पुस्तक समीक्षा : धर्मनिष्ठ और विधिवेत्ता शिक्षाविद पं. रामलाल शर्मा

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मेरे काफी पुराने मित्र व अभिन्न साथी लेखक मिलिन्द रोंघे जी जो विगत 35 वर्षाे से राजनीति के गलियारों में अप्रत्यक्ष रूप से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व विधायक डॅा.सीतासरन शर्मा के साथ उनके सहयोगी के रूप में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहते हुए भी पाक साफ व सदैव सत्य के संवाहक रहे है, ने अपनी कृति जिले व प्रदेश के महामानव कर्मयोगी पं. रामलालजी शर्मा ‘कक्काजी’ पर केन्द्रित एक पुस्तक कुछ माह पूर्व धर्म,विधि,शिक्षा व समाज सेवा के माध्यम से सक्रिय लोगों को समर्पित की है।

पुस्तक समीक्षा : द्वारा चन्द्रकांत अग्रवाल  लेखक : मिलिन्द रोंघे

उनकी इस पुस्तक की प्रस्तावना से ही स्पष्ट है कि इस पुस्तक को लिखने के पीछे उनका भाव लोक मंगल का रहा है। जो समाज अपने पूर्वजों, महापुरूषों/महामानवों/शहीदों के जीवन से प्रेरणा लेकर उनके बताए मार्ग पर नहीं चलता वह पथभ्रष्ट भी हो जाता है, यह सच्चाई कई चिंतक-मनीषी स्वीकारते है। अतः लोक जीवन के लोक तत्वों को समेट कर नियती ने कक्काजी के जिस अप्रतिम व्यक्तित्व को गढ़ा, मिलिन्दजी ने लोक मंगल की कामना से अकल्पनीय परिश्रम कर, इसे समाज के समक्ष प्रभावशाली रूप से इस पुस्तक की शक्ल में ढालकर प्रस्तुत किया है। कल्पना कीजिए कि करीब 33 गजेटियर पृष्ठों व किताबों से तत्संबधी जानकारी शोधित कर निकालना,कई अभिलेखों का अध्ययन करना,शताधिक संबधित लोगों से चर्चा कर अपेक्षित जानकारी प्राप्त करना कितना दुष्कर कार्य रहा होगा। क्योंकि कक्काजी ने तो अपने जीवनकाल में कभी किसी को स्वयं पर कुछ लिखने नहीं दिया, क्योंकि उनके लिए अपना व्यक्तित्व नहीं कृतित्व अहम रहा। अतः जब मिलिन्दजी ने उनकी जीवनी लिखने की बड़ी चुनौती को आत्मसात किया तो सर्वप्रथम उन्होंने जिले की, कक्काजी के काफी पूर्व तक की व समकालीन,सामाजिक,सांस्कृतिक,धार्मिक, राजनैतिक पृष्ठभूमि से लेखन प्रारंभ किया। कई बार , कई लेखक यही चूक जाते है।किसी महापुरूष या महामानव के जीवन में झांकने के पूर्व यदि हम उनके पूर्व के अनकेनसमकालीन कालखंड की भौतिक,सामाजिक,वैचारिक,आध्यात्मिक,धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों को नहीं जान पाएंगे तो उनके जीवन-दर्शन को आत्मसात भी नहीं कर पाएंगें। क्योंकि वर्तमान में जो कर्म हमें साधारण लग सकते है, वे आज से 60-70 साल पूर्व कितने दुर्लभ व दुष्कर रहे होंगे, इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। हमें 60-70 साल पूर्व के फ्लैश बैक में जाना ही पड़ेगा। आज भी कई सफल फिल्मों में वर्तमान में कहानी प्रारंभ कर फिर कुछ मिनिटों बाद ही फिल्म फ्लैश बैक में चली जाती है, ताकि दर्शक कथानक को आत्मसात कर सकें। सत्य व