बहुरंग – ‘टाइगर नहीं’ “मानवता” अभी जिंदा है

बहुरंग – ‘टाइगर नहीं’ “मानवता” अभी जिंदा है

– विनोद कुशवाह (Vinod Kushwaha) :

 मुख्यमंत्री बनने के पहले शिवराज सिंह चौहान ने प्रेस से बात करते हुए कहा था, “टाइगर अभी जिंदा है” बाद में भाजपा में पूरे दल बल के साथ शामिल होने पर महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी यही डायलॉग दोहराया था। दरअसल सलमान खान अभिनीत फिल्मों में ‘ टाइगर ‘ क्या जिंदा हुआ नेताओं में भी ‘टाइगर वायरस’ घुस गया। वो जमाने गए जब नेता दिनकर, पंत, निराला, बच्चन. दुष्यंत को कोट करते थे । दुष्यंत कुमार को तो अब तक सड़क छाप नेता से लेकर हाई प्रोफाइल नेता तक गलत-सलत उद् धत् करते रहे हैं। क्योंकि इन नेताओं में से शायद ही किसी नेता ने दुष्यंत कुमार श्रीवास्तव के गजल संग्रह “साये में धूप” को अलट-पलट कर देखा हो। उन्हें ये भी नहीं मालूम होगा कि हिंदी में गजल लिखने की परंपरा की शुरुआत् का श्रेय सिर्फ और सिर्फ दुष्यंत कुमार को ही जाता है। खैर मैं तो केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि टाइगर जिंदा है या नहीं ये मुझे नहीं मालूम क्योंकि न मेरे को सलमान खान की फिल्में देखने में रुचि है और न ही शिवराज या सिंधिया के वक्तव्यों में कोई दिलचस्पी है। मैं तो केवल इतना जानता हूं कि “मानवता अभी जिंदा है”।
कल ही के एक दैनिक अखबार में मैंने पढ़ा कि हरदा जिले के सिराली कस्बे में रानीपुरा क्षेत्र की एक मुस्लिम बाहुल्य बस्ती है । वहां एक गाय जब नाली में गिर गई तो बस्ती के मुस्लिम भाईयों से उसका तड़पना नहीं देखा गया। वे तुरंत दौड़ कर गए और उन्होंने आगे आकर उस गाय को बचाया। इसके पहले कोरोना काल का एक और समाचार आपने पढ़ा होगा कि कोरोना से मृत्यु होने पर कैसे इंदौर में एक हिन्दू दोस्त की मदद करते हुए उसके मुस्लिम दोस्तों ने बिना अपनी जान की परवाह किये। आगे आकर अपने दोस्त के परिजन का अंतिम संस्कार पूरे विधि विधान से सम्पन्न कराया। जबकि कोरोना के भय के कारण हिन्दू समुदाय का एक भी व्यक्ति सामने नहीं आया। इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में कृष्णायन नाम का व्यक्ति अपने पड़ोस में रह रहे एक मुस्लिम परिवार के घर में आग लगने पर अपनी जान की परवाह न करते हुए आग में कूद पड़ा था और कृष्णायन ने आखिरकार इस परिवार को आग में झुलसने से बचा लिया। उपरोक्त घटना का दुखद पहलू ये है कि अपने मुस्लिम भाईयों को बचाने के प्रयास में कृष्णायन अपनी जान गंवा बैठा। जब नेता झूठी वाहवाही लूटने के लिये कृष्णायन के यहां राहत राशि का चैक लेकर गए तो उसकी पत्नी ने ये कहते हुए चैक लेने से मना कर दिया कि “मेरे पति ने इसलिये मुस्लिम भाईयों की जान नहीं बचाई कि उसके बदले में उनके परिवार को कोई अनुग्रह राशि मिलेगी। ये हमारा और उस परिवार का प्रेम था जिसकी खातिर मेरे पति ने अपनी जान तक दे दी”।

