शिव सर्वोच्च सत्ता, विश्व चेतना हैं : मधुसूदन शास्त्री

शिव सर्वोच्च सत्ता, विश्व चेतना हैं : मधुसूदन शास्त्री

इटारसी। अवाम नगर में स्थित पशुपतिनाथ धाम परिसर में शुक्रवार से शिव पुराण का आयोजन प्रारंभ हुआ। यजमान मेहरबान सिंह चौहान एवं श्रीमती शमा चौहान ने व्यास पीठ पर आचार्य मधुसूदन शास्त्री को विराजित कराया। इसके पूर्व श्री द्वारिकाधीश मंदिर से कथा स्थल तक विशाल कलश यात्रा निकली एवं 31 फिट ऊंचे त्रिशूल का भी अनावरण किया गया। पशुपतिनाथ धाम में भगवान शिव की 108 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है।
आचार्य मधुसूदन शास्त्री ने कहा कि इस पुराण में शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। इसमें इन्हें पंचदेवों में प्रधान अनादि सिद्ध परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया है। शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है। इसमें भगवान शिव के भव्यतम व्यक्तित्व का गुणगान किया है। शिव जो स्वयंभू हैं, शाश्वत हैं, सर्वोच्च सत्ता है, विश्व चेतना हैं और ब्रह्माण्डीय अस्तित्व के आधार हैं। सभी पुराणों में शिव पुराण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण होने का दर्जा प्राप्त है। इसमें भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, भक्तों और भक्ति का विशद् वर्णन किया गया है।
पंडित मधुसूदन शास्त्री ने कहा कि शिव पुराण का संबंध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। ऐसा कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु  शिव पुराण  में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है। शिवपुराण एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है जिसमें परात्मपर परब्रह्म परमेश्वर के शिव कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन रहस्य महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है। भगवान शिवमात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं। ‘शिव का अर्थ ही है कल्याणस्वरूप और कल्याणप्रदाता परमब्रह्म के इस कल्याण रूप की उपासना उटच्च कोटि के सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों-सभी के लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है।

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