इटारसी। शासकीय एमजीएम पीजी कालेज के संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी संस्कृतं मदीयं जीवनं च का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. पीके पगारे एवं विषय विशेषज्ञों ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण द्वारा किया। प्रमिला, सुषमा, सरला, फूलवती एवं वर्षा ने संस्कृत में सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत प्रस्तुत की। शोध संगोष्ठी के संचालक डॉ. ओपी शर्मा ने विषय विशेषज्ञों का परिचय देते हुए बताया की डॉ. सीजी विजय कुमार नागपुर, डॉ. मनमोहन उपाध्याय उज्जैन, डॉ. मनीष जुगरान उत्तराखंड, डॉ. पूजा उपाध्याय उज्जैन से उपस्थित हुए हैं।
संगोष्ठी की सचिव पूजा खंडेलवाल ने इस संगोष्ठी की प्रस्तावना संस्कृत भाषा में प्रस्तुत की। संयोजक डॉ. ओपी शर्मा ने इस संगोष्ठी के उद्देश्यों को स्पष्ट किया। विषय विशेषज्ञों ने इस संगोष्ठी में प्राप्त शोधपत्रों एवं शोध सारांश की स्मारिका का विमोचन किया। प्राचार्य डॉ. पीके पगारे ने संस्कृत भाषा का महत्व बताते हुए कहा कि संस्कृत भाषा का ज्ञान हमें जीवन में आगे बढ़ाता है। उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन वेद व्याकरण संकायाध्यक्ष संस्कृत विश्वविद्यालय, नागपुर के डॉ. सीजी विजय कुमार ने करते हुए बताया कि अब संस्कृतं मदीयं जीवनं च में से च का निष्कासन करना है क्योंकि संस्कृत और हम एक है, अलग-अलग नहीं है। संस्कृत के प्रचार प्रसार से ही भारत का विकास संभव हो सकेगा। डॉ. सीजी विजयकुमार ने कहा कि वर्तमान समय में एवं केवल 5 प्रतिशत लोग ही संस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे है।
डॉ. पूजा उपाध्याय के बच्चों ने राम, हरि, ऋचा ने गीता के 15 वे अध्याय के श्लोकों का पाठ किया। उत्तराखंड के डॉ. मनीष जुगरान ने कहा कि संस्कृत राष्ट्र का आधार है। जिस प्रकार वृक्षों का जीवन जड़ के बिना संभव नहीं है, वैसे ही संस्कृत के बिना भारत का विकास संभव नहीं है। महर्षि पाणिनि संस्कृत वैदिक विष्वविद्यालय, उज्जैन के उपकुलपति तथा वेदांग साहित्य संकाय अध्यक्ष डॉ. मनमोहन लाल उपाध्याय ने बताया कि भारत में अधिकांश भाषाओं का उद्गम संस्कृत भाषा से हुआ है। संस्कृत अन्य भाषाओं की जननी है। इसलिए भारत के विभिन्न भागों में संस्कृत के द्वारा आपसी संवाद किया जा सकता है। शैलेन्द्र वर्मा ने जीवन दर्शन एवं जीवन प्रबंधन पर शोधपत्र का वाचन किया। संगोष्ठी का समापन पूर्व रक्षा मंत्री एवं गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर के दिवंगत आत्मा की शांति के लिए 2 मिनट का मौन धारण कर किया गया।
संगोष्ठी : संस्कृत के बिना भारत का विकास असंभव
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