- शिक्षा सुधार की असली शुरुआत अभिभावकों की सक्रियता से होगी
स्कूल की चारदीवारी के भीतर बच्चों का भविष्य आकार लेता है। इसलिए वहां की हर कमी, हर अव्यवस्था और हर अच्छी पहल का सीधा असर समाज के भविष्य पर पड़ता है। शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी यह समझना है कि सुधार की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
अक्सर स्कूलों की बदहाली सामने आते ही सरकार, शिक्षक और स्कूल प्रबंधन सवालों के घेरे में आ जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन जिस बच्चे की शिक्षा की बात हो रही है, उसके माता-पिता की भूमिका पर उतनी गंभीरता से चर्चा नहीं होती।
दरअसल, शिक्षा व्यवस्था में अभिभावकों की भागीदारी कोई नई कल्पना नहीं है। विद्यालय प्रबंधन समितियों के माध्यम से उन्हें व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है। स्कूल के विकास, बच्चों की सुविधाओं, उपलब्ध संसाधनों की निगरानी और विद्यालय की समस्याओं पर संवाद में अभिभावकों की महत्वपूर्ण भूमिका तय है।
सवाल यह है कि क्या हम इस अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं?
कई जगह अभिभावक स्कूल की बैठक तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाते। बच्चे की पढ़ाई को लेकर उनकी सक्रियता परीक्षा और फीस तक सीमित रह जाती है। जब कोई बड़ी समस्या सामने आती है तो शिकायतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यदि यही ऊर्जा पहले से स्कूल की व्यवस्था पर निगरानी रखने में लगाई जाए तो कई समस्याएं पैदा होने से पहले ही दूर की जा सकती हैं।
आज स्कूलों की स्थिति को लेकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कई अभियान चल रहे हैं। कमियां सामने लाना बुरा नहीं है। बल्कि व्यवस्था में जहां खामी हो, उसे उजागर किया जाना चाहिए। लेकिन किसी स्कूल में जाकर वीडियो बनाना, सोशल मीडिया पर उसे प्रसारित करना और उसके बाद राजनीतिक बहस खड़ी हो जाना सुधार का पर्याय नहीं हो सकता।
कैमरा समस्या दिखा सकता है, समाधान नहीं कर सकता
समाधान के लिए शिक्षक चाहिए, संसाधन चाहिए, प्रशासनिक इच्छाशक्ति चाहिए और स्थानीय समुदाय की निरंतर भागीदारी चाहिए। स्कूलों में बाहरी हस्तक्षेप का सवाल भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बच्चों की निजता और सुरक्षा महत्वपूर्ण है। किसी भी अभियान को यह अधिकार नहीं मिल सकता कि सुधार के नाम पर वह विद्यालय के सामान्य वातावरण को प्रभावित करे। लेकिन दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में वास्तविक कमियां हैं तो केवल निजता या नियमों का हवाला देकर उन सवालों को दबाया भी नहीं जा सकता।
सही रास्ता टकराव नहीं, जवाबदेही है
सरकार को अपने स्कूलों की स्थिति की नियमित और निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए। अधिकारियों के निरीक्षण कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। अभिभावकों को शिकायतकर्ता भर नहीं, निगरानी व्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाना होगा और स्कूल प्रबंधन को भी अपनी कमियों पर ईमानदारी से काम करना होगा।
यहां निजी स्कूलों का बढ़ता प्रभाव भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है
आज अनेक परिवार सरकारी स्कूल की तुलना में निजी स्कूल को प्राथमिकता देते हैं। इसके पीछे केवल फीस या सुविधा का प्रश्न नहीं है। अभिभावकों को लगता है कि वहां पढ़ाई, अनुशासन, अंग्रेजी माध्यम, गतिविधियां और भविष्य की संभावनाएं बेहतर हैं। यही धारणा सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
यदि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता वास्तव में बेहतर होगी, शिक्षक पर्याप्त होंगे, वातावरण अच्छा होगा और बच्चों के सीखने के परिणाम दिखाई देंगे तो अभिभावकों को वहां भेजने के लिए अलग से समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकारी स्कूलों को बचाने की बात से आगे बढ़कर उन्हें पहली पसंद बनाने की दिशा में काम करना होगा।
इसी तरह कोचिंग व्यवस्था का विस्तार भी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है। यदि अभिभावक स्कूल की पढ़ाई के बाद भी अलग से भारी रकम खर्च करके बच्चे को कोचिंग भेजने के लिए मजबूर महसूस करता है, तो यह केवल परिवार का आर्थिक निर्णय नहीं है; यह हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक संकेत है।
इसलिए शिक्षा सुधार का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने वीडियो वायरल हुए, कितने निरीक्षण हुए या कितने बयान जारी हुए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि बच्चे ने स्कूल में क्या सीखा, उसका आत्मविश्वास कितना बढ़ा और उसका भविष्य कितना बेहतर हुआ।
राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन शिक्षा के सवाल को उठाएं, यह लोकतंत्र में उनका अधिकार है। लेकिन शिक्षा को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बना देना किसी के हित में नहीं है। सरकार किसी भी दल की हो, स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा किसी पार्टी का नहीं होता। वह पूरे समाज का भविष्य होता है। इसीलिए शिक्षा पर राजनीति से ऊपर उठकर साझी जवाबदेही की जरूरत है।
- अभिभावक कहें—हम स्कूल की निगरानी करेंगे।
- शिक्षक कहें—हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देंगे।
- अधिकारी कहें—हम लापरवाही पर कार्रवाई करेंगे।
- और सरकार कहे—हम संसाधनों और व्यवस्था की कमी नहीं होने देंगे।
तभी सुधार दिखाई देगा।
बच्चों के भविष्य के लिए सबसे बड़ा अभियान किसी राजनीतिक मंच से नहीं, स्कूल के दरवाजे से शुरू होना चाहिए। जिस दिन अभिभावक अपने विद्यालय को केवल फीस देने और बच्चे को लेने-छोड़ने की जगह मानना बंद कर देंगे और उसे अपने बच्चे के भविष्य की साझी जिम्मेदारी समझेंगे, उस दिन शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की वास्तविक नींव पड़ जाएगी।
- स्कूल सुधार के लिए शोर कम और सहभागिता ज्यादा चाहिए।
- कैमरे कम और जवाबदेही ज्यादा चाहिए।
- बयान कम और जमीन पर काम ज्यादा चाहिए।
आखिरकार सवाल यह नहीं कि स्कूल में कौन पहुंचा और किसने किसकी पोल खोली। सवाल सिर्फ इतना है—हमारे बच्चे को कल आज से बेहतर शिक्षा मिलेगी या नहीं?
यही शिक्षा सुधार की असली कसौटी है।
— रोहित नागे

वरिष्ठ पत्रकार, इटारसी, नर्मदापुरम
9424482883








