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तिलकसिंदूर : शिव के दर, मुरादें होती है पूरी

तिलकसिंदूर : शिव के दर, मुरादें होती है पूरी

भगवान शिव को वीरान इलाका काफी पसंद है, वे ऐसे ही इलाकों में धूनी रमाते हैं. सतपुड़ा पर्वतश्रंखला में उनके अनेक स्थान हैं. सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी में शिव के अनेक स्थान हैं तो इसी सतपुड़ा पर एक स्थान ऐसा है, जहां शिव के होने का अहसास होता है.
होशंगाबाद जिले के जमानी गांव के समीप तिलक सिंदूर की पहाड़ी पर भगवान शिव का गुफा मंदिर वर्षों से है जहां महाशिवरात्रि पर तो मेला लगता है, अन्य दिनों में भी भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं. वर्तमान में वन मंत्री सरताज सिंह की रुचि के कारण यहां वन विभाग ने इको पर्यटन की शुरुआत कर एक रेस्ट हाउस बनाया है, जिसमें पर्यटक आकर रात गुजारते और प्राकृतिक वातावरण का आनंद उठाते हैं.
तिलकसिंदूर का अपना पौराणिक महत्व है. देश के कोने-कोन में शिवालय हैं, इनमें से कई काफी महत्वपूर्ण हैं. जैसे 12 ज्‍योतिर्लिंग, अनेक एकलिंगी महादेव आदि. तिलकसिंदूर का शिवालय एकलिंगी है. होशंगाबाद जिले में तिलकसिंदूर का शिवमंदिर खटामा के मंदिरों के नाम से भी जाना जाता है.
इटारसी शहर से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर है, ग्राम जमानी. यहां से लगभग 8 किलोमीटर दक्षिण दिशा में सतपुड़ा पर्वत पर घने जंगलों के बीच स्थित है तिलकसिंदूर. वैसे तो यह स्थान वर्षों पूर्व खोज लिया गया था, लेकिन तब से अब तक इसे विकास की जो राह मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल सकी है. उत्तरमुखी शिवालय सतपुड़ा की लगभग 250 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जिसके आसपास सागौन, साल, महुआ, खैर आदि के घने वन हैं. यहां का मुख्य आकर्षण है, तीव्रगामी लेकिन, छोटी धार वाली नदी हंसगंगा और इसके दोनों किनारों पर लगातार कतारबध्द प्राकृतिक आम के पेड़.

शिवालय के कुछ विशेष तथ्य
यहां एक लिंगी महादेव हैं. अर्थात् इस शिवालय के एक योजन अर्थात् आठ मील के आसपास दूसरा कोई शिवलिंग नहीं है. इसका महत्व निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है.

एक योजन भारम्या, द्वितीयलिंगम् न दृष्यते.
एकयोजन समाख्याता मुनिभिष तत्व दर्शभि:॥

हमारे शास्त्रों में एकलिंगी महादेव की पूजा का महत्व ज्‍योतिर्लिंगों से अधिक आंका गया है. इस शिवालय के इतिहास के बारे में कोई पक्का प्रमाण तो अप्राप्त है, लेकिन अनुमान यहां आए विद्वानों और मंदिर के तत्कालीन तपस्वी ब्रह्मलीन श्री कलिकानंद जी ब्रह्मचारी ने लगाया है कि यह ओंकारेश्वर स्थित महादेव जी के समकालीन का शिवलिंग है. इस संबंध में तथ्य इस प्रकार बताए जाते हैं….

पश्चिमाभि मुखम् लिंगम वृषशुन्यम् पुरातनम.
एकलिंगम समाख्याता मुनिभि: तत्व दर्शभि:॥

यहां शिवलिंग पर स्थित जलहरी का आकार चतुष्कोणीय है जबकि सामान्य तौर पर जलहरी त्रिकोणात्मक होती है. ओंकारेश्वर के महादेव के समान ही यहां पर भी जल पश्चिम की ओर जाता है जबकि अन्य सभी शिवालयों में जल उत्तर की ओर प्रवाहित होता है. ग्रंथों के अध्ययन से पता चला है कि भारतीय उपमहाद्वीप में यह स्थान अपने आप में अनूठा है. इस संबंध में श्री कलिकानंद जी बम-बम महाराज का कहना था कि उन्होंने नेपाल निवासी धन शमशेर जंग बहादुर राणा लेफ्टनेंट जनरल से पत्राचार किया था जिन्होंने लगभग 2 सौ ग्रंथों पर शोध कार्य किए हैं. इनमें से भवानी अष्टक भी एक है. इसी भवानी अष्टक में श्री राणा ने पाया कि आदिशंकराचार्य को तिलक वन में आदिशक्ति भवानी मां के दर्शन हुए थे. श्री राणा के पत्रों से पता चलता है कि यह वही तिलक वन है, इसीलिए इसका नाम तिलक सिंदूर पड़ा.