कथ्य को अपनी मौलिकता की प्रामाणिक अभिव्यक्ति बना पूरी ईमानदारी से मिलिन्दजी ने ‘‘किस्सागोई’’ के रोचक अंदाज में, संकल्प, पुरूषार्थ व अध्यात्म के 3 सुत्रीय जनेऊधारी कक्काजी की जीवन को इस किताब की शक्ल में ढाला है। वरिष्ठ साहित्यकार संतोष व्यास द्वारा लिखी किताब की भूमिका में उल्लेखित है कि वे इस किताब को एक आंचलिक औपन्यासिक कृति के रूप में देखते हैं, जो मैें स्वीकार नहीं कर पा रहा। मैं तो इसे ‘किस्सागोई’ के अंदाज में लिखी एक ऐसी विलक्षण जीवनी के लेखन के रूप में देखता हूं, जिसमें मिलिन्दजी ने एक और जहाँ कक्काजी के गृह जिले के ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,सामाजिक व राजनैतिक संदर्भाे को भी विस्तार से बताया है, तो वहीं कक्काजी की वंशावली के प्रामाणिक कथ्य भी समाहित किए है। आइए अब इस पुस्तक के भीतर के कुछ अंशों को पढ़कर समझने की कोशिश करते हैं। मैने सिर्फ शिक्षा, धर्म,साहित्य व राजनीति के क्षेत्रों से ही कक्काजी के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया है।

आजादी के पूर्व ही 1946 में कक्काजी ने नर्मदा शिक्षा समिति की स्थापना की,नई शालाएं खोली व 1954 में महाविद्यालय प्रारंभ किया। बहुत दुर्गम था उस कालखंड में शिक्षा की यह मशाल जलाना। विगत कुछ वर्षाे से महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव कराने पर सार्वजनिक व राजनैतिक बहस जारी है। पृष्ठ 71 पर मिलिन्दजी ने कक्काजी का इस संदर्भ में जो संस्मरण लिखा वह वर्तमान में भी काफी प्रासंगिक है। छात्रसंघ चुनाव में दबदबा व चर्चित होने पर कुछ छात्रों द्वारा अन्य छात्र-छात्राओं को डराने-धमकाने की शिकायतें आई व अच्छे चरित्र के गुणी छात्र-छात्राएं जब इस सबसे दुखी हो चुनाव से दूर होने लगे तो कक्काजी ने 1965 में, आज से 57 वर्ष पूर्व छात्रसंघ चुनाव बंद कर, मेरिट में आने वाले छात्रों को छात्रसंघ अध्यक्ष बनाने का निर्णय, तुरंत ले लिया। विगत 3 दशकों में कुछ सरकारें कक्काजी के बताए रास्ते पर ही चलीं व आज भी चल रही है, तो अब महाविद्यालयों के एनवायरमेंट में काफी गुणात्मक सुधार देखने को मिला है, यह बात कई शिक्षाविद भी मानते है। कक्काजी की दृष्टि बहुत स्पष्ट थी कि छात्र-छात्राओं का प्रथम लक्ष्य अध्ययन ही होना चाहिए। अघ्ययन पूर्ण होने के बाद वे अपनी रूचि अनुसार राजनीति या अन्य किसी क्षेत्र में जा सकते है ,जैसे कि हमारे विधायकजी ने ही मेडिकल व लॉ की डिग्री गोल्ड मैडिल के संग लेने के बाद भी राजनीति को चुना। पृष्ठ क्रं. 72 पर मिलिन्दजी लिखते हैं कि कक्काजी कभी, किसी राजनैतिक या प्रशासनिक दबाव में नहीं आते थे। एक बार उन्होंने 1971 में जूनियर छात्रों को परेशान करने पर 3 वरिष्ठ अधिकारियों के पुत्रों को एक सप्ताह के लिए निंलबित कर दिया। एक बार कतिपय छात्रों ने कक्षा का फर्नीचर तोड़ दिया। जब एकता प्रदर्शन के नाम पर किसी छात्र ने कोई नाम नहीं बताया तो कक्काजी ने पुरी क्लास पर ही फाइन लगा दिया । यह प्रसंग उनकी अनुशासनप्रियता को रेखांकित करता है, जिसकी आज भी बड़ी जरूरत है।

