सिवनी मालवा। भारतीय लोक-परंपरा और संस्कृति में प्रकृति तथा पशु-पक्षियों के संरक्षण का विशेष महत्व है। भाद्रपद (भादो) मास में मनाया जाने वाला ‘बछ बारस’ (वत्स द्वादशी) का पर्व इसी अनूठी परंपरा का प्रतीक है। सिवनी मालवा में सुहागिन महिलाओं ने गोमाताओं और बछड़ों की पूजा-अर्चना कर अपने पति व पुत्र की लंबी उम्र और परिवार की सुख-शांति की कामना की। स्थानीय निवासी संपत सारडा के निवास पर आयोजित इस सांस्कृतिक और धार्मिक अनुष्ठान में महिलाओं ने पूरे विधि-विधान से यह पर्व मनाया और समाज को गो-रक्षा का कड़ा संदेश दिया।
ओबड़ा बनाकर की पूजा, सुनी हंसराज-बंसराज की कथा बछ बारस पर्व की पूजन विधि बेहद पारंपरिक और प्रकृति से जुड़ी होती है। महिलाओं ने भैंस के गोबर से ‘ओबड़ा’ (प्रतीकात्मक तालाब) बनाया और उसमें पानी भरकर उसकी पूजा की। इस दौरान सभी ने मिलकर लोककथा ‘हंसराज-बंसराज’ की कहानी सुनी। गोमाता सुरक्षित रहें, इस भाव के साथ महिलाओं ने गाय की परिक्रमा लगाई और मधुर भजनों व कीर्तन से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। महिलाओं ने एक-दूसरे को बिंदी लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना की।
अन्न और चाकू का त्याग: मोटा अनाज खाकर रखा व्रत इस व्रत की सबसे बड़ी खासियत इसके कड़े और सात्विक नियम हैं। बछ बारस के दिन व्रती महिलाएं गेहूं, चावल और किसी भी धारदार हथियार (चाकू-हंसिया) से कटी हुई चीजों का सेवन नहीं करती हैं। इसके स्थान पर ज्वार, बाजरा, बेसन और मक्का जैसे मोटे अनाजों का उपयोग किया जाता है। परंपरा के अनुसार, शाम को गायों के गोधूलि बेला में घर लौटने से पहले ही महिलाओं द्वारा भोजन ग्रहण कर लिया गया।
‘कल्पना’ देकर लिया बुजुर्गों का आशीर्वाद भारतीय पारिवारिक मूल्यों को दर्शाते हुए, पूजन के पश्चात महिलाओं ने ‘कल्पना’ (बायना या शगुन) निकाली और अपनी सास, ननद और भाभियों के पैर छूकर उन्हें यह कल्पना भेंट कर आशीर्वाद लिया। साथ ही, बछ बारस के उज्जिने (उद्यापन) भी किए गए। संस्कृति और आस्था के इस सुंदर आयोजन में नीरू राठी, प्रेमलता तोषनीवाल, शीला सारडा, शीला खडलोया, सुनीता सारडा, वर्षा सारडा, अनुपमा तोषनीवाल, सुनीता तोषनीवाल, सविता टावरी, खुशबू सारडा, कविता खडलोया, पुनीता सारडा, रेखा पारीक, ममता पारीक, जया खंडेलवाल, नीतू शर्मा, प्रेरणा खंडेलवाल और सोनाली खंडेलवाल सहित बड़ी संख्या में मातृशक्ति उपस्थित रहीं।










