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रूठने लगी है कुदरत, अब प्रयास ईमादार हों

5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

  • मंजूराज ठाकुर

बिगड़ता पर्यावरण, प्रकृति का असंतुलन आज वैश्विक समस्या बन गयी है। इसके दुष्परिणाम के तौर पर हम लगातार ऐसी घटनाएं देख रहे हैं, जो मानव प्रजाति के लिए खौफनाक मंज़र पैदा कर रही हैं। बावजूद इसके हम केवल चिंता कर रहे हैं, हकीकत के धरातल पर जो प्रयास होने चाहिए, उसका प्रतिशत काफी कम है। आने वाली पीढ़ी के लिए हम अधिक से अधिक रुपया, संपत्ति तो कमाकर रखना चाह रहे हैं, लेकिन अधिक से अधिक खुशनुमा वातावरण जुटाना नहीं चाह रहे। वो संपत्ति, वो पैसा किस काम आएगा जब ये कुदरत ही रूठ जाएगी। क्या हमारी अगली पीढ़ी सुख-चैन से रह पाएगी। क्या पैसा उनके कोई काम आ सकेगा? ऐसे कई सवाल मन में हैं, जिनका जवाब संपूर्ण समाज और सरकारों को खोजना है और उनके समाधान के लिए कदम बढ़ाने हैं। हां, कदम तो अब भी बढ़ रहे कहकर संतोष तो अवश्य किया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं है, क्योंकि उन कदमों में सच्चाई कम, रस्म अदायगी ज्यादा दिखती है।
चार दशक पहले हुई पहली चिंता
img_obt_10988पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का जन्म हुआ तथा प्रतिवर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक कदम था। तभी से हम प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।
चिंताजनक और शर्मनाक भी
पर्यावरण और जीवन का अटूट संबंध है फिर भी हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता है। यह बात चिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। यह और भी ज्यादा चिंताजनक है कि विश्व पर्यावरण को लेकर कुछेक संगठन ईमादार हैं जबकि सरकारों से जो उम्मीद की जानी चाहिए, उसकी लगातार कमी बनी रहती है। जहां तक शासन और प्रशासनका सवाल है, वे केवल रस्म अदायगी करते हैं, लाखों रुपए खर्च करके। विश्व पर्यावरण दिवस या पर्यावरण बचाने के नाम पर करोड़ों पौधों की जान हर वर्ष ली जा रही है। एक दिन स्कूली बच्चों को एकत्र करके झांकी सजायी जाती है, प्रचार-प्रसार पर खूब रुपया लुटाया जाता है, पौधे खरीदे जाते हैं, हवा बनायी जाती है और एक दिन सामूहिक पौधरोपण करते हैं, रिकार्ड बनाने के लिए। इसके बाद उसमें से दस फीसदी पौधे भी जीवित नहीं बचते हैं। पिछले वर्ष ही जिला स्तर पर मैराथन पौधरोपण किया, लेकिन उसके बाद मरणासन्न पौधे अखबारों की सुर्खियां बने, जिला प्रशासन में से किसी अफसर ने प्रयास नहीं किये कि आखिर क्यों ऐसा हुआ। हर वर्ष पौधों की हत्या करने का कोई मकसद भी होता होगा, जो कागजों में खानापूर्ति करके जेब भरी जाती होंगी, वरना कोई कारण नहीं बनता।
ईमानदारों को ही साथ रख लें
envoirnment pollutionसवाल यह है कि यदि शासन और प्रशासन के वश की बात नहीं तो क्यों नहीं ऐसे ईमादार संगठनों को फंडिंग कर दी जाती जो इसके लिए कार्य कर रहे और परिणाम भी दे रहे हैं। इटारसी में पर्यावरण की दिशा में परिवर्तन और पत्र लेखक मंच जैसे संगठनों ने रिजल्ट देकर दिखाया है। संगठन के सदस्य अपने जेब खर्च से यह सब वर्षों से करते चले आ रहे हैं, लेकिन उनका भी यह अभियान आखिर खुद के व्यय पर कब तक चलेगा, कभी तो इसे विश्राम लेना पड़ेगा। फिर पर्यावरण का कोई रखवाला नहीं बचेगा। वर्षों के इतिहास पर नज़र डालें तो कोई नया संगठन आगे आया नहीं, फिर कैसे उम्मीद की जाए कि पर्यावरण प्रेमियों की संख्या बढ़ेगी। ऐसे में शासन और प्रशासन को चाहिए कि वे यदि सीधे तौर पर इन संगठनों को मदद करने का प्रावधान नहीं खोज पाते हंै तो ऐसे संगठनों को अपने मैराथन अभियान से जोड़ लें, उन्हें पौधे व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं और रिकार्ड ही मेंटेन करना है तो उनकी उपलब्धि भी अपनी उपलब्धि में जोड़े लें, कम से कम प्रकृति तो खुश हो ही जाएगी, अन्यथा प्रकृति ने ईमादारी छोड़ और वह भी कर्तव्य से इतर रस्म अदायगी करने लगी तो मानव को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है, जैसा उत्तराखंड जैसा दृश्य देखने को मिला था।

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