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नर्मदा की गोद में बसी पावन तीर्थनगरी होशंगाबाद

नर्मदा की गोद में बसी पावन तीर्थनगरी होशंगाबाद

सन1881 में पूरी तरह से तैयार हुए सेठानी घाट
– पंकज पटेरिया होशंगाबाद द्वारा

मप्र की राजधानी भोपाल से करीब 75 किमी दूर पुण्य सलिला मां नर्मदा की गोद में बसे होशंगाबाद (नर्मदापुरम) की देश में एक प्रमुख तीर्थनगरी के रुप में विशिष्ठ पहचान है।

प्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा की महिमा अपरंपार है। महात्मय इतना है कि सारे तीर्थों का पुण्यस्नान लाभ, यज्ञादि फल और वेदाध्ययन प्राप्त ज्ञान नर्मदा तट पर सहज रुप में विद्यमान है। नर्मदा जी को दक्षिण गंगा भी कहा जाता है। नर्मदा जी देश की एकमात्र ऐसी नदी है जिनकी परिक्रमा की जाती है।
आदि गुरु शंकराचार्य ने मां नर्मदा की दिव्य महिमा का गान किया है।

 अलक्ष लक्ष किन्नराम रासुरादि पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षिलक्ष कूजितं
वषिष्ठ, षिष्ठ पिप्लाद कर्दमादि शमर्दे
त्वदीय पाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे।

Sethani Ghaat

सिद्धदात्री नर्मदापुरम (होशंगाबाद) इन्हीं अद्भुुत विशेषताओं के कारण पौराणिक काल से ही अनेक संत महात्माओं, तपस्वी मनीषियों की तपस्थली और लीलाभूमि रहा है। सर्व धर्म, संप्रदाय समादर के केन्द्र पावन नर्मदांचल को शंकराचार्य जी, महर्षि वषिष्ठ, अंगिरा, पुलस्त्य, जमाली ऋषि सहित विभिन्न धर्म संप्रदाय के साधकों का पावन पीयूष स्पर्श मिला है इसके प्रमाण यहां विद्यमान अति प्राचीन मंदिर, सिद्ध संत महात्माओं की समाधि, आश्रम हैं। नर्मदा जी के जगप्रसिद्ध विस्तृत घाट माँ की ममतामयी गोद से अनुभव होते हैं। अपनी भव्यता के कारण इनकी चतुर्दिक ख्याति है।
घाट के निर्माण की दिलचस्प कथा है। अंग्रजों का शासनकाल था, सर रिक्टे होशंगाबाद के डिप्टी कमिश्नर थे आज की तरह नर्मदांचल का प्रसिद्ध भुजलिया लोकोत्सव धूमधाम से मनाया जाता था। उस दिन भुजलिया उत्सव के दिन शाम नर्मदा तट पर खासी चहल पहल थी। भुजलिया विसर्जन का कार्यक्रम चल रहा था। सर रिक्टे घोड़े पर सवार व्यवस्था देखने मौजूद थे। पीली कच्ची मिट्टी के किनारे से भुजलिया कलश लेकर नर्मदा में विसर्जन करने जाने में महिलाओं को तकलीफ  हो रही थी वे फिसल रही थीं, गिर रही थीं। यह दृश्य देखकर सर रिक्टे बहुत दुखी हुए। उन्होंने उसी क्षण मन में यहां पक्के घाट निर्माण का संकल्प लिया। दूसरे दिन सरकारी खजाना टटोला लेकिन इतना पैसा नहीं था लिहाजा उन्होंने नगर की धनी-मानी धर्मपरायण महिला सेठानी जानकीबाई जी से संपर्क किया और इस सार्वजनिक काम के लिये मदद मांगी। सेठानी जी तीर्थ यात्रा पर जा रही थीं, रिक्टे साहब की बात सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने तत्काल धन राशि का प्रबंध कर दिया। घाट का सुन्दर निर्माण शुरु हुआ और 10 मार्च 1881 को सेठानी घाट पूरी तरह तैयार हो गये तब इनकी निर्माण लागत आई थी कुलजमा 18000 रुपये। बाद में कई उदारमणा दानशील लोगों ने कई और घाटों का निर्माण करवाया। मप्र शासन ने भी कारगर कदम उठाये और घाटों के निर्माण और उन्हें आपस में जोडऩे का महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शुरु किया है। नर्मदा तट पर भव्य प्राचीन मंदिरों की श्रंृखला है। मंदिर-मठ संघ के नगर अध्यक्ष पं. गोपाल प्रसाद खड्डर के अनुसार नर्मदा तट के विभिन्न घाटों पर करीब 45 प्राचीन मंदिर स्थित हैं जिनका भव्य निर्माण वास्तु-वैभव देखते ही बनता है।

