जबलपुर/इटारसी। भारतीय रेलवे सतत और हरित परिवहन के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने जा रहा है। देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेनसेट पूरी तरह से तैयार है, जिसे जल्द ही हरी झंडी दिखाई जाएगी। यह ट्रेन कोयले और डीजल जैसे पारंपरिक ईंधनों से इतर, शून्य-उत्सर्जन वाली अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। यह अनूठी ट्रेन न केवल पर्यावरण संरक्षण में मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि उच्च-क्षमता वाली यात्री सेवाओं में भारत की स्वदेशी तकनीकी दक्षता को भी वैश्विक पटल पर रेखांकित करेगी।
ट्रेन और उसके संपूर्ण इकोसिस्टम से जुड़े मुख्य बिंदु
- इन-हाउस बिजली उत्पादन और शून्य उत्सर्जन: पारंपरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों से अलग, यह ट्रेन ओवरहेड लाइनों पर निर्भर नहीं है। इसमें लगा प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) फ्यूल सेल सिलेंडरों में संग्रहीत हाइड्रोजन और हवा की ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया कराकर ट्रेन के भीतर ही बिजली पैदा करता है। इस प्रक्रिया में कोई दहन नहीं होता और उप-उत्पाद के रूप में केवल जल वाष्प और ऊष्मा निकलती है, जिससे प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन शून्य रहता है।
- उच्च क्षमता वाला वैश्विक रिकॉर्ड: जहां दुनिया भर में चल रही अधिकांश हाइड्रोजन ट्रेनें केवल 2 से 4 कोच की हैं, वहीं भारतीय रेलवे ने इसे 10 कोच (2 ड्राइविंग पावर कार और 8 ट्रेलर कोच) के रूप में तैयार किया है। इसकी क्षमता लगभग 2,600 यात्रियों को ले जाने की है, जो वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि है।
- जिंद-सोनीपत मार्ग पर पहला संचालन: यह ट्रेन शुरुआती चरण में उत्तरी रेलवे के जिंद-सोनीपत खंड (89 किमी) पर संचालित होगी। इसकी परिचालन गति 75 किमी/घंटा और डिजाइन गति 110 किमी/घंटा है। प्रत्येक ड्राइविंग पावर कार 1,200 किलोवाट (1600 HP) की शक्ति उत्पन्न करती है।
- देश का पहला एकीकृत हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन: हरियाणा के जिंद में भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन ईंधन भरने की सुविधा विकसित की गई है। यहाँ ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट में पानी के विद्युत अपघटन (इलेक्ट्रोलाइसिस) से हाइड्रोजन बनाकर उसे 500 बार तक संपीड़ित किया जाता है। दो स्वतंत्र डिस्पेंसरों के माध्यम से 350 बार के नियंत्रित दबाव पर दोनों पावर कारों में एक साथ तेजी से ईंधन भरा जा सकता है। इस स्टेशन में 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था है।
- स्वदेशी निर्माण: इस महत्वाकांक्षी परियोजना की तकनीकी विशिष्टताओं और डिज़ाइन को अनुसंधान डिज़ाइन और मानक संगठन (RDSO) ने मंज़ूरी दी है। ट्रेनसेट का एकीकरण मेसर्स मेधा सर्वो ड्राइव्स द्वारा और बाहरी डिज़ाइन व थीम का निर्माण इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) द्वारा किया गया है।
- बहुस्तरीय सुरक्षा चक्र (इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन): हाइड्रोजन की अत्यधिक ज्वलनशीलता को देखते हुए इसमें ‘गहन सुरक्षा’ सिद्धांत के तहत बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र लगाया गया है। ट्रेन में हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग की लपटों और धुएं का पता लगाने वाले ऑटोमैटिक सेंसर लगे हैं, जो किसी भी आपात स्थिति में मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्वतः ही हाइड्रोजन आपूर्ति बंद कर देते हैं। continuous ventilation प्रणाली रिसाव होने पर गैस को जमा होने से रोकती है।
- कड़े परीक्षणों के बाद मिली मंजूरी: इस प्रणाली का डिजाइन वैश्विक मानकों (NFPA-2 और ISO 19880) के अनुरूप है और इसे पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) से मंजूरी प्राप्त है। जर्मनी की विश्व प्रसिद्ध एजेंसी TÜV SÜD द्वारा इसके स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन के साथ-साथ लोड बॉक्स, रेडियो फ्रीक्वेंसी, दोलन (ऑसिलेशन) और आपातकालीन ब्रेक दूरी जैसे कड़े परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद ही इसे परिचालन के लिए प्रमाणित किया गया है।
भविष्य की योजनाएं
जिंद-सोनीपत मार्ग पर इस एकीकृत इकोसिस्टम की परिचालन व्यवहार्यता और सुरक्षा स्थापित होने के बाद, भारतीय रेलवे कालका-शिमला जैसे देश के ऐतिहासिक और विरासत रेलमार्गों पर भी इस तकनीक को लागू करने की योजना बना रहा है। यह कदम राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और भारत के नेट-जीरो (शून्य कार्बन उत्सर्जन) लक्ष्य को हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।









