बहुरंग: वो जब याद आये…बहुत याद आये

बहुरंग: वो जब याद आये…बहुत याद आये

 विनोद कुशवाहा/ इटारसी में कविता का इतिहास बहुत पुराना है। बात भारती जी से शुरू होकर युवा कवि सारांश पर खत्म हो जाती है। स्व विनय कुमार भारती , स्व विपिन जोशी , स्व विनय दुबे , स्व नत्थूसिंह चौहान , सावित्री शुक्ल , मनोहर पटेरिया ‘ मधुर ‘ , दिनेश द्विवेदी , ओम भारती , कैलाश डोंगरे , सनत मिश्र , विपिन पवार , सुधांशु मिश्र जैसे कितने ही नाम हैं जिनसे हमारा साहित्य संसार समृद्ध हुआ है। मंचीय कवियों का यहां उल्लेख करना अपमानजनक होगा। शर्मनाक होगा। सो उनकी बात अलग से फिर कभी। … क्योंकि इटारसी की साहित्यिक यात्रा में जो मील के पत्थर रहे हैं उनकी ही गिनती करना बेहतर होगा। सर्वश्री मदन बड़कुर ‘ तन्हाई ‘ , डॉ सतीश ‘ शमी ‘ , तरुण तिवारी ‘ तरु ‘ , गुलाबदास भम्मरकर इस तपती धूप में पैदल चल रहे वे यात्री हैं जिनके पैरों के छाले देखने वाला कोई शख्स इटारसी में मौजूद नहीं है । मरहम तो छोड़िए नमक छिड़कने वाले आपको हर गली में जरूर मिलेंगे । खैर । ऐसे लोग बाज तो आने वाले नहीं । इन कवियों का सुनहरा भविष्य उनको जवाब देगा। इस सबकी चर्चा भी फिर कभी । फिलहाल बात उन गुमनाम कवियों की जिनका नाम भी किसी ने नहीं सुना होगा। जिनसे इटारसी की कवि गोष्ठियां गुलजार हुआ करती थीं। जो कवि गोष्ठी की रौनक रहा करते थे। सर्वश्री चन्द्रकान्त शर्मा ‘ चिंतक ‘ , मनमोहन मालवीय , पटौदिया जी , सद्दू लाल ‘ गौहर ‘ , सुरेन्द्र दुबे जैसे कितने ही नाम हैं जो गुमनामी के अंधेरों में खो गए  उन्हें इस शहर ने कभी याद नहीं किया। सही मायने में इटारसी उनका शहर है। किसी ऐरे – गैरे का नहीं। स्व डॉ चन्द्रकान्त शास्त्री ‘ राजहंस ‘ अपनी कविता में यही तो कहते थे। समझने वाले को इशारा ही काफी होता है। डॉ शास्त्री के शब्दों में –

ये कंगूरे कलश जिन पर इतरा रहे
मैं उसी नींव का मौन पाषाण हूं।

चिंतक जी सही मायने में विपिन परंपरा के कवि थे । उनके गीतों की लय और ताल में श्रोता अपनी सुध-बुध भूल जाते थे । सफेद झक कुर्ता – पजामा पहने चिंतक जी की रेशमी आवाज का जादू सर चढ़कर बोलता था ।

ठीक यही हाल मनमोहन मालवीय का था । सफेद कुर्ता – पजामा जैसे कवियों की पहचान बन गई थी । ये परंपरा मम्मा नत्थू सिंह चौहान और सी बी काब्जा तक चली । एक शख्सियत और है जिसने इस लिबास को अब तक नहीं छोड़ा है । वो है मानसरोवर की पाठशाला के मेरे सहपाठी भाई माखनलाल मालवीय जो भले ही सिवनी मालवा के होकर रह गए लेकिन इटारसी उनकी रग – रग में बसी है । मनमोहन मालवीय को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा और निजी जीवन के अलावा गोष्ठियों में भी मनमोहन मालवीय का साथ उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। दोनों जैसे एक – दूसरे के पूरक थे।

पटौदिया जी भी इसी कुर्ता – पजामा की परंपरा के कवि थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उनका कुर्ता बासंती रंग लिए होता था और उनकी कविताएं भी फाल्गुनी , बासन्ती होती थीं । स्वभाव से धीर – गम्भीर कवि पटौदिया जी की कवितायें भी ज्यादातर गम्भीर ही हुआ करती थीं।

अब इन सबसे हटकर बात कवि गीतकार स्व सुरेन्द्र दुबे की जो सेवानिवृत्त शिक्षक जरूर थे पर शासकीय सेवा में रहते हुए भी कविता ही उनकी सच्ची सखी – सहेली थीं । उस दौर में किसी भी गोष्ठी की शुरुआत् तभी हो पाती थी जब सुरेन्द्र दुबे पूरे उत्साह और श्रद्धा से झूमकर सरस्वती वंदना प्रस्तुत करते थे।

इस कालम के अंत में जिनका ज़िक्र करूंगा वे बेहद मशहूर और मशरूफ शायर थे। अफसोस कि नई पीढ़ी की तो छोड़िए इस दौर के अधकचरे कवि भी उनके नाम से वाकिफ नहीं होंगे। ‘ अधकचरे ‘ की श्रेणी में इनको इसलिये रखा कि न तो इन कवियों को उस दौर के सहज , सरल , सौम्य कवियों में रखा जा सकता है , न ही नई पीढ़ी उनको स्वीकार कर पा रही है। इस योग्य वे हैं भी नहीं। हां , इटारसी के साहित्य जगत में राजनीति और गुटबंदी का श्रेय उन्हें अवश्य दिया जा सकता है। इस सबकी चर्चा करना भी बेमानी है। लज्जा जनक है। तो हम बात कर रहे थे गौहर साहब की। उनके शेर आज भी कानों में गूंजते हैं। उनकी मखमली आवाज सुरमई शामों की गोष्ठी में कयामत ढाती थी। गौहर साहब की भावपूर्ण गजलें सुनकर सुनने वाले होश खो बैठते थे।

तो लिखने – पढ़ने और सुनने – सुनाने का सिलसिला यहीं खत्म होता है उन कवियों को ” नर्मदांचल परिवार ” की विनम्र श्रद्धांजलि के साथ जो हमारे बीच अब नहीं रहे। वे भले ही सशरीर मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी कविता की बांसुरी के स्वर हवा में हमेशा तैरते रहेंगे। बस।

 

विनोद कुशवाहा (Vinod Kushwaha)

 

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