JAGDISH MANDIR

प्राचीन श्री जगदीश मंदिर
नर्मदा तट का सर्वाधिक प्राचीन श्री जगदीश मंदिर है जो की लगभग 750 वर्ष पुराना है। विशाल प्रवेश द्वार से अंदर दाखिल होते हुये बड़ा बरामदा आता है और सामने ऊंचे सिंहासन पर विराजमान हैं। भगवान श्री जगन्नाथ जी, बहन सुभद्रा जी और बलदाऊ जी। तीनों प्रतिमाओं का स्वरूप जगन्नाथपुरी की मूर्ति जैसा ही है। यहां महंत परंपरा चली आ रही है पूजा आदि का विधान भी जगन्नाथपुरी जैसा ही है। विशाल मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमायें भी हैं, धर्मशाला है और वृंदावन भी है। प्रतिवर्ष रथयात्रा भी निकाली जाती है जिसमें शामिल होने देशभर के साधू-संतों के अखाड़े आते हैं तथा रामसखी की टोलियां भी आती हैं। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा को श्री जगन्नाथ जी का परंपरानुसार महास्नान कराया जाता है। मान्यता है कि स्नान के बाद श्री जगन्नाथ जी अस्वस्थ हो जाते हैं वैद्यराज की सलाह पर शयनकक्ष में सोलह दिन विश्राम करते हैं तब पट बंद रहते हैं, दर्शन नहीं होते हैं। वैद्य पं. गोपाल प्रसाद खड्डर दिव्य औषधि से भगवान का उपचार करते हैं। पूर्व में स्व. पं. राजवैद्य सीताराम दीक्षित भगवान का बीमारी में उपचार करते थे। अस्वस्थ्यता अवधि में महंत नारायण दास जी, सुदर्शन महाराज जी भगवान को हल्के भोजन का नैवेद्य लगाते हैं। सोलह दिन बाद स्वस्थ्य होने पर श्री जगन्नाथ जी रथयात्रा से नगर भ्रमण कर नगरवासियों को दर्शन देते हैं। रथयात्रा वापस मंदिर लौटती है और सिंहासन पर भगवान को पुन: विराजित किया जाता है, पूजा-अर्चना की जाती है और नगर भंडारा किया जाता है। उत्सव के समापन पर संत-महात्माओं की सम्मानपूर्वक विदाई की जाती है।

प्राचीन खेड़ापति हनुमान मंदिर

प्राचीन श्रीराम-जानकी मंदिर के ठीक बगल में है, प्राचीन श्री खेड़ापति हनुमान मंदिर। इन खेड़ापति हनुमान जी की सिद्धी-प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। बताते हैं कि हनुमान जी महाराज स्वप्न देकर पीपल के पेड़ से प्रकट हुये थे तब उस ज़माने के कुछ बुजुर्ग लोगों ने पहल करके यहां एक मढिय़ा का निर्माण करवाया था। आज यहां एक भव्य मंदिर है जिसमें दक्षिणमुखी हनुमान जी विराजे हैं। भगवान ने हाल ही में चोला भी छोड़ा था। श्रृद्धालुओं का यहां सदा मेला लगा रहता है। हनुमान जी की कृपा से लोगों के बिगड़े काम संवरते हैं और लोग भंडाराादि करते रहते हैं। मंगलवारा घाट पर भी हनुमान जी महाराज का एक भव्य मंदिर है करीब 15 वर्ष पहले जिसका जीर्णोद्धार स्वयं का कायाकल्प करने वाले तपस्वी संत पूज्य श्री बर्फानी बाबा (अमरकण्ठ वाले) ने किया था। सौभाग्य से परमपूज्य श्री बर्फानी बाबा का आशीर्वाद और उस आनंद-उत्सव में शामिल होने का सुख इन पंक्तियों के लेखक को भी मिला था।

