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काफी हद तक हम ही जिम्मेदार हैं

floodजलप्रलय या बाढ़, यह काफी हद तक इनसानी कारगुजारियों के कारण ही आते हैं. प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ करते हैं वे, जो गलत होने देते और जो गलत होते देखते रहते हैं, वे भी इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. बाढ़ किसी भी मौसम की तरह हर वर्ष आने वाला संकट बन गया. मौसम खुशियां लेकर आता है, और चेहरे पर लंबे समय तक चमक बिखेर देता है तो बाढ़ भारी पीड़ा और परेशानियां लेकर आती है. देने के नाम पर गहरे जख्म और दुखों का पहाड़ देकर जाती है जो हमारे दिलों में लंबे समय तक असहनीय दर्द देकर जाती है.
यह हर वर्ष आने वाला संकट है, अचानक नहीं. हम या हमारी सरकार, तैयारी नहीं थी जैसे शब्दों से खुद को जिम्मेदारी से नहीं बचा सकती. यह पल में आकर खत्म हो जाने वाला संकट भी नहीं कि इसकी बात करने में गंभीरता ना हो. केवल बातें नहीं बल्कि इससे बचाव के प्रयासों में भी गहरी गंभीरता होनी चाहिए. यह एक ऐसी विपदा है, जिसमें सैंकड़ों गांव जलमग्न हो जाते हैं, सैंकड़ों मवेशी बह जाते हैं, परिस्थति यह बन जाती है कि आदमी खुद को बचाए या अपने मवेशियों को जिन्हें वह अपने बच्चों की तरह ही पालता है. इनसान मवेशियों की जान पर अपने बच्चों की जान को तबज्जो देता है, मूक जानवर बेचारा किससे कहे अपनी पीड़ा. चुपचाप खूंटे से बंधे सामने आती मौत को देखता है और फिर काल के गाल में समा जाता है. उसे खतरे का पूर्वाभास नहीं होता. मनुष्य को तकनीकि के युग में पहले पता चल जाता है. जैसे डेम से पानी छोड़ा तो एसएमएस के जरिए पता चल गया. मोबाइल से जानकारी मिल गई, लेकिन मूक जानवर का क्या? इनसान भी खुदगजऱ् है, जब तक उसे मतलब होता है, पालन पोषण बच्चे की तरह करता. जब संकट आता है तो उसे मूक प्राणी को छोड़ जाता है मरने को. खुदगर्जी का आलम देखिए कि किस्मत से मवेशी बच जाए तो बाढ़ का पानी उतरने के बाद उसी मवेशी को तलाशकर वापस ले आता है फिर अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए. बहरहाल, अब यह हर वर्ष की कहानी बन चुकी है. बस्तियां तबाह होती हैं, खेत उजाड़ और किसान बर्बाद. हर वर्ष प्राकृतिक आपदा से अपनी कमर तुड़वा चुका किसान आपदा से राहत पाने की सालभर जुगत करता है, उसे एक बर्बादी का मुआवजा भी ठीक से नहीं मिल पाता है कि दूसरा वर्ष आ जाता है. यह है, हमारी व्यवस्था, हमारे जनकल्याणकारी राज्य, जनहितैषी सरकारें और तथाकथित संवेदनशील प्रशासन का चेहरा.
सवाल मन में उठता है, उठना लाजमी भी है. संकट हर वर्ष आता है, करीब सात दशक से हम पर हम ही राज कर रहे हैं, अंग्रेज तो चले गए. हम खुद को इन संकटों से बचाने के लिए इन सात दशक में कोई तरीका नहीं निकाल सके. इन संकटों से निपटने सरकारी प्रयास कितने गंभीर होते हैं, सबको पता है.
