इंसानियत (Humanity) का अपराधीकरण

इंसानियत (Humanity) का अपराधीकरण

– सत्येंद्र सिंह (Satendra Singh) :
किसी के प्राण निकाल लिए जाएं तो क्या न्याय होगा उसके बाद। किसी की इज्जत लूट ली जाए या नाम पर धब्बा लगा दिया जाए तो क्या न्याय होगा और कौन कर पाएगा न्याय। कांच का बर्तन जब टूट जाए तो कौन जोड़ पाएगा उसे और जब तक उसे ‌जोडा नहीं जाता तब तक न्याय कहां और कैसा? और जोड़ना असंभव है तो न्याय भी असंभव है। जिस तरह जान के बदले जान न्याय का एक मानदंड बनाया गया था वैसे ही इज्जत के बदले इज्जत न्याय का मानदंड बन सकता है?
लेकिन यहां तो प्राण और इज्जत ‌दोनों के मूल्य ही बदल गए हैं। एक के प्राण बहुमूल्य तो दूसरे के प्राण का कोई मूल्य नहीं। इसी प्रकार एक की इज्जत पूरे समाज व देश की इज्जत तो दूसरे की इज्जत मिट्टी बराबर भी नहीं। कोई मूल्य नहीं, कोई महत्व नहीं।
बड़े बड़े लोग मानवीयता की बात करते हैं, इंसानियत (Humanity) की बात करते हैं – लेकिन तभी तक जब तक उनके ऊपर नहीं बीतती। इसके अलावा जाति के आधार पर अपराध की परिभाषा बदल जाती है तो कभी राजनीतिक रंग देकर अपराध का स्वरूप ही बदल जाता है। आम जन अपराध के समाचार से कितना आहत होता है, उसके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी चिंता तो किसी को है, ऐसा लगता ही नहीं। सब कुछ खेल की रिपोर्टिंग की तरह चलता रहता है। अभी मनुष्य इतना उन्नत नहीं हुआ है कि वह अपराध समाचार को खेल भावना से महसूस करे। इससे मनुष्य की महसूस करने की क्षमता की कोमलता नष्ट हो रही है। कोमल भावनाएं कुचल रही हैं और दया करुणा की भावनाओं का अंत होता दिखाई पड़ रहा है। इस कोमलता को कायरता में बदल‌ दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। पीड़ित को दुश्चरित्र, और अपराधी को मासूम‌ बता कर अपराध के स्वरूप को ही बदल दिया जाए तब भी आश्चर्य नहीं होगा।
जिन गुणों के कारण मनुष्य इंसान कहलाता है और इंसानियत (Humanity) को उच्च प्राथमिकता प्राप्त है तो अपराधों को जाति, धर्म , राजनीति के आधार पर उच्चताबोध प्रदान किया जाएगा, अपराध की जघन्यतावादी प्रतिवादी में बँट जाएगी, भावनाएं पत्थर समान कठोर हो जाएंगी तो इंसानियत (Humanity) का भी अपराधीकरण हो जाएगा और जीने की सार्थकता भी अर्थ खो बैठेगी। इंसानियत को बचाने का अभी समय है।


सत्येंद्र सिंह (Satendra Singh)
सप्तगिरी सोसायटीजांभुलवाडी रोड,
आंबेगांव खुर्द पुणे 411046

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