मिलिन्दजी ने सत्य व कथ्य को ‘किस्सागोई’ के अंदाज में हर प्रसंग को इस तरह लिखा है कि पाठक स्वयं को उस प्रसंग के भावातिरेक में बहने से नहीं रोक पाता। मिलिन्दजी के लेखन में पानी की तरह तरलता व सरलता, कक्काजी के ऐसे ही व्यक्तित्व को इतने स्वाभाविक रूप से सामने लाती है कि 5 वीं पास कोई विद्यार्थी की भी इसमें रूचि हो जाएगी तो किसी पोस्ट ग्रेजुएट या बुध्दिजीवी भी इसे सहज ही ग्राहय कर लेगा। शिक्षा द्वारा उन्होंने छुआछूत व जाति प्रथा के बंधन तोड़कर स्त्री शिक्षा,व्यापक व प्रभावशाली रूप से प्रारंभ कराईं। विगत तीन दशकों से इंटरनेशनल क्लबों जैसे रोटरी, लायंस आदि में हर कार्यक्रम के पूर्व फेलोशिप अर्थात भाईचारा,मैत्री का 30 मिनिट का एक सेशन होता है। कक्काजी ने इसे 50 साल पहले ही अपना लिया था। पृष्ठ क्रं. 73, मिलिन्दजी लिखते है कि कक्काजी हर साल 26 जनवरी को एसएनजी स्कूल के सभी कर्मचारियों व शिक्षकों के साथ तालपुरा, जैतपुर, कुलामड़ी या सेमरीखुर्द में दाल-बाटी के सहभोज के साथ मिलन समारोह रखते थे। शाला व महाविद्यालय परिवार के हर शिक्षक व कर्मचारी से उनके व्यक्तिगत आत्मीय संबध व्यवहार थे, जिसके चलते कभी कुछ शिक्षकों को आवास बनाकर दिए तो कभी गेहूं की फसल आने पर उनको गेहूं, वह भी निशुल्क उपलब्ध कराते थे। ऐसा शिक्षाविद आज के इस दौर में कहां आसानी से देखने को मिलता है। जिसकी कथनी व करनी में कोई फर्क न हो। पृष्ठ क्रं. 70 पर मिलिन्दजी लिखते है एक बार किसी छात्र के ऊपर संस्था ने कम उपस्थिति के कारण 100/- का जुर्माना लगा दिया। छात्र निर्धन था जुर्माना देने में सक्षम न था। प्राचार्य के इनकार करने पर वह कक्काजी के पास गया तो उन्होंने अपनी जेब से 100/- निकालकर छात्र को दिए व कहा कि जुर्माना तो भरना पडे़गा,अनुशासन की बात है।
कक्काजी की साहित्य में भी अभिरूचि थी, हालांकि वे भक्ति काव्य व संत साहित्य के परम रसिक थे । उनके द्वारा महाविद्यालय में कई कवि सम्मेलन कराए गए। पृष्ठ क्रं. 68,69 पर मिलिन्दजी लिखते है कि, वह जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ का दौर था। एक बार तो कवि सम्मेलन में इतनी भीड़ उमड़ी कि कक्काजी को स्वयं बीच में खड़े होकर व्यवस्था संभालनी पड़ी। मै समझता हूं कि साहित्य व अध्यात्म में एक बहुत गहरा रिश्ता होता है। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि अध्यात्म से दुनिया की हर समस्या का समाधान संभव है। अतः आज मैं हमारे काव्य रसिक विधायकजी को एक सुझाव देना चाहता हूं कि कक्काजी की स्मृति में हर साल एक ‘आध्यात्मिक कवि सम्मेलन’ का आयोजन कराया जाए। आज भी हमारे देश, प्रदेश व जिले में ऐसे कई कवि है, जिनकी कविताओं के केन्द्र में अध्यात्म होता है। वैसे भी कक्काजी की लाइफ डिक्शनरी में भौतिकवाद और सुखवाद नहीं रहे।

