
नर्मदापुरम के प्रवास में, माँ नर्मदा की गोद में रहते हुए पाँच दशक कैसे ‘फुर्र’ से उड़ गए, पता ही नहीं लगा। माता नर्मदा ने जीवन में बहुत कुछ दिया, जिससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ। अब तो मेरी यह ‘नर्मदापुरम की डायरी’ भी बिल्कुल मेरी तरह (उम्र के इस पड़ाव पर) हो रही है। इस मोड़ पर आकर अपनी ही एक रुबाई बरबस याद आती है:
अमूनन आप जिसे याद कहते हैं,
हम उसे इबादत कहते हैं,
यह किसी साधु की समाधि की अवस्था है,
भला खुद को खुद याद कब रहते हैं…”
अस्तु! इस वेला में हमारे वरिष्ठ कवि कीर्तिशेष महेश संतोषी जी की अमर पंक्तियां भी बेहद प्रासंगिक लगती हैं— “एक उम्र कम है एक याद को भुलाने को, एक याद काफी है उमर भर रुलाने को।”
बहरहाल, यादें ही तो हैं जो जीवन भर साए की तरह साथ चलती हैं। उन्हीं में से कोई याद ऐसी होती है, जो जब दिल-ओ-दिमाग में कौंधती है, तो मन और प्राणों को अलौकिक आलोक से भर देती है। ऐसी ही एक अविस्मरणीय याद ‘श्री गायत्री शक्तिपीठ’ की स्थापना और उसके श्रीगणेश के पावन अवसर की है, जब परम पूज्य युगपुरुष, महान संत आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी का नर्मदापुरम आगमन हुआ था।
आचार्य श्री के अनेक स्तुत्य कार्यों और राष्ट्र-निर्माण के संकल्पों से संपूर्ण जगत सुपरिचित है। उनकी बेहद कठिन और लंबी साधना भी जगजाहिर है। नर्मदापुरम में अनेक विघ्न-बाधाओं को पार करने के बाद, पुण्य सलिला माँ नर्मदा के विशाल घाट पर सन 1980 में इस शक्तिपीठ का निर्माण संभव हुआ था। इसके निर्माण में तत्कालीन मजिस्ट्रेट गोयल साहब और पंडित श्रीराम नारायण शर्मा सहित अनेक धर्मनिष्ठ नगरवासियों ने अपना महती सहयोग दिया था।
शक्तिपीठ का निर्माण पूर्ण होने से लेकर पूज्य गुरुजी के आगमन तक, घाट पर लगातार विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम चलते रहे। जब पूज्य गुरुजी का आगमन हुआ, तो वह क्षण पूरे नगर के लिए किसी बड़े उत्सव की तरह सुखद और दिव्य था। मंच से आचार्य जी ने जब अपना उद्बोधन शुरू किया, तो श्रोता भावविभोर हो उठे। उनका वह व्याख्यान अत्यंत प्रेरक और मार्गदर्शक था।
दरअसल, पूज्य गुरुजी ने पूरे भारतवर्ष में 24 शक्तिपीठों की स्थापना का पावन संकल्प लिया था। उसी संकल्प की श्रृंखला में 24वाँ शक्तिपीठ हमारे होशंगाबाद (नर्मदापुरम) में निर्मित हुआ था।
संस्मरण का एक दिलचस्प वाकया यह भी है कि जब गुरुजी मंच से संबोधित कर रहे थे, तभी तत्कालीन सरकार के मंत्री टूमन लाल भी वहाँ पधारे। गुरुजी ने अपनी सहज उदारता दिखाते हुए उन्हें दूर से ही ‘आइए’ कहकर मंच पर ससम्मान बुला लिया था। करीब सप्ताह भर तक नगर के ‘श्री गायत्री शक्तिपीठ’ में विभिन्न आध्यात्मिक और लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों की अविरल धारा बहती रही, जिसने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया था।
नर्मदे हर!
– पंकज पटेरिया
(वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं ज्योतिष सलाहकार, नर्मदापुरम)