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हालांकि स्थानीय जानकारी के मुताबिक इसके नामकरण के विषय में कहा जाता है कि यहां प्राचीन समय में गोंड राजा हुआ करते थे, उनकी पूजन में सिंदूर का विशेष महत्व होता था. यद्यपि भगवान महादेव को सिंदूर का तिलक वर्जित है, जबकि यहां पर महादेव को सिंदूर का तिलक किया जाता है. इसलिए इसका नाम तिलकसिंदूर पड़ा. इस स्थान से कुछ ही दूरी पर गोंडकालीन संस्कृति का किला है. इस किले को नीलगढ़ के किले के नाम से जाना जाता है. रख-रखाव और देखरेख के अभाव में अब यह मिट्टी में मिल चुका है. इसके शिल्प को देखने से पता चलता है कि यह गोंड राजाओं की संस्कृति का एक अंग था. इसी किले में एक बावरी भी है. बताया जाता है कि पूर्व में कभी शिवालय के सामने चंद फुट की गहराई पर कुछ भवनों के अवशेष भी कहीं-कहीं दिखे हैं. आसपास के क्षेत्र को देखने से पता चलता है कि यहां संभवत: मूर्तियां और नांदकुण्ड आदि भी बनाए जाते थे.

इस शिवालय से पश्चिम की ओर पहाड़ी की तलहटी में छिन्नमस्तिका देवी की एक मूर्ति थी जिसके विषय में बताया जाता है कि कुछ वर्ष पूर्व इसे कोई ले गया. गोंडकालीन परंपरा शिवालय में किस प्रकार चली आ रही है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. इस मंदिर में शिवरात्रि के अवसर पर भोमका (गोंड आदिवासियों का पुजारी) ही पूजा कराता था. इस विषय में कहा जाता है कि गोंड राजाओं द्वारा भोमका को इस शिवालय की पूजन के लिए अधिकृत किया गया था. यही परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही है.
मंदिर के सामने पहाड़ी पर ही दाहिनी ओर कालभैरव की प्रतिमा विद्यमान है जो गोंडकालीन संस्कृति की कहानी कहती है. काल भैरव को भी गोंड लोग पुराने समय से श्रध्दा से पूजते रहे हैं. तिलकसिंदूर में प्राचीन काल से मेला लगता है. इसमें क्षेत्रीय संस्कृति के दुर्लभ दर्शन अत्यंत सुगमता से होते हैं. मेला भरने का मुख्य कारण यहां प्रतिवर्ष होने वाला यज्ञ है. इस संबंध में क्षेत्र के लोगों की जानकारी के अनुसार यहां पर सन् 1924 ईश्वी में स्वामी हंसानंद जी महाराज ने यज्ञ किया था. इस यज्ञ के लिए लोगों से आर्थिक सहयोग एकत्र किया था. उस वक्त तत्कालीन मालगुजारों ने जी खोल के दान किया था. प्राप्त जानकारी के अनुसार उस वक्त शांति के लिए होने वाले इस यज्ञ के लिए 80 हजार रुपए एकत्र हुए थे. यह यज्ञ पूर्णत: सफल रहा था. इसमें आसपास के श्रध्दालु इतनी बड़ी संख्या में जुटे थे कि एकमात्र पहाड़ी नदी का जल सूख गया था. इस जटिल समस्या के समाधान के लिए स्वामी हंसानंद ने भागीरथी गंगा का आह्वान किया था. बताया जाता है कि उनके आह्वान पर नदी में पुन: जलधारा प्रवाहित हुई. तभी से आसपास के लोग इस पहाड़ी नदी को गंगामाई के नाम से संबोधित करने लगे थे. बाद में सन् 1983 में यहां एकात्मता यज्ञ श्री कलिकानंद जी ने संपन्न कराया और तभी से स्वामी जी की स्मृति में इस नदी का नाम गंगामाई से बदलकर हंसगंगा कर दिया. सन् 1924 के यज्ञ के उपरांत जो राशि यज्ञ होने के बाद शेष बची थी उसमें शिवालय तक पहाड़ी पर सीढ़ियों का निर्माण कराया गया और मंदिर का जीर्णोध्दार किया. इस यज्ञ के उपरांत यहां प्रतिवर्ष शिवरात्रि के अवसर पर यज्ञ की परंपरा चल पड़ी जो अब भी अनवरत है. यहां मेले की परंपरा ने सन् 1960 के बाद गति पकड़ी और इसके आयोजन का स्तर दिन ब दिन बढ़ता गया. मेला भी वृहद स्तर पर आयोजित किया जाने लगा. इस आयोजन को सन् 1952 के पूर्व जमींदारों द्वारा संचालित किया जाता रहा. जब 1952 में जमींदारी समाप्त हो गई तब आसपास के लगभग 40 सदस्यों की एक मेला और यज्ञ समिति गठित की गई जो इस कार्य को सन् 1974 तक संचालित करती रही. 1974 से यह कार्य जनपद पंचायत केसला के हाथ में चला गया और पिछले कुछ वर्षों से यह वन समिति के हाथों में है.

