व्यक्ति चित्र: भगत जी की चाय- विनोद कुशवाहा

व्यक्ति चित्र: भगत जी की चाय- विनोद कुशवाहा

विनोद कुशवाहा…जी हां आपने सही पहचाना। ये भगत जी ही हैं। भगत जी के नाम से लोग उन्हें जानते हैं। पहचानते हैं। वैसे हैं वे अग्रवाल। मैं उन्हें बचपन से जानता हूं । भगत जी भी शायद मुझे बचपन से जानते होंगे । इसका सीधा सा कारण है यह कि हम दोनों इटारसी के एक ही मोहल्ले में रहते थे।

…लेकिन उनकी छाप इसलिये उनके अनुकूल बैठती है क्योंकि वे स्वभाव से भी भगत जी ही हैं । उनकी सहजता, सरलता, आत्मीयता और अपनत्व ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। ईश्वर में उनकी अपार श्रद्धा है। वे नियमित रूप से मंदिर जाना कभी नहीं भूलते। यही वजह है कि भगवान भी अपने भगत को याद रखते हैं। सुबह 7 बजे से रात्रि लगभग 8 बजे तक उनकी चाय कहर ढाती रहती है। सुबह ग्राहक जय स्तम्भ पर आकर पहले मंजीत भाई के यहां नाश्ता करते हैं फिर भगत जी की शानदार चाय का जायका लेते हैं। रविवार को भगत जी अपनी होटल आधे दिन बन्द रखते हैं। ये उनका अपना नियम है। इसके अलावा भी वे सारे नियमों का पालन करते हैं। चाहे गुमाश्ता एक्ट हो या लॉक डाउन का कोई भी नियम। उन्हें हर नियम मान्य है। मैंने कभी किसी नाबालिग बच्चे को उनके यहां काम करते हुए नहीं देखा।

नेता से लेकर अभिनेता तक, पत्रकार से लेकर साहित्यकार तक, छात्रों से लेकर प्रोफेसर तक , छोटे से लेकर बड़े तक , गरीब से लेकर अमीर तक , हिन्दू से लेकर हमारे मुस्लिम भाइयों तक सब भगत जी की चाय के दीवाने हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव का ऐसा नजारा आपको कहीं देखने को नहीं मिलेगा। इतना ही नहीं कुछ भिखारीनुमा व्यक्ति भी उनकी होटल के आसपास खड़े या बैठे रहते हैं। या तो कभी ग्राहक ही उन्हें चाय पिला देते हैं या फिर किसी जरूरतमंद भिखारी के पास खुद भगत जी चाय भिजवा देते हैं। साधु-संतों का आना-जाना भी उनकी होटल पर लगा रहता है। भगत जी अपने ढंग से साधु-संतों की आव भगत करते रहते हैं। कभी उनकी चाय दुकानों तक पहुंचती है तो कभी खुद दुकानदार गद्दी छोड़कर उनके यहां अपनी मित्रमंडली के साथ चाय का स्वाद लेने के लिये आ जाते हैं। इनमें से कुछ ने तो भगत जी की होटल पर मिलने का समय निश्चित कर रखा है। तो भगत जी की होटल एक तरह से दोस्ती निभाने का स्थान भी बन गई है। इन सबके अलावा रेलवे के अधिकारियों से कर्मचारियों तक उनकी चाय पीना नही भूलते। चाहे वे भोपाल, जबलपुर से आ रहे हों या फिर खंडवा, नागपुर से। चाय भगत जी के यहां ही पीना पसन्द करते हैं। जो ग्राहक किसी वजह से भगत जी की होटल तक नहीं पहुंच पाते वे अपने लिए पार्सल चाय बुलवा लेते हैं। तो ये भगत जी की चाय नहीं उनकी चाह है। वही दूध है, वही पानी है, वही शक्कर है, वही चाय की पत्ती है, वही अदरक- इलायची है, वही मसाला है । फिर भी उनकी चाय कमाल करती है क्योंकि स्वाद चाय में नहीं बल्कि उनके हाथ में  ‘चाय ‘ और  ‘चाह ‘ का जादू है ।

भगत जी बाहर जाने वाली चाय का हिसाब भी रखते हैं । उनके सामने स्लेट कलम रखी रहती है। आज भी भगत जी का गुणा भाग स्लेट कलम से ही चलता है। हां उनके यहां काम करने वाले कर्मचारी जरूर वसूली के लिए डायरी पेन का इस्तेमाल करते हैं।

तो ये है भगत जी की ‘चाय’ और दिल में है उनके ग्राहकों की ‘चाह’। कहा जाता है कि ग्राहक भगवान होता है। यदि ये सच है तो ये भी सच है कि भगत जी पर भगवान की अपार अनुकम्पा है।… क्योंकि भगवान की कृपा उन पर निरन्तर बरस रही है।

विनोद कुशवाहा(Vinod Kushwaha)

Contect number-9644543026

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  • comment-avatar
    Ajay Vardhan 4 months

    🙏👍✌🙏

  • comment-avatar
    विपिन पवार 4 months

    श्री विनोद कुशवाहा द्वारा लिखित व्यक्तिचित्र भगत की चाय पढ़ा। बहुत सुंदर व्यक्तिचित्र है। बधाई । अच्छा व्यक्तिचित्र वह होता है जिसको पढ़कर संपूर्ण व्यक्तित्व आंखों के आगे साकार हो जाता है, यह व्यक्तिचित्र इस कसौटी पर खरा उतरता है। वैसे मुझे इटारसी में वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन सिंह सिसोदिया की चाय खूब याद आती है मैं और विनोद भाई प्रतिदिन उनके यहां चाय पीते थे अर्जुन भाई बहुत स्नेह से खुद ही चाय बनाते थे

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