अध्यात्म की चर्चा चली है तो धर्म क्षेत्र में कक्काजी के भागीरथी प्रयासों को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। मिलिन्दजी पृष्ठ 51 पर लिखते है कि ‘‘ प्रगट चारी पद धर्म के कलि महूॅं एक प्रधान ’’ धर्म के चार चरण सत्य,दया,तप व दान प्रसिध्द हैं। यूं तो कक्काजी के जीवन में ये चारों ही शरीर की इन्द्रियों की तरह आत्मसात रहे जीवन भर । पर उन्होंने ‘दान’ को सदा सबसे ऊपर रखा। शायद उनके पूर्वजों के दिए संस्कारों ने भी उनको इसके लिए प्रेरित किया होगा। उन्होंने जीवन भर, जीवन के हर क्षण, हर क्षेत्र में सिर्फ दिया ही दिया। वैसे भी विरासत में उनको इतना अधिक मिला था कि दोनों हाथों से बांटने का एकमात्र विकल्प ही कदाचित उनके पास था, अपने वंशानुगत चरित्र व संस्कारों की प्रेरणा से भी। मुझे अपना लिखा एक मुक्तक स्मरण हो रहा है,जो कदाचित कक्काजी पर चरितार्थ होता है सुनिये –
श्याही निशा से ले सदा मैने लिखा है,
सूरज की लालिमा का इसमें रंग भरा है ,
माटी की सौंधी गंध भी इसमें है भरी
खर्च करके खुद को सदा मैंने जिया है।

वास्तव में जिन्दगी भर वे स्वयं को तन-मन-धन तीनों से खर्च करे हुए जिए। कक्काजी का घर बगीचा कहलाता था, किसने रखा यह नाम मुझें पता नहीं,पर क्यों रखा यह मिलिन्दजी बताते है। पृष्ठ क्रं. 114 पर वे लिखते है कि संतो के आगमन की निरंतर परम्परा, घंटों सामाजिक व धार्मिक विषयों पर निरंतर चलने वाला शास्त्रार्थ, धर्मयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग की त्रिवेणी का संवाहन, श्रीरामचरित मानस की चौपाइयों व श्रीमद भागवत गीता के पुण्य श्लोकों से गुंजित शब्द ब्रम्ह की आराधना। मुझे लगता है कि अब ऐसे स्थान को यदि किसी ने बगीचा अर्थात उपवन का नाम दिया तो क्या गलत किया। गलत शब्द का इस्तेमाल मैने इसलिए किया कि विगत कई सालों से राजनैतिक क्षेत्र में इसे एक राजनैतिक बगीचे के रूप में नेतागण द्वारा, मीडिया,सोशल मीडिया पर उल्लेखित किया जाता है। जबकि जब इसका नामकरण हुआ तो इस स्थान का राजनीति से कोई लेना देना ही नहीं था। हां, यह भारतीय संस्कृति, भारतीय अध्यात्म, सत्संग,शास्त्रार्थ, वेद, पुराण, उपनिषदों के फूलों से सजा एक महामानव का जीवन-उपवन जरूर था जिसने अपने गृहस्थ जीवन को कई इन्द्रधनुषी आयाम देकर इतना विस्तारित कर दिया था कि यह भक्ति-योग,कर्म-योग,धर्म-योग,ज्ञान-योग की नींव पर खड़ा एक कर्मयोगी की तपस्या स्थली बन गया था। अतः मुझे लगता है कि राजनैतिक रूप में ‘बगीचा’ शब्द का इस्तेमाल करना मर्यादित नहीं कहा जा सकता। खैर, 40 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं तो उसका असर मेरी समीक्षा में दिखेगा ही। वैसे लक्ष्मीजी व सरस्वतीजी की एक साथ असीम कृपा के कारण भी बगीचा नाम पड़ा यह संभावना भी मिलिन्दजी ने व्यक्त की है।
