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आप की कसम: जब वहम बन गया किसी की जिंदगी की तबाही

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अखिलेश शुक्ल] सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक , ब्लॉगर।

अखिलेश शुक्ल

“वहम की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी” – यह सच है दोस्तों!

क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटा सा शक किसी की पूरी जिंदगी कैसे तबाह कर सकता है? जरा सा वहम, एक बेबुनियाद संदेह, कैसे प्यार भरे रिश्तों को खाक में मिला सकता है? और सबसे दर्दनाक बात ये कि जब आंखें खुलती हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आज मैं आपको एक ऐसी फिल्म के बारे में बताने जा रहा हूं जो इंसानी मनोविज्ञान की उस गहराई को छूती है जहां शक और वहम किसी को पागल बना सकते हैं। 1974 में रिलीज़ हुई “आप की कसम” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि जिंदगी का आईना है।

तो चलिए, इस दिलचस्प सफर पर चलते हैं…

जब पंचम दा ने बांधा था संगीत का जादू

बात 3 मई 1974 की है। जब जे. ओमप्रकाश जी ने अपने करियर की पहली फिल्म “आप की कसम” से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। वो भी ऐसी जगह, जो आज भी खाली नहीं हुई। ये फिल्म उनके लिए बेहद खास थी क्योंकि उन्होंने इसे डायरेक्ट भी किया और प्रोड्यूस भी। और संगीत? राहुल देव बर्मन उर्फ पंचम दा का जादू! उन्होंने इस फिल्म में ऐसा संगीत दिया कि लोग आज भी गुनगुनाते हैं। सबसे खास गीत था “जय जय शिव शंकर, कांटा लगे ना कंकड़” – जिसे आनंद बक्षी जी ने अपने शानदार शब्दों में पिरोया था।

क्या आपको पता है? ये गीत अमीन सयानी जी के शो ‘बिनाका गीतमाला’ की 1974 की सालाना लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहा था! दूसरे नंबर पर! कितना बड़ा कमाल है ना?

स्टार कास्ट: जब तीन दिग्गजों ने दिखाया जलवा

इस फिल्म में तीन ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने अपनी-अपनी भूमिका में जान फूंक दी:

राजेश खन्ना – जिन्हें हम सब स्टार खन्ना के नाम से जानते आये हैं।

मुमताज़ – अपनी अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली अभिनेत्री।

संजीव कुमार – जो अपने आप में एक इंस्टिट्यूट थे।

इसके अलावा रहमान, दीना पाठक, जयश्री टी, रंजीत, ए.के. हंगल, मुराद, जूनियर महमूद, ब्रह्म भारद्वाज, असरानी, सुंदर, सत्येन कप्पू और केष्टो मुखर्जी जैसे कलाकारों ने अपनी सहायक भूमिकाओं से फिल्म को और भी मजबूत बनाया।

कहानी का जादू: जब प्यार ने भरोसे को हरा दिया

प्यार की शुरुआत

शादी के बाद दोनों का जीवन बहुत अच्छा चलता है। कमल को अपनी मेहनत के दम पर एक अच्छी नौकरी मिलती है और वो अपना घर भी खरीद लेता है। इसमें उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन (संजीव कुमार) उसकी मदद करता है।

इस कहानी की शुरुआत कितनी सुंदर है। कमल (राजेश खन्ना) एक गरीब घर का नौजवान है। पढ़ा-लिखा है, ईमानदार है। उसे प्यार हो जाता है सुनीता (मुमताज) से, जो एक मजबूत और बड़े परिवार की बेटी है। जब दोनों शादी करने का फैसला करते हैं, तो सुनीता के घरवाले विरोध नहीं करते। क्योंकि कमल पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान है। लगा कि सब अच्छा होगा।

शुरुआती खुशियां

मोहन एक हंसमुख इंसान है। वो कमल के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहता है।

जब गुलाब भी कांटे बन गए

लेकिन हर खुशी के पीछे दुख छिपा है। मोहन अपनी पत्नी के चाल-चलन से दुखी रहता है। सुनीता को मोहन पर तरस आता है और वो उससे सहानुभूति जताती है। दोनों के बीच अच्छी बातचीत होने लगती है।

और फिर… शुरू होता है वहम का खेल।

कमल को शुरू में तो कुछ अजीब नहीं लगता, लेकिन धीरे-धीरे उसे शक होने लगता है कि उसकी पत्नी और उसके दोस्त के बीच कुछ गड़बड़ है। और इसी शक ने उसे अंधा बना दिया।

जब शक ने दोस्ती और प्यार दोनों को तोड़ दिया

कमल का शक इतना बढ़ा कि सुनीता को अपने घर से जाना पड़ा। मोहन से भी उसके रिश्ते खराब हो गए। मोहन ने बहुत कोशिश की कि सब कुछ सही कर सके। उसने सुनीता को सलाह दी कि वो कमल के सामने उसे राखी बांधें ताकि कमल को यकीन हो जाए कि उनके बीच भाई-बहन का रिश्ता है। लेकिन… सुनीता के पिता ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने कमल को तलाक का नोटिस भेज दिया। और फिर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था – कमल और सुनीता का तलाक हो गया।

