्राणी है, यह तो वन विभाग मानता ही होगा। फिर ये काम हमारा कैसे हुआ? यदि शहर के भीतर शेर आ जाएगा तो फिर क्या होगा? उसे भी हमें ही पकडऩा होगा? यह काम हमारा नहीं है, वन विभाग को ही इनको पकडऩा होगा।
सीपी राय, सीएमओ

ये बोले विधायक
हम नगर पालिका और वन विभाग के अधिकारियों से इन बंदरों को शहर से बाहर जंगलों में भिजवाने के विषय में बातचीत करके जल्द ही इसका समाधान निकालेंगे। शहर के भीतर इनका होना खतरनाक और चिंता का विषय है।
डॉ.सीतासरन शर्मा, विधायक

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AUTHORRohit

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