पृष्ठ क्रं. 115 पर मिलिन्दजी लिखते है कि 5 बजे उठना फिर स्नानादि के बाद डेढ़ घंटे भगवत पूजन, गर्मी के दिनों में घर व मोहल्ले के बच्चों को नर्मदा स्नान हेतु ले जाना, घर जाकर रामचरित मानस का सत्संग करना। उच्च न्यायालय,जबलपुर, इलाहाबाद व सागर विश्वविद्यालय कोर्ट का सदस्य होने से, माह में 7 दिन प्रवास करना पड़ता पर उनका पूजन का नियम कभी नहीं टूटने दिया उन्होंनें । पूजन का डब्बा सफर में सदा उनके साथ रहता था, जिसमें उनके भगवान रहते थे। 10 मई से 10 जून तक हर साल वे सपरिवार एक माह हरिद्वार और ऋषिकेश में रहते। हमारे विधायकजी भी जो कभी भी किसी भी तीर्थस्थल की यात्रा पर चुपचाप निकल जाते है, भोपाल जाने की जनचर्चाओं के मध्य,भोपाल या दिल्ली में राजनेतिक खिचड़ी पकाने की चर्चाओं के बीच, यह कक्काजी के संस्कार लगते हैं, मुझे। हरिद्वार से लौटते में मथुरा रूकना व अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित श्री विजयगोविंदजी के मंदिर में रूकना। विधायकजी भी हाल ही में एक सप्ताह की मथुरा-वृंदावन की यात्रा करके आए है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी का कक्काजी पर विशेष स्नेह व आर्शीवाद सदैव रहा। पृष्ठ 117, कक्काजी के जीवित रहते चारों प्रमुख पीठों के शंकराचार्य समय-समय पर होशंगाबाद आते रहे व यहां भागवत कथा भी की।

चालीस के दशक में कक्काजी ने पूर्वजों की रामलीला मंचन की परंपराओं को नए आयाम दिए, जिसमें संवाद व पार्श्व संगीत भी प्रारंभ हुआ जो 18 दिन चलती थी रामलीला, आज की तरह 10 दिन की नहीं। धर्म अध्यात्म कके उनके मार्ग ने ही उनको इटारसी में भी काफी लोकप्रिय बना दिया थ। 1964 में उनको सर्वसम्मति से श्रीद्वारिकाधीश मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया वे आजीवन इसके अध्यक्ष रहे। पृष्ठ क्रं. 121 पर मिलिन्दजी लिखते है उनके अध्यक्ष रहते ही समिति द्वारा स्त्री शिक्षा को इटारसी में आगे बढाने के लिए कन्या स्कूल का संकल्प लिया था जो उनके जीवित रहते भले ही पूरा न हुआ हो पर बाद में उनके सुपुत्र विधायकजी ने मंदिर समिति अध्यक्ष के नाते कुसुम मालपानी स्कूल की स्थापना के रूप में उसे पूरा किया। इस तरह कक्काजी के समय की समिति का संकल्प ही था जो डॉ. साहब ने पूरा किया।
कक्काजी ने कई बड़े यज्ञ/हवन कराए जिनको देवी-देवताओं का मुख माना जाता है। अग्नितत्व के द्वारा ही हवन सामग्री के रूप में शास्त्रोक्त व वैज्ञानिक आधार पर भी वे इसे ग्रहण करते है। कक्काजी के लिए धर्म मानस की इस चौपाई जैसा था- ‘परहित सरस धर्म नहीं भाई,परपीड़ा सम नहीं अधमाई’ धर्म की कुछ ऐसी ही व मेरी दृष्टि में सबसे सरल,वैज्ञानिक व सर्वग्राहय परिभाषा भीष्म पितामह ने भी कुरूक्षेत्र में राजधर्म के उपदेश में दी थी, जिस पर लिखे अपने एक मुक्तक का जिक्र यहॉं करना प्रासंगिक समझता हूॅं ,यह बताने के लिए कि यदि कक्काजी आज हमारे बीच होते तो कदाचित उनकी धर्म की परिभाषा भी यही होती, जो द्वापर में भीष्म ने दी थी।
