वट पूर्णिमा व्रत कब हैं जानिए विशेष पूजन विधि,महत्‍व और शुभ मुहूर्त सम्‍पूर्ण जानकारी 2022…

वट पूर्णिमा व्रत कब हैं जानिए विशेष पूजन विधि,महत्‍व और शुभ मुहूर्त सम्‍पूर्ण जानकारी 2022…

वट पूर्णिमा व्रत कब हैं जानिए विशेष पूजन विधि,महत्‍व और शुभ मुहूर्त सम्‍पूर्ण जानकारी…

वट पूर्णिमा व्रत कब मनाया जाता है? (When Is The Vat Purnima Fast Observed) 

वट पूर्णिमा

सुहागन महिलाएं ज्येष्ठ अमावस्या तिथि के 15 दिन बाद वट पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखकर पूजा करती हैं। इस बार यह व्रत 14 जून 2022 दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन सुहागन महिलाएं भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी के साथ-साथ बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।

वट पूर्णिमा व्रत मुहूर्त (Muhurat For Vat Savitri Vrat)

वट सावित्रि

वट पूर्णिमा शुरू तिथि : 13 जून 2022 दिन सोमवार की रात 09:02 से
वट पूर्णिमा समाप्‍त तिथि : 14 जून 2022 दिन मंगलवार की शाम 05:21 बजे तक।
वट पूर्णिमा पूजा करने का शुभ मुहूर्त : 14 जून की सुबह 11 बजे से 12:15 बजे तक।

वट पूर्णिमा व्रत का महत्व (Importance Of Vat Purnima Vrat)

वट सावित्रि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा अपने पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख की कामना करने के लिए करती हैं। वट के वृक्ष की पूजा करने का आशय यह हैं कि वट वृक्ष की शाखाओं को सावित्री का रूप माना जाता हैं। सावित्री ने ही कठिन तपस्या करके अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आई थी। इसके साथ ही बरगद के पेड़ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना जाता हैं।

वट पूर्णिमा व्रत पूजा विधि (Vat Purnima Vrat Puja Method)

वट सावित्रि

वट पूर्णिमा का व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्‍दी स्‍नान करके लाल रंग या किसी शुभ रंग के कपड़े पहन कर वट वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान तथा यम की मिट्टी की मूर्तियां स्थापित करें। और वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें फिर मौली, रोली, कच्चा सूत, भीगे चने, फूल आदि से पूजा करें। इसके बाद वट वृक्ष के चारों और कच्‍चा सूत लपेटकर 7 परिक्रमा करें। और सत्यवान सावित्री की कथा को ध्‍यानपूर्वक सुनना चाहिए।

वट पूर्णिमा व्रत के नियम (Vat Purnima Fasting Rules)

वट सावित्रि

  • इस इस व्रत को रखने वाली महिलाएं को व्रत के दिन नीले या सफेद कपडे नहीं पहनने चाहिये।
  • इस दिन काले,नीले और, सफेद चूडियां भी नहीं पहननी चाहिए।
  • यह पूर्णिमा का व्रत जो महिलाएं पहली बार रख रही हैं। उन्‍हें पूजा के दौरान मायके लायी गयी पूजन सामग्रियों से ही पूजा करना चाहिए ऐसा करना बहुत ही शुभ माना जाता हैं।

कैसे करते हैं वट सावित्रि का व्रत, जाने महत्‍व और पूजन विधि सम्‍पूर्ण जानकारी यह भी देखें…

वट पूर्णिमा व्रत कथा (Vat Purnima Vrat Story)

वट पूर्णिमा

भद्र देश के एक राजा थे जिनका नाम अश्वपति था। उनके यहॉ कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दी। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा।

सावित्री तपोवन में वर तलासने निगल गयी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे। उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा की आप सत्यवान,गुणवान,बलवान,धर्मात्मा हैं। पर उसकी आयु बहुत छोटी हैं। वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति चिंता में डूब गए।

सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना हैं।  वह अल्पायु हैं। तुम्हे किसी और को अपना जीवन साथी बनाना चाहिए। इस पर सावित्री ने कहा की पिताजी आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं। राजा एक बार ही आज्ञा देता हैं। और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता हैं। सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी।

राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया। सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। नारद ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगी। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। हर दिन की तरह सावित्री और सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गये।

तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा, दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गये। सावित्री अपना भविष्य समझ गई। सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगीं। तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की यही विधि का विधान हैं।

लेकिन सावित्री नहीं मानी सावित्री की निष्ठा को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो। सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं। उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा। जाओ अब लौट जाओ। लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रहीं।

यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ। सावित्री ने कहा भगवन मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं हैं। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य हैं। यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा। सावित्री बोलीं हमारे ससुर का राज्य छिन गया हैं। उसे पुन: वापस दिला दें। यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और कहा अब तुम लौट जाओ।

लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रही। यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा। इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया। सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया हैं। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े।

यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था। सत्यवान जीवित हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल गयें। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई हैं। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

सावित्री के अनुरूप ही अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता हैं।

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