साम्प्रदायिक सद्भाव के ऐसे मैं कई उदाहरण दे सकता हूं लेकिन बात यहां ” मानवता ” की हो रही है और मानवता महानगरों अथवा शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों या कस्बों में ज्यादा देखने को मिलती है । शहर अथवा महानगरों से तो ये कब की रुखसत हो चुकी है । महानगरों में तो लोग घायल होने के बाद भी सड़क पर पड़े तड़पते रहते हैं मगर कोई रुककर उनकी मदद नहीं करता । राह चलते जो लोग रुकते भी हैं तो मात्र मोबाईल पर वीडियो बनाने के लिए । दूसरी ओर किसी गांव के पास कोई दुर्घटना होती है तो गांव के सारे लोग मदद के लिये दौड़ पड़ते हैं । चाहे कार दुर्घटना हो या रेल दुर्घटना । बाढ़ आई हुई हो या कहीं पर भी आगजनी की घटना हुई हो । आपको स्मरण ही होगा इटारसी के पास के एक गांव में हुआ वह हादसा जिसमें खेत की नरवाई जलाने पर कितने लोगों की मौत हो गई थी और कितने लोग आग में झुलस गए थे । ऐसे समय प्रशासन तो बाद में मदद के लिए पहुंचा था उसके पहले गांव के लोगों ने घटना स्थल पर पहुंचकर लोगों की जान बचाने के लिये भाग-दौड़ शुरू कर दी थी । इतना ही नहीं आसपास के गांव के लोग भी सहायता के लिए पहुंच गए थे । गांव ही नहीं कस्बों और शहरों में भी यदा – कदा ऐसी घटनायें देखने को मिल जाती हैं क्योंकि वहां भी अभी पूरी तरह से ‘ मानवता ‘ खत्म नहीं हुई है । ” मानवता अभी ज़िंदा है ” । कुछ लोग हैं जो आज भी मानवता को ऑक्सीजन पर ज़िंदा रखे हुए हैं । अभी भी कुछ लोग मोबाईल पर वीडियो बनाने के बजाय मदद करने का मन रखते हैं । घायलों को पहले अस्पताल पहुंचाने में विश्वास रखते हैं ।
हम पुलिसवालों को सख़्त मिजाज मानते हैं । कितनी बार हम अखबारों में पढ़ते हैं कि ड्यूटी अथवा मीटिंग में जाते हुए किसी पुलिस अधिकारी ने कैसे प्राथमिकता के आधार पर एक घायल को अस्पताल पहुंचाया । पिछले दिनों ही एक और समाचार पढ़ने में आया था कि किसी काम से हॉस्पिटल पहुंचे एक पुलिस अधिकारी को जब मालूम हुआ कि वहां भर्ती एक मरीज को तत्काल ब्लड की आवश्यकता है परंतु जिस ब्लड ग्रुप की जरूरत है वह मिल नहीं रहा है । उक्त पुलिस अधिकारी ने तत्काल डॉक्टर से सम्पर्क कर बताया कि उनका भी वही ब्लड ग्रुप है जो मरीज को चाहिये । इस तरह उन्होंने मरीज की जान बचाई । तो ये है असल ‘ टाइगर ‘ क्योंकि उसमें ” मानवता अभी ज़िंदा है ” । मैं अपने एक मित्र के यहां गया तो ये देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उनके यहां एक हॉल में 10 – 12 कुत्ते बंधे हुए थे । सबके सामने प्लेटें रखीं हुईं थी जिसमें ब्रेड और बिस्किट थे । हरेक के सामने मग में पानी भी रखा हुआ था । हॉल के चारों कौनों में डेजर्ट कूलर लगे हुए थे । मैंने उनसे पूछा – ‘ आपको कुत्ते पालने का शौक है ? ‘ वे बोले  – ‘ नहीं भैया । इनमें से कुछ तो मुझे सड़क पर घायल पड़े मिले और कुछ को उनके मालिकों ने बीमार होने पर सड़क पर छोड़ दिया था । मैं इन्हें उठा लाया । अब तो ये ठीक भी हो गए हैं । इनको आप तब देखते जब मैं इनको सड़क से उठाकर लाया था । ‘ मेरी आंखें नम थीं ये सोचकर कि ” मानवता अभी ज़िंदा है ” । मेरे एक अधीनस्थ कर्मचारी कुछ समय पूर्व जब ऑफिस आये तो उनकी जर्किन की जेब में मैंने हलचल सी महसूस की । जब मैंने उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने एक पंख कटी चिड़िया मेरे टेबल पर रख दी । मेरे उनसे पूछने पर कि – ‘ ये आपको कहां मिली ? ‘ उन्होंने जवाब दिया – ‘ रास्ते में सड़क पर पड़ी मिली सर । ‘ मैंने उनसे सवाल किया – ‘ ये तो अब कभी उड़ नहीं पाएगी ? ‘ उन्होंने उत्तर दिया – ‘ आप ठीक कह रहे हैं सर । इसलिये मैं इसको उठा कर लाया हूं । जब तक जीवित है , ये मेरी जिम्मेदारी रहेगी । ‘ मेरी आंखें फिर नम थीं । अब की बार आंखों में आंसू भी थे । ये सोचकर कि मनुष्यता अभी बची हुई है । ” मानवता अभी ज़िंदा है “। देखकर अच्छा लगा कि हम में से ही हमारे कुछ साथी केवल मनुष्यों के प्रति ही नहीं पशु -पक्षियों के प्रति भी संवेदनशील हैं । हालांकि अफसोस इस बात का है कि कुछ दिन बाद वो चिड़िया नहीं रही और अभी कुछ दिन पहले ही नहीं रहे मेरे वे सहयोगी भी नहीं रहे पर मैं बिल्कुल भी निराश नहीं हूं मेरे दोस्त क्योंकि ‘ टाइगर ‘ नहीं  ” मानवता अभी ज़िंदा है ” । 

विनोद कुशवाह

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