अधिकारियों की तानाशाही के आगे झुका रेलवे प्रशासन; जेडआरयूसीसी सदस्य राजा तिवारी के धरने और राज्यसभा सांसद माया नारोलिया के कड़े रुख के बाद बैकफुट पर आए अफसर
इटारसी । रेलवे के एसी कमरों में बैठकर फाइलों पर विकास करने वाले अधिकारियों को आखिरकार सड़क पर आकर जनता के आगे झुकना ही पड़ा। न्यूयार्ड रोड का काम अचानक बंद कर ‘बजट खत्म’ होने का हास्यास्पद बहाना बनाने वाले अफसरों की हेकड़ी महज़ कुछ मिनटों में हवा हो गई।
जब जनहित के इस मुद्दे पर जेडआरयूसीसी सदस्य राजा तिवारी खुद सड़क पर धरने पर बैठ गए और राज्यसभा सांसद श्रीमती माया नारोलिया ने अफसरों की क्लास ली, तो रेलवे प्रशासन के पास बगले झांकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। अफसरों ने घुटने टेकते हुए वादा किया है कि अगले 3-4 दिन के भीतर सड़क का काम दोबारा शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि यह बात भी पता चली कि रोड का कुछ पैसा रुका है, इसके लिए जल्द ही राज्यसभा सांसद और जेडआरयूसीसी के सदस्य राजा तिवारी संभवत: कल भोपाल जाकर डीआरएम से मिलने वाले हैं।
वो तीखे सवाल, जिनका जवाब रेल अफसरों के पास नहीं था
- सवाल नं. 1: जो बजट 700 मीटर की पूरी सड़क के लिए पास हुआ था, वो महज़ 300 मीटर का टुकड़ा बनते ही कैसे ‘स्वाहा’ हो गया? बाकी का पैसा कहाँ गया?
- सवाल नं. 2: ‘बजट नहीं है’ का रोना रोने वाले अफसर, सांसद की फटकार पड़ते ही अचानक ‘लेबर नहीं मिल रही थी’ का नया राग क्यों अलापने लगे?
- सवाल नं. 3: अगर मीडिया इस मुद्दे को न उठाता और जनप्रतिनिधि सड़क पर न बैठते, तो क्या रेलवे इस अहम सड़क को ऐसे ही लावारिस छोड़ देता?
क्विक अपडेट: धरने से लेकर समझौते तक की कहानी
- खबर का असर: मीडिया के जरिए काम रुकने की भनक लगते ही राजा तिवारी एक्टिव हुए।
- अफसरों के गोलमोल जवाब: भोपाल से लेकर स्थानीय अफसरों तक ने गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए, जिससे नाराज होकर तिवारी ने धरने का प्लान किया।
- ऑन-स्पॉट फैसला: जैसे ही राजा तिवारी न्यूयार्ड रोड पर धरने पर बैठे, राज्यसभा सांसद माया नारोलिया ने सीधे रेल अधिकारियों से तीखी चर्चा की।
- अल्टीमेटम: अधिकारियों ने माना कि बारिश से पहले हर हाल में काम पूरा कर जनता को यह सौगात सौंप दी जाएगी।
‘बजट’ का झोल या अफसरों का मखौल?
इटारसी रेलवे प्रशासन का यह रवैया साफ करता है कि जमीन पर चल रहे कामों की मॉनिटरिंग कितनी लचर है। 700 मीटर की सड़क का बजट आधी सड़क बनने से पहले खत्म हो जाना किसी बड़े वित्तीय झोल या घोर लापरवाही की तरफ इशारा करता है। अधिकारियों ने पहले बजट का बहाना बनाया, फिर लेबर का। खैर, जागरूक नेतृत्व ने समय रहते अफसरों की इस ‘कुंभकरणी नींद’ को तोड़ दिया है। अब शहर और ग्रामीण अंचल की नजरें इस बात पर हैं कि 4 दिन बाद ठेकेदार की मशीनें सड़क पर गरजती हैं या नहीं!











