समीक्षा : खुशियों के गुप्तचर, निशां चुनते चुनते

समीक्षा : खुशियों के गुप्तचर, निशां चुनते चुनते

खुशियों के गुप्तचर [ कविता संग्रह ] – गीत चतुर्वेदी
निशां चुनते चुनते [ कहानी संग्रह ] – विवेक मिश्र
लंबी अस्वस्थता के बाद , दो-एक दिनों से , दिन कुछ अच्छे लगने लगे हैं और अब मेरे सामने हैं वसंत ऋतु के अलग-अलग शेड्स की दो किताबें , एक कवि और एक कथाकार की । जो कवि हैं वो एक उम्दा कथाकार भी हैं और जो कथाकार हैं उनके लेखन की शुरुआत् ही कविता और ग़ज़लों से हुई । पहली किताब है , हम सबके मन में बसने वाले कवि गीत चतुर्वेदी का अद्भुत काव्य संग्रह , ‘ ख़ुशियों के गुप्तचर ’। इन गुप्तचरों ने मेरे मन में तो सेंध लगा ली है और मैं अब उन जुगनुओं की तलाश में हूं जो जंगलों से तब लौटेंगे , जब सूरज को एक लम्बा ग्रहण लगेगा / चांद रूठकर कहीं चला जाएगा और वे लौटकर अंधेरे से डरने वालों को रोशनी देंगे क्योंकि हर साल एक रात ऐसी आती है / जब एक कविता / किताब के पन्नों से निकलती है और जुगनू बनकर जंगल चली जाती है – ‘ कविता की रात ’ कविता से।

कथाकार विवेक मिश्र कहते हैं वे अपनी कहानियों से जूझते हुए बार-बार रीतते हैं , फिर-फिर भर आते हैं । वह जान नहीं पाते हैं कि वह रीतने के लिए लिखते हैं या वह रिक्त हैं इसलिए कहानियां बेरोक-टोक बही आती हैं उनके भीतर । उनका कहना है – ‘ लिखना , गूंगे समय का हुंकारा बनने की कोशिश में … खुद को मिटाने की ज़िद और जुनून का नाम है । ‘ ” निशां चुनते-चुनते ‘ ख़ूबसूरत नाम के इस कहानी संग्रह में विवेक मिश्र की वो अनूठी कहानियां हैं जो संवेदना के स्तर पर पाठक को झिंझोड़ कर रख देती हैं तो कहीं गहरे पैठ जमा लेती हैं । संग्रह में अपने आस-पास बीतते समय के अनुभव के गिर्द बुनी , यथार्थ को केंद्र में रखकर लिखीं गईं , संवेदनाओं के महीन पर्तों को खोलतीं तो कहीं सिनेमैटिक अप्रोच लिए और कहीं बुंदेलखंड की महक से सराबोर कहानियां हैं ।
मेरे पास और भी बहुत किताबें हैं जिनके बारे में बात करने का बहुत मन है । शायद अब धीरे-धीरे कर सकूं ….. ।
– अमृता बेरा , दिल्ली .

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