इस स्थल के विकास के लिए प्रयास बहुत देर से प्रारंभ हुए. इसमें सबसे पहले रुचि दिखाई सन् 1962 में होशंगाबाद जिले के तत्कालीन कलेक्टर श्री केसीएस आचार्य ने. जब सन् 1962-63 में श्री आचार्य तिलकसिंदूर में यज्ञ स्थल पर यज्ञशाला का शिलान्यास करने पहुंचे तो वहां उन्हें एक वनरक्षक ने जानकारी दी कि यह स्थल वन परिक्षेत्र में है अत: यहां पर कोई भी सार्वजनिक निर्माण कार्य नहीं हो सकता. इस पर कलेक्टर श्री आचार्य ने तत्काल शिलान्यास कार्य को स्थगित कर पहले इस संबंध में जानकारी जुटाई. वे अपने कार्यालय पहुंचे और संबंधित जानकारी एकत्र की. बताया जाता है कि इस जानकारी के अनुसार यह स्थल पूर्व से ही सार्वजनिक मेले के लिए उपयोग में लाया जाता रहा था. अत: इसमें किसी प्रकार की कानूनी अड़चन निर्माण कार्य में बाधा नहीं डाल सकती थी. उन्होंने जानकारी एकत्र करने के बाद ही यज्ञशाला का शिलान्यास किया. इस प्रकार की त्वरित कार्यवाही से उनकी इस स्थल के विषय में रुचि को समझा जा सकता है. उनके स्थानांतरण के बाद यहां का विकास एकदम से ठप पड़ गया. इसके बाद जो भी प्रशासनिक अधिकारी आए उन्होंने अपनी तरह से कार्य किया लेकिन, विकास कार्य की रफ्तार नहीं बन सकी.