शीतला माता मंदिर, हिंगलाज माता मंदिर एवं श्री दत्त मंदिर
हर्णे गली में आदिशक्ति शीतला माता का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है जिसे पूर्व राजस्व मंत्री मधुकरराव हर्णे के पूर्वज पेशवा विठोवा हर्णे ने सन् 1710 में बनवाया था। यहां धार्मिक अनुष्ठानादि चलते रहते हैं। होशंगाबाद रेल्वे स्टेशन से लगभग तीन किमी दूर रेल्वे पुल के पास खर्राघाट पर स्थित है हिंगलाज माता का प्राचीन मंदिर जिसे गुफा मंदिर भी कहते हैं। 30 अगस्त 1973 को नर्मदा जी की भीषण बाढ़ में यह क्षेत्र जलमग्न हो गया था। कालान्तर में मंदिर रेत-मिट्टी में दब गया था और यहां झाड़-झंकड़ फैल गये थे। लोग भी मंदिर को भूल गये थे। लगभग 30 वर्ष पहले यहां रेल्वे ने नर्मदा जी पर दूसरे पुल का निर्माण कार्य शुरु करवाया। आसपास की साफ-सफाई करवाई जा रही थी तभी निर्माण कंपनी के ठेकेदार को स्वप्न आया था। स्वप्न में मिले निर्देश के अनुसार उन्होंने सावधानीपूर्वक उस स्थान की खुदाई करवाई जिसमें रेत-मिट्टी की एक गुफा में हिंगलाज माता के दर्शन हुये। ठेकेदार ने उसी स्थान पर गुफा रूप में मंदिर का पुन: निर्माण करवाया और हिंगलाज माता की विधि-विधान के प्राण-प्रतिष्ठा करवाई। यहीं गुरुकुल क्षेत्र के पास प्राचीन श्री दत्त मंदिर और नंदी पर सवार श्री शिव-पार्वती जी का मंदिर भी है। नर्मदा तट पर सत्संग भवन के पास लगभग 400 वर्ष पुराना प्राचीन शनि मंदिर भी है उसी परिसर में बहुत प्राचीन शिव मंदिर भी है।
Narmadajiप्राचीन मंदिर की श्रंखला में लगभग 40-45 प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनमें श्री नर्मदा मंदिर, नर्मदेश्वर मंदिर, पंचमुखी महादेव मंदिर, काले महादेव, नागेश्वर मंदिर, बलदाऊ जी का मंदिर, श्रीजी मंदिर, राधावल्लभ मंदिर, नरसिंह मंदिर, पीताम्बर मंदिर आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा 25 वर्ष से 75 वर्ष पुराने कई मंदिर नर्मदा नगरी में हैं।
नर्मदापुरम् होशंगाबाद में सिद्ध संत-महात्माओं की समाधि और आश्रम भी स्थित हैं जिनमें संतषिरोमणि श्री रामजी बाबा की समाधि, योगबल से स्त्री से पुरुष बनीं देवामाई की समाधि, श्री धूनीवाले दादाजी का दरबार, हरेराम महाराज आश्रम, नर्मदा-तवा संगम स्थल बांद्राभान स्थित परमपूज्य योगेश्वरी बाईराम माताजी की समाधि आदि हैं। इसके अलावा अन्य धर्मसंप्रदाय के मानने वाले श्रद्धालुजनों की आस्था के प्राचीन केन्द्र हैं जहां हमेशा लोगों की आवाजाही रहती हैं।

द्वारा – पंकज पटेरिया होशंगाबाद

Pankaj Pateriya

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