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राधारानी का स्नेह व श्रीराम का आशीष, किरदार निभाने में करते मदद

राधारानी का स्नेह व श्रीराम का आशीष, किरदार निभाने में करते मदद

शास्त्री सियाराम दीक्षित से बातचीत (श्रीकृष्ण और लक्ष्मण की भूमिका में)

शास्त्री सियाराम दीक्षित से बातचीत  (श्रीकृष्ण और लक्ष्मण की भूमिका में)

श्रीकृष्ण का चरित्र निभाएंगे तो राधारानी का स्नेह और आशीर्वाद स्वत: ही प्राप्त होता है, जब लक्ष्मण का किरदार निभाने की बात आती है तो प्रभु श्रीराम आशीष देते हैं। यही कारण है, कि जब एक कलाकार मंच पर इन चरित्रों को निभाता है तो उसे अपनी ईश्वर प्रदत्त कला के अलावा कुछ अतिरिक्त प्रभाव दिखाने का अवसर भी मिल जाता है। श्रीकृष्ण की भक्ति आसान नहीं है, इसमें डूब जाना पड़ता है, इसमें वो ताकत है कि आपका जीवन ही बदल जाए। यह विचार हैं, वृंदावन के श्रीबाल कृष्ण लीला संस्थान के कलाकार शास्त्री सियाराम दीक्षित के।

श्री दीक्षित ने यहां इटारसी की भूमि पर श्रीकृष्ण और लक्ष्मण के चरित्र को जिया है। वे इस शहर के कलाप्रेम और धार्मिक प्रवृत्ति के कायल थे और यहां के स्नेह ने उन्हें अपनी कला को और परिष्कृत करने की ताकत दी। वे बचपन से ही श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र से प्रभावित रहे हैं।
सात वर्ष की आयु से कला के क्षेत्र में कार्यरत हैं। दो दिन रासलीला में उनके द्वारा निभाई गई श्रीकृष्ण की भूमिका बेहद सराहना मिली। बकौल, सियाराम दीक्षित चरित्र निभाते वक्त भगsiyaram-2वान कुछ पल के लिए आपके शरीर में प्रवेश करते हैं, शायद सही है। क्योंकि चरित्र निभाने के दौरान जो छबि लोगों के नेत्रों में समाई है, वह श्रीकृष्ण की है।

रासलीला के दौरान श्रीकृष्ण की भक्ति ऐसी दिखी कि लोग उसमें डूब जाना चाहते थे। यदि यह सोचा जाए कि यह केवल कला थी तो फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनकी कला में इतनी जान यदि आई है कि वह सच के निकट दिखे, इसमें भी श्रीकृष्ण की भक्ति की ताकत ही है। दोनों भिन्न भूमिका के साथ कैसे न्याय करते हैं, इस सवाल पर वे बोले, जैसे एक बच्चा जब मां के पास होता है तो अलग व्यवहार करता है और जब पिता के पास होता है तो उसका व्यवहार मां की अपेक्षा अलग होता है। बस ऐसे ही दोनों किरदार में रम जाते हैं।

स्वामी प्रभात कुमार शर्मा के सानिध्य में कला का ककहरा सीखे श्री दीक्षित रामलीला में लक्ष्मण के किरदार में भी खूब पसंद किए गए। वे कहते हैं कि दोनों भूमिकाएं काफी अलग हैं। जहां श्रीकृष्ण स्नेह की पराकाष्ठा हैं तो लक्ष्मण के भीतर आग भरी है। दोनों भूमिकाओं के साथ न्याय भी केवल भगवन ही करते हैं, वे तो केवल माध्यम हैं। जब कृष्ण के किरदार की बात आती है तो राधारानी का स्नेह मिलता है और जब लक्ष्मण की भूमिका में जाते हैं तो श्रीराम का आशीर्वाद प्राप्त हो जाsiyaram-1ता है। यही कारण है कि वे दोनों भूमिकाएं निभा पाते हैं।

रामलीला और रासलीला में भूमिकाओं के अलावा वे एक कुशल भगवतकथा वाचक भी हैं। 12 वी तक स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने संस्कृत विद्यालय में दाखिला लेकर भागवत कथा में महारत हासिल की। कृष्ण की भक्ति के विषय में वे कहते हैं कि इसमें डूब जाने से जीवन सफल हो जाता है, भक्ति ऐसी जैसे मीरा ने की। उन्हें पता था कि प्याले में विष है, लेकिन वह कृष्ण के नाम पर वह भी पी गईं।

शास्त्री सियाराम दीक्षित मानते हैं कि हर चीज में दृढ़ता पहली शर्त होती है। यदि भक्ति करनी है तो दृढ़ता से करो जैसे मीरा ने की और यदि शत्रुता निभानी है तो शिशुपाल और रावण सी करो।
अब तक भारत के मप्र, उप्र, महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात आदि में मंचों पर श्रीकृष्ण और लक्ष्मण की भूमिका निभा चुके श्री दीक्षित इटारसी में मिले प्रेम को अविस्मरणीय बताते हैं।

वे इटारसी के लोगों का धन्यवाद अदा करते हुए कहते हैं कि ये विस्मृत नहीं किया जाने वाला अनुभव है। श्रीकृष्ण के चरित्र से खुद को जोडऩे पर वे कहते हैं कि हम केवल भूमिका निभाते हैं लेकिन यह हमेशा मन में रखना होता है कि वे इस किरदार को निभा रहे हैं तो आचरण भी उनके अनुसार ही करना होगा। वे बताते हैं कि वृंदावन के सेवाकुंज में आज भी श्रीकृष्ण महारास करते हैं।

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