विश्व पर्यावरण दिवस : अब दरख़्त नहीं, दरकती सांसें बचाओ

विश्व पर्यावरण दिवस : अब दरख़्त नहीं, दरकती सांसें बचाओ

वृक्ष होंगे नष्ट्र तो सांस को होगा कष्ट

– रोहित नागे :
यदि हम कहें कि आप दरख़्त (पेड़) बचाओ या यूं कहें कि जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाओ, तो यह केवल पौधरोपण का अभियान नहीं होना चाहिए। इस कोरोनाकाल में दरकती सांसों के साथ अब अक्ल आ जाना चाहिए कि पेड़ों का इस धरा पर होना कितना अहमियत रखता है। 5 जून यानी शनिवार को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) है। विश्व में पर्यावरण को बचान तमाम कोशिशें कर रही हैं, कुछ ईमानदारी से, और कुछ केवल रस्मअदायगी के साथ। राजनीतिक आयोजनों में ज्यादातर रस्मअदायगी ही मानी जानी चाहिए, इसमें कुछ-कुछ सरकारी आयोजन भी शुमार हैं। कतिपय संगठन भी इसी राह पर चल पड़े हैं, केवल सरकारी अनुदान हासिल करने, वे इस तरह के आयोजन करते हैं। कागजों में पेड़ लगाये जाते हैं, उस तालीम को भुलाकर जो उन्हें प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते वक्त पर्यावरण को बचाने के लिए सिखायी गई थी। बड़े होने के साथ ऐसे लोग समझदार होने के स्थान पर आत्ममुग्ध हो जाते हंै, एक पौधे को बीस लोग पकड़कर फोटो खिंचवाते और इतना गर्व करते हैं, जैसे उनका यह पौधा लगाते ही पेड़ बन गया हो। इसके बाद यह उसकी तरफ भूल से भी नहीं देखते। देखते हैं तो केवल दूसरे दिन अखबारों में इसकी फोटो। इसी फोटो का वे वर्षों संरक्षण करते हैं, जबकि संरक्षण की आवश्यकता उस पौधे को होती है। तभी कहा जाता है कि कागजों में पौधे लगे। आजकल इसी परंपरा का चलन है।
विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) की शुरुआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। इसका मुख्य मकसद प्रकृति और पृथ्वी की रक्षा करना और पर्यावरण (Environment) को बेहतर बनाना था। इसे अभियान बना दिया गया जबकि यह आंदोलन के तरीके से चलाया जाना चाहिए था। हम अब भी नहीं संभले और जो उपलब्ध पेड़ हैं, उन्हें कष्ट दिया तो सांसें नष्ट होने की सुनामी आएगी।
कोरोनाकाल में हमने केवल तूफानी नजारा देखा है, सुनामी आना शेष है। हमने इतिहास से सबक लेना ही नहीं सीखा। विद्वानों की मान्यता और वैज्ञानिकों का मत है कि लगभग छह करोड़ साल पहले धरती पर डायनासोर बहुत पाये जाते थे। फिर अचानक वे अचानक गायब हो गए। उनके विलुप्त होने का कारण है हमारा पर्यावरण। माना जाता है कि लगभग साढ़े छह करोड़ साल पहले धरती से एक विशाल धूमकेतु या छुद्र ग्रह टकराया। इस घटना से वायुमण्डल की हवा में इतनी अधिक धूल और मिट्टी घुल गई कि धरती पर अंधकार छा गया। सूरज की रोशनी के अभाव में वृक्ष अपना भोजन नहीं बना सके और खत्म हो गये। इन वृक्षों से भूख मिटाने वाले शाकाहार डायनासोर और अन्य जीव जन्तु भी मारे गए।

आज हम फिर वही राह पर चल पड़े हैं। वायु, जल, मिट्टी का प्रदूषण, बढ़ता तापमान, विकरणीय प्रदूषण, कारखानों से होने वाला प्रदूषण आदि ऐसे कारक हैं जिनसे जलवायु बदलाव तथा ग्लोबल वार्मिंग का खतरा उत्पन्न हो रहा है। इन खतरों से बचने के लिए हमें अपने पूर्वजों की जीवनशैली की तरफ आसभरी नजरों से देखकर, उसके पीछे छिपे विज्ञान को समझकर अपनाना होगा। सांसें बचाना है तो उसके लिए मशीनी विकल्प नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत्त संसाधनों पर भरोसा जताना होगा।
वर्तमान में मनुष्य ईश्वर से ही युद्ध लड़ रहा है, क्योंकि ईश्वर की बचायी संरचना को चोट पहुंचा रहा है। सहनशीलता की हद तक ईश्वर ने क्षमा किया और अब अपराध अक्षम्य हो चला है। पर्यावरणीय चेतना को बढ़ावा देकर पर्यावरण को बिना हानि पहुंचाए या फिर कम से कम हानि पहुंचाए भी विकास संभव है। प्रकृति की जो हानि हो, उसकी पूर्ति पर भी काम हो, विचारों का वक्त चला गया, धरातल पर काम करने का वक्त है। जितने पेड़ काटे जा रहे, उसे दोगुने लगाना होगा। हजारों वर्ष तक हमारे पुरखों ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर संसाधनों का दोहन किया था, हमने अंधाधुंध दोहन किया है। कांक्रीट के जंगल बसाने प्रकृति के बसाये जंगल काटे, धरती का पेट चीरकर धातुएं निकालीं। विकास वक्त की जरूरत है, इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बीच तालमेल बिठाकर उपयोग करना होगा।

और अंत में एक बात और, पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी केवल इसके लिए गठित संगठनों या केवल सरकार की है, इसे विचार से बाहर निकलें, अपनी सांसों का ठेका सरकार को नहीं दो, क्योंकि सरकार को विकास की जिम्मेदारी तो दी जा सकती है, आपकी बाहरी दुनिया में सामाजिक खतरों से सुरक्षा की जिम्मेदारी तो दी जा सकती है, सांसों की डोर अपने ही हाथ रखें, तभी हम दरकती सांसों को बचा सकते हैं।


रोहित नागे (Rohit Nage)
संपादक
94244-82883

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