
- पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं ज्योतिष सलाहकार
लगभग चार दशक पहले की बात है। पुण्य सलिला मां नर्मदा की नगरी होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में जन्माष्टमी के अवसर पर गजब का हर्षोल्लास था। पूरे शहर में मटकी फोड़ प्रतियोगिता की धूम मची हुई थी। उन दिनों मैं भोपाल से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अखबार का जिला संवाददाता हुआ करता था, इसलिए हर घटनाक्रम पर मेरी गहरी नजर थी।
वह अजेय मटकी
उस वर्ष पूरे शहर में सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय बनी थी ‘अस्पताल चौराहे की मटकी’।
- अभूतपूर्व ऊंचाई : यह मटकी इतनी ऊंचाई पर बांधी गई थी कि उसे छूना भी नामुमकिन सा लग रहा था।
- बंधान : मटकी की रस्सी का एक सिरा अस्पताल परिसर में लगे एक विशाल नीम के पेड़ से और दूसरा सिरा स्व. ठाकुर प्रेम सिंह की बड़ी बिल्डिंग के ऊपर लगे एक खंभे से बंधा था।
रोमांच, संघर्ष और दुर्घटनाएं
- गोविंदाओं का जोश : शहर और आसपास के कई स्थानों से जोशीले गोविंदाओं की टोलियों ने अपना जौहर दिखाया, लेकिन कोई भी मटकी तक नहीं पहुंच सका।
- बढ़ती ईनाम राशि : हर दिन ईनाम की राशि बढ़ाई जा रही थी, जिससे युवाओं का उत्साह चरम पर था।
- लगातार तीन दिन का संघर्ष : मटकी फोडऩे के प्रयास में कई गोविंदा ऊंचाई से गिर रहे थे। यह सिलसिला लगातार तीन दिनों तक चलता रहा और कई युवाओं को गंभीर चोटें भी आईं।
प्रशासन का हस्तक्षेप और ऐतिहासिक जीत
जब स्थिति गंभीर होने लगी, तो जिला प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
- कलेक्टर का निरीक्षण : उस समय की बेहद लोकप्रिय और सख्त कलेक्टर, कीर्तिशेष श्रीमती किरण विजय सिंह ने घटनास्थल का स्वयं निरीक्षण किया।
- मटकी को नीचे करवाना : उन्होंने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रस्सी को नीचे करवाने और मटकी तोडऩे के स्पष्ट निर्देश दिए।
- अंतिम प्रहार : शाम होते-होते एक जांबाज टीम के ऊर्जावान नायक ने कड़ा संघर्ष करते हुए ऊपर पहुंचकर एक जोरदार मुक्का मारा और मक्खन, मिश्री व ड्राई-फूड्स से भरी वह मटकी फोड़ दी।
मटकी फूटते ही उपस्थित दर्शकों के बीच शोर-शराबा और अद्भुत खुशी का सागर उमड़ पड़ा। प्रशासन ने राहत की सांस ली और नगर की दिनचर्या धीरे-धीरे सामान्य हो गई। आज भी जन्माष्टमी आते ही नर्मदापुरम वासियों के होठों पर बरबस ही यह ऐतिहासिक घटना आ जाती है।
नर्मदे हर!