दरअसल सच्चाई, कड़वी होती है. बाढ़ का पानी गरीब, ग्रामीण, किसानों मवेशियों के लिए जहां दुख, मुसीबतें लेकर आता है तो कुछ लोगों के लिए यह चैत काटने जैसा सीज़न होता है. बाढ़ का पानी उतरने के बाद या बाढ़ के वक्त सरकारी मशीनरी का जो रोल दिखता है, उससे तो यही लगता है, मानो यह उनके लिए कमाई का सीज़न हो. बाढ़ आएगी तो राहत शिविर भी लगेंगे, शिविरों में रहने वालों के लिए भोजन के पैकेट तैयार होंगे, टेंट हाउसों से उनके सोने-ओढऩे-बिछाने के लिए कपड़े आएंगे. भोजन के पैकेट 250 तैयार होंगे और बिल 2500 का निकलेगा. फिर राहत शिविरों और बाढ़ पीडि़त बस्तियों में जो वाहन दौड़ेंगे उनका किराया या फिर दौडऩे वाले सरकारी वाहनों में लगने वाले पेट्रोल-डीजल का बिल. यह सब लंबा खेल होता है, जो आमजन के समझ से बाहर होता है. सवाल फिर वही, आजादी के सात दशक में हमने खूब तो बांध बनाए, नहरें बनायीं, नदियों को गहरा किया. आधुनिक हो गए, जल प्रबंधन करना नहीं आया. बाढ़ जैसी आपदा से बचने की तैयारी करना हमें नहीं आया. जो तैयारी की, उससे भी बर्बादी से खुद को नहीं बचा सकते हैं तो फिर हमारी कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है. अब भी सवाल कि आखिर बाढ़ और राहत का सिलसिला कितना लंबा होगा, जवाब किसी के पास नहीं. इन सबके बीच प्रशासनिक स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार का जो खेल खेला जाता है उससे तो मानवता भी लजा जाए. लेकिन इनकी बेशर्मी बरकरार रहती है.
लगातार बारिश से नदियां पहले भी उफनती थीं, आज भी उफनती है और आगे भी उफनेंगीं. उफनना उनका काम है. आज वक्त सोचने, कुछ कारगर कदम उठाने का है. हम सोचें कि कैसे इस तबाही से बच सकते हैं. वक्त निर्णायक समाधान की ओर कदम बढ़ाने का है. एकदम से नहीं तो धीरे-धीरे ही सही. पिछले अनुभवों को देखते हुए कुछ बदलाव का वक्त है. यदि हम कुछ बेहतर कर पाएं तो शायद खुद अपनी बुद्धि पर गर्व कर सकें. खुद की नजरों में शर्मिंदा होने से बच जाएं. क्योंकि हम खुद को हमेशा अक्लमंद तो मानकर चलते हैं, लेकिन काम कम अक्ल वाले करते हैं. शर्मिंदा हमें ही होना चाहिए अपने आप पर. क्योंकि अब तक जिनसे उम्मीदें लगाकर रखीं थी उन्होंने चंद कागज के टुकड़ों में की फडफ़ड़ाहट और सिक्कों की खनक में ऐसी दीवानगी दिखाई है कि शर्मोहया बेच दी. बावजूद इसके उनसे उम्मीदें लगाए रखना कम अक्ल वालों का ही तो काम है.
वक्त का तकाज़ा है, संभलना तो हमें ही पड़ेगा बिना किसी से मदद की आस किए. तारीख गवाह है, प्रशासन ने अपने काम करने का एक ही तरीका पेटेंट करा रखा है, जो हमें सिवाए बर्बादी के कुछ नहीं देता. समस्या को टालना, यथासंभव उसे फल-फूलकर बढ़ा होने देना (क्योंकि समस्या जितनी बड़ी और लंबी खिंचेगी, भ्रष्टाचार उतना मीठा फल देगा) उसका शगल है. अब सोचना हमें है. सोचना ही नहीं बल्कि करना भी है. इन विनाश लीलाओं पर जो पैसा खर्च होता है, वह भी हमारा ही होता है. इसके बाद जो मदद हमें देश या विदेश से मिलती है, वह तो भ्रष्टाचारियों के लिए बोनस होता है. पैसा हमारा हम पर ही खर्च नहीं होता है. आपके गाढ़े खून-पसीने से भरे खजाने से निकलने वाली राशि अफसरों के जेब में जाती है और हम परेशान ही होते रहते हैं. समय, पैसा हमारा होता, परेशानी भी हम भोगते, जनहानि हमारे बीच से ही होती, गांव हमारे तबाह होते, फसलें हमारी चौपट होती, मवेशी हमारे मारे जाते और हम कुछ नहीं कर पाते सिवाए सरकारी मदद की आस लगाने के. अब हमें जीने का तरीका बदलना होगा. या तो खुद को बचाएं या फिर अपना हक लेना सीख जाएं.

रोहित नागे, इटारसी
94244-82883

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