संतो ने बताया कि क्या है, पाप, पुण्य कर्म,
शास्त्रों ने बताया हमें धर्म का मर्म।
भीष्म ने शरशैया पर पांडवों से यह कहा,
अधिकारों-कर्तव्यों का संतुलन ही है धर्म।

कक्काजी के व्यक्तित्व व जीवन में यह संतुलन पग-पग पर देखने को मिला मुझे मिलिन्दजी की पुस्तक में, लगभग हर पृष्ठ पर। पृष्ठ 123 पर मिलिन्दजी लिखते भी है कि इस धर्मपथ पर वे कभी किंचित भी विलग नहीं हुए। वे भारतीय मूल्यों के मूर्तिमान स्वरूप रहे व भारत की ऋषि परंपरा को अपने जीवन में उतारा और ‘सार्थक’ शब्द को उसके समग्र अर्थाे में जिया। और अंत में राजनैतिक क्षेत्र के आइने में कक्काजी, जिसे मिलिन्दजी ने एक अलग अध्याय में 5 पृष्ठों में समेटा है ‘सत्ता से रार’ शीर्षक से। पृष्ठ क्रं. 79, कक्काजी प्रारंभ से ही कांग्रेस की नीतियों के विरोधी रहे और उस दौर में जब कांग्रेस का विरोध करने वाला कोई नहीं था, 1957 में कक्काजी ने होशंगाबाद विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा व कांग्रेस प्रत्याशी नन्हेलाल लोहार से मात्र 1979 मतों से हार गए क्योंकि कांग्रेस विरोधी वोटों का बंटवारा हो गया था, जिनवरदास फौजदार के 2848 व नारायण प्रसाद के 1046 वोट ले लेने से। ये आंकड़े कक्काजी की लोकप्रियता बताते हैं। तब उनके देश की सबसे ताकतवार पार्टी कांग्रेस के खिलाफ होते हुए भी। फिर कक्काजी ने करपात्रीजी महाराज द्वारा गठित अखिल भारतीय राजराज्य परिषद की जिला इकाई गठित कर ली। फिर कक्काजी ने कांग्रेस के खिलाफ लड़ने वाली परिषद व जनसंघ को भी सदा समर्थन दिया। 1960 के दशक में कक्काजी करपात्रीजी के ही गौरक्षा आंदोलन से जुड़ गए।

1972 में कक्काजी ने सबके कहने पर मम्मू भैया भवानीशंकरजी को निर्दलीय उतार दिया कांग्रेस के विरूध्द। पर राजनैतिक धोखे के कारण जिता न सके। तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के उस समय के एक चर्चित भाषण का उल्लेख मिलिन्दजी ने पृष्ठ 82 पर किया है। मुख्यमंत्री ने धमकी दे डाली थी कि ‘राजनीति करना भुला दूॅंगा, तुम्हारे सभी स्कूल,कालेज शासन द्वाराअधिग्रहित करवा लूंगा।’ कक्काजी ने इस धमकी के खिलाफ जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायायलय तक में स्वयं पैरवी करके मुख्यमंत्री तक को गवाही देने के लिए मजबूर कर दिया। 1976 में तो कृषि उपज मंडी समिति,इटारसी के चुनाव में उनके प्रत्याशी शंकरलाल पालीवाल ने कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी को हरा ही दिया। ऐसी जीवटता थी कक्काजी की राजनैतिक क्षेत्र में। जिसमें कभी भी उन्होंने अपनी विचारधारा को नहीें छोड़ा। भले ही कितनी भी व्यक्तिगत क्षति उठानी पड़ी हो। कितना भी त्याग करना पड़ा हो। कक्काजी के आराध्य श्रीराम थे मुझे अपना एक मुक्तक स्मरण हो रहा है जो कदाचित कक्काजी के राजनैतिक जीवन पर चरितार्थ है देखिए –
