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हरिशंकर परसाई

जन्म                – 22 अगस्त 1924
जन्म स्थान – ग्राम जमानी, जिला- होशंगाबाद, मध्यप्रदेश

शिक्षा
नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. तक की शिक्षा ग्रहण की. 18 वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरी के बाद जबलपुर से स्पेस ट्रेनिंग कालेज में शिक्षण कार्य का अध्ययन किया. इन्होंने 1943 से 1957 तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी की. तत्पश्चात स्वतंत्र लेखन की शुरूआत की.

योगदान
जबलपुर से वसुधा नामक साहित्यिक मासिकी का प्रकाशन किया. कहानियां, उपन्यास एवं निबंध लेखन के बावजूद मुख्यत: व्यंग्यकार के रूप में प्रख्यात हुए. हरिशंकर परसाई हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया. इसके अलावा सामाजिक वास्तविकताओं से आम आदमी का परिचय इन्हीं व्यंग्य के माध्यम से कराया. इसके अलावा उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक, रूढ़िवाद पर भी प्रहार किया है.
”साहित्य अकादमी” पुरस्कार से उन्हें उनकी रचना ”विकलांग श्रध्दा का दौर” के लिए सम्मानित किया गया.

प्रसिध्द कृति

  कहानी संग्रह
                हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे 
  उपन्यास
                रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज 
  लेख संग्रह
                तब की बात और थी,  भूत के पांव पीछे, बेईमानी की परत, पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रध्दा का दौर, तुलसीदास चंदन घिसै आदि.

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