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राष्ट्र के शिल्पकार और भटकती युवा पीढ़ी के दिशा-सूचक

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मंजू ठाकुर,
  • मंजू ठाकुर, 9424482884

आज 5 सितंबर है, महान शिक्षाविद और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती, जिसे पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में कृतज्ञता के साथ मनाता है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को ‘राष्ट्र निर्माता’ का सर्वोच्च दर्जा प्राप्त है। यह केवल कोई अलंकारिक पदवी नहीं है, बल्कि समाज द्वारा सौंपी गई एक अत्यंत गंभीर जिम्मेदारी है। किसी भी देश का भविष्य उसकी कक्षाओं की चारदीवारी के भीतर चुपचाप आकार लेता है, और उस कच्चे भविष्य को तराशकर एक सुदृढ़ रूप देने वाले कुशल हाथ एक शिक्षक के ही होते हैं।

आदर्श और विसंगतियों के बीच का यथार्थ

आजकल जहां एक ओर अपने नवाचारों और असीमित समर्पण से शिक्षा की तस्वीर बदलने वाले शिक्षकों की प्रेरक कहानियां हमारा ध्यान खींचती हैं, वहीं कुछ ऐसी अप्रिय खबरें भी मन व्यथित करती हैं जो शिक्षा के पवित्र मंदिर को कलंकित करती हैं। बच्चों को प्रताडि़त करना, उनका शोषण, नशे की हालत में स्कूल पहुंचना, या विद्यालयों में लटकते ताले—ये घटनाएं समाज को झकझोर देती हैं। परंतु, हमें यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षक भी इसी समाज का एक मानवीय हिस्सा हैं। जब किसी कारणवश विवेक साथ छोड़ देता है या ‘मति मारी जाती है’, तो ऐसी विसंगतियां जन्म लेती हैं। लेकिन चंद अपवादों और नकारात्मक उदाहरणों के आधार पर हम संपूर्ण शिक्षक बिरादरी के विराट और निस्वार्थ योगदान को कभी भी खारिज नहीं कर सकते।

आधुनिक भटकाव और शिक्षक की नई भूमिका

वर्तमान डिजिटल और भौतिकवादी युग में, जहां इंटरनेट पर सूचनाओं की बाढ़ है, वहां एक सच्चे शिक्षक की जरूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। आज का युवा सोशल मीडिया के मायाजाल, नशे की लत और नैतिक पतन के बीच तेजी से भटक रहा है। इस भटकाव को रोकने में आज की शिक्षा और शिक्षक की भूमिका बहुत स्पष्ट होनी चाहिए।

  • किताबी ज्ञान से परे जाकर छात्रों के भीतर सही और गलत का सटीक विवेक जागृत करना।
  • युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य, अवसाद और उनके मौन संघर्षों को आत्मीय संवाद के जरिए समझना।
  • आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ गहरी मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों की नींव मजबूत करना।
  • छात्रों को केवल एक सफल पेशेवर मशीन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, सहनशील और चरित्रवान नागरिक बनाना।

निष्कर्ष : सम्मान और दायित्व का संतुलन

शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। समाज को भी शिक्षकों के प्रति अपना पुराना सम्मान और विश्वास पुन: स्थापित करना होगा। इसके समानांतर, शिक्षकों को भी अपने पेशे की उस गरिमा को बनाए रखना होगा जो उन्हें आम इंसानों से ऊपर उठाकर ‘गुरु’ का दर्जा दिलाती है। जब गुरु और समाज दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझेंगे, तभी इस देश का वास्तविक और सशक्त निर्माण संभव होगा।

Rohit Nage

रोहित नागे वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में तीन दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक किया है तथा लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। अपने पत्रकारिता जीवन में उन्होंने दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राज एक्सप्रेस, पीपुल्स समाचार, नवभारत सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में रिपोर्टर, उप-संपादक, ब्यूरो प्रमुख एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य किया है। वे Narmadanchal.com के रिपोर्टर, उप-संपादक, एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य कर रहे हैं और नर्मदांचल क्षेत्र की निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय समाचारों पर विशेष रूप से लेखन एवं संपादन कार्य कर रहे हैं।

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