विद्वता जीवन की आधार शिला हो नही सकती,
अन्याय सहना कभी स्वाधीनता हो नहीं सकती,
राम-भरत ने मनुष्य के स्वत्व का व्याकरण लौटाया,
बिन त्याग के राजनीति में नैतिकता हो नहीं सकती।

कक्काजी ने बार-बार त्याग की राजनीति से नैतिकता को साकार किया, उस दौर में आज से 40-50 साल पहले। कुल मिलाकर मिलिन्दजी की कक्काजी पर केद्रिंत ‘किस्सागोई’ के खुबसूरत अंदाज में लिखी गई जीवनी, भूमिका में लिखी गई जिले की देश-काल की पृष्ठभूमि से जीवंत हो गयी। आज जिले में शिक्षा, साहित्य, धर्म, राजनीति इन चार क्षेत्रों में, जिन्हें मैने अपनी इस समीक्षा हेतु चुना। इन क्षेत्रों के आज के वर्तमान पर, हिन्दी गजलों के राजकुमार दुष्यंत कुमार के दो शेर पढ़कर, कलम को विराम दूॅगा।
क्या वजह है प्यास ज्यादा तेज लगती हैं यहां,
लोग कहते है कि पहले इस जगह था कुआ।
इस शहर में तो कोई वारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।
निश्चय ही इन चार क्षेत्रों में वर्तमान में जो कुछ भी सकारात्मकता आज तक जिन्दा है , उसके मूल में कक्काजी के समर्पित जीवन में समाहित ज्ञान,त्याग व करूणा का एक ऐसा कुॅंआ भी है, जिसमें आज भी मानवता का थोड़ा पानी शेष है। पर हालात गंभीर है। जैसा कि उप्पल जी ने समीक्षा कार्यक्रम में कहा भी था कि अब चुनौती कक्का के सुपुत्रों व सुपोत्रों के समक्ष है। क्योंकि जिले,शहर व समाज को उनसे बहुत बड़ी बड़ी अपेक्षाएं हैं कक्का जी के कृतित्व जैसी ही। कक्काजी जैसे महामानव के जीवन की प्रेरणाओं की हवाओं से सुविधाभोगिता, स्वार्थ व संवेदनशून्यता की बंद खिड़कियां आज भी खुल सकती है, खोली जा सकती है। जरूरत कक्काजी की जीवन यात्रा को जन-जन तक खासकर युवा पीढ़ी तक पहुॅंचाने की है । उप्पल जी ने ही समीक्षा कार्यक्रम में भावुकता में कक्का जी के जीवन के अंतिम दिन का भावप्रवण उल्लेख कर,मेरी भी आंखें नम कर दीं। किसी भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा महादान,मतदान के अलावा दूसरा कोई हो भी नहीं सकता। दानवीर कक्का ने यह महादान करने की कीमत अपने दिल की धड़कनें देकर चुकाई,जब वे गंभीर हार्ट अटैक के बाद फुल बेड रेस्ट की डॉक्टर्स व परिजनों द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघ कर बिना किसी को बताए चुपचाप पैदल मतदान केंद्र तक पहुंच गए जिसके कारण उनको फिर दोबारा हार्ट अटैक आ गया और अपने ईष्ट की दुनिया में उनका महाप्रयाण हो गया। कक्काजी की इस अद्वितीय जीवन यात्रा पर, कई साल पहले पढ़ा किसी शायर का शेर सार्थक होता है,जो सहज ही आज याद आ रहा है —
आखिर उसकी सूखी लकड़ी एक चिता के आई काम,
हरे भरे किस्से सुनते थे ,जिस पीपल के बारे में।
साधुवाद मिलिन्दजी । जय श्रीकृष्ण ।

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