सच्चाई का सामना

एक दिन कमल ने मोहन के घर में एक आदमी को चुपके से घुसते देखा। उसने उसे पकड़ा और कड़ाई से पूछताछ की।

सच्चाई सामने आई: वो आदमी मोहन की पत्नी का प्रेमी था। और मोहन का सुनीता के साथ कोई गलत रिश्ता नहीं था। इस सच्चाई ने कमल को चकनाचूर कर दिया। अपने सबसे अच्छे दोस्त पर शक करना – ये उसे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा गुनाह लगा। उसने मोहन से माफी मांगी और मोहन ने उसे माफ कर दिया। अब बस एक काम बाकी था – सुनीता को मनाना।

जब वहम ने बिछड़ने के बाद भी नहीं छोड़ा

कमल सुनीता के घर पहुंचा, उम्मीद से कि वो उसे मना लेगा। लेकिन वहां उसे पता चला कि सुनीता के पिता ने उसकी दूसरी शादी करा दी है। सुनीता ने कई बार मना किया, लेकिन उसके पिता ने इमोशनल ब्लैकमेल करके उसे राजी कर लिया था। यह जानकर कमल टूट गया। उसने सब कुछ छोड़ दिया। घर-बार, नौकरी, सम्मान – सब कुछ।

सड़कों पर भटकता इंसान

सालों बीत गए। कमल अब एक भिखारी बन चुका था। बूढ़ा, थका-हारा, और अकेला। एक दिन वो अपने पुराने घर की यादें ताजा करने आया। लेकिन वहां अब कोई और परिवार रहता था। जब उसने अंदर घुसने की कोशिश की, तो लोगों ने उसे चोर समझकर पीटा। लेकिन किस्मत ने उसे नहीं छोड़ा था। उसके सच्चे दोस्त मोहन ने उसे पहचान लिया और बचा लिया।

जब दर्द ने एक और करवट ली

मोहन ने कमल को अपने घर बुलाया और एक खत दिया जो सुनीता ने उसे लिखा था। उस खत में सुनीता ने लिखा था कि जब उसने कमल का घर छोड़ा था, तब वो गर्भवती थी। उसने अपने बच्चे की खातिर दूसरी शादी की थी और उस बच्ची का नाम रखा – एकता। अब एकता की शादी होने वाली थी, और सुनीता के दूसरे पति चाहते थे कि एकता को उसके असली पिता का आशीर्वाद मिले।

क्या कमल अपनी बेटी की शादी में जाएगा?

कमल इतना शर्मिंदा था कि वो अपनी ही बेटी की शादी में नहीं जाना चाहता था। लेकिन मोहन ने उसे मना लिया। वहां पहुंचकर कमल ने सुनीता के सामने आने का साहस नहीं किया और मेहमानों की भीड़ में खो गया। सुनीता और उसके पति चाहते थे कि एकता का कन्यादान कमल ही करे, लेकिन वो सामने नहीं आया, तो सुनीता के दूसरे पति ने कन्यादान कर दिया।

दर्दनाक अंत: जब आग ने सब कुछ बदल दिया

जश्न के दौरान आतिशबाजी शुरू हुई। उसी आतिशबाजी से मैरिज हॉल में भीषण आग लग गई। सब अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। इसी भागमभाग में एकता आग में फंस गई। कमल ने अपनी बेटी को आग से बचा तो लिया, लेकिन वो खुद बुरी तरह घायल हो गया। एकता ने अपनी मां से कहा कि इस आदमी ने मेरी जान बचाई। तब सुनीता ने बताया – ये तुम्हारे असली पिता हैं।एकता के सौतेले पिता ने उसे कमल के पैर छूने को कहा। कमल ने अपनी बेटी को आशीर्वाद दिया, उसे प्यार किया… और फिर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

निष्कर्ष 

“आप की कसम” की यह कहानी हमें सिखाती है कि:

शक और वहम किसी भी रिश्ते को तोड़ सकते हैं। भरोसा सबसे कीमती चीज है। जब आंखें खुलती हैं, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है। सच्चे दोस्त जीवन का सबसे बड़ा खजाना होते हैं। प्यार, गलतियों को भी माफ करना सिखाता है।

क्या आपने कभी किसी पर बेवजह शक किया है? या आपके साथ किसी ने ऐसा किया है? अगर हां, तो आज ही उस रिश्ते को सुधारने की कोशिश करें। क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है, और प्यार बहुत बड़ा।

Rohit Nage

रोहित नागे वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में तीन दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक किया है तथा लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। अपने पत्रकारिता जीवन में उन्होंने दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राज एक्सप्रेस, पीपुल्स समाचार, नवभारत सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में रिपोर्टर, उप-संपादक, ब्यूरो प्रमुख एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य किया है। वे Narmadanchal.com के रिपोर्टर, उप-संपादक, एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य कर रहे हैं और नर्मदांचल क्षेत्र की निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय समाचारों पर विशेष रूप से लेखन एवं संपादन कार्य कर रहे हैं।

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