यहां गुफा मंदिर के बायीं ओर पहाड़ी पर ऊपर पार्वती महल का निर्माण सन् 1971 में प्रारंभ हुआ. इसके निर्माण की शुरुआत इटारसी से आमला रेलखंड के रेलकर्मियों ने अर्थप्रबंध कर की थी. इसका शिलान्यास सन् 1971 में जमानी के पूर्व मालगुजार पं. पुरुषोत्तमलाल दुबे ने किया था. क्षेत्र की जनता के अपार सहयोग से इस भवन का निर्माण कार्य 1972 में पूर्ण हुआ. इस गुफानुमा मंदिर में इसी सन् में मां पार्वती, मां दुर्गा एवं श्री गणेश जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई. इस कार्य के पूर्ण होने तक न ही इसमें जिला प्रशासन ने कोई सहयोग दिया और ना ही जनपद ने. सारा कार्य क्षेत्र की जनता के सहयोग से पूर्ण हुआ.
दूसरी ओर सन् 1962 से जो यज्ञशाला का निर्माण कार्य शिलान्यास होने के बाद अधूरा पड़ा था वह सन् 1976 में पूर्ण हुआ. इसका पूरा होने में 14 वर्ष का लंबा समय लग गया. इस बीच इस मंदिर का संचालन जनपद पंचायत को 1974 में सौंप दिया. जनपद के पास जिम्मेदारी आने के बाद सन् 1974 से श्री साम्ब महारुद्र यज्ञ की शुरुआत की गई जो अब भी जारी है. जनपद के पास जिम्मा जाने के बाद यहां जन सहयोग की भी कमी आयी है क्योंकि क्षेत्र की जनता सहयोग देने में कतराने लगी थी. उनका मानना था कि अब उनकी उपेक्षा होने लगी है. सन् 1980 में जनपद पंचायत केसला ने धर्मशाला निर्माण का निर्णय लिया और 1980 में ही तत्कालीन सांसद रामेश्वर प्रसाद नीखरा ने इस भवन का शिलान्यास किया जो तत्कालीन कलेक्टर श्रीमती किरणविजय सिंह की पहल पर सन् 1983 में प्रारंभ हुआ. गर्मी के दिनों में यहां पर नदी के सूखने के बाद गंभीर जल संकट हो जाता है. इसके लिए यहां दो हैंडपंप खुदवाए जो रख रखाव के अभाव में खराब हुए. वर्ष 1990-91 में विद्युत मंडल ने जमानी में विद्युत सब स्टेशन का निर्माण होने के बाद त्वरित कार्यवाही कर यहां बिजली पहुंचायी.

ऐसे पहुंचे तिलक सिंदूर
यहां पहुंचने के लिए इटारसी से जमानी पहुंचना होता है. यहां से करीब 8 किलोमीटर का कच्चा मार्ग है. इस मार्ग के निर्माण के लिए अनेक प्रयास हुए लेकिन यह 3 किलोमीटर से अधिक नहीं बन सका. यदि इस स्थान पर पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो यह एक अत्यंत सुरम्य पर्यटन स्थल बन सकता है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां वर्षभर क्षेत्र के लोगों का आना जाना लगा रहता है.
वर्तमान में मप्र शासन के वन मंत्री सरताज सिंह यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रति रुचि ले रहे हैं, लेकिन अब तक वन विभाग ने यहां केवल एक रेस्ट हाउस बनाया है. जबकि यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को निखारने और पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए और प्रयासों की जरूरत है.

मान्यता

स्थानीय मान्यता के अनुसार पास की गुफा से एक सुरंग पचमढ़ी के निकट जम्बूद्वीप गुफा तक जाती है. मंदिर, भस्मासुर के स्पर्श से बचने के लिए महादेवजी द्वारा खोदा गया बताया जाता है. कठिन एवं दीर्घ तपस्या के पश्चात महादेवजी ने भस्मासुर को वरदान दिया, जिसके द्वारा उसे किसी के भी सिर पर हाथ रखकर भस्म करने की शक्ति प्राप्त हो गई थी. जैसे ही भस्मासुर को वरदान प्राप्त हुआ उसने स्वयं महादेवजी पर ही उसका प्रभाव देखने की चेष्टा की. भगवान शंकर ने तुरंत ही भयभीत होकर तिलक सिंदूर गुफा का निर्माण किया तथा उससे भाग निकले, जबकि भगवान विष्णु ने जो अनिंदय सुंदरी के रूप में महादेव जी की रक्षार्थ आये थे, प्रवेश द्वार की रक्षा की. भगवान विष्णु ने राक्षस को इस प्रकार मोहित किया कि उसने सब कुछ भूल कर नाचते समय अपना हाथ अपने सिर पर रख लिया और इस प्रकार अपने आप को भस्म कर लिया.

मेला

शिवरात्रि के अवसर पर इस गुफा के पास एक छोटा सा वार्षिक मेला लगता है. भक्तगण जो किसी विशेष मनौती, जैसे स्वास्थ्य, संतान आदि के लिए यहां आते हैं, चट्टानी दीवार पर लाल रंग के थापे लगाते हैं. वे उपर की ओर उंगली करके थापे लगाते हैं. जब उनकी मनौती पूर्ण हो जाती है तो भक्तगण पुन: आकर उस स्थान पर थापे लगाते हैं परंतु इस बार अंगुली नीचे की ओर होती है.

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