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जय संतोषी मां: वो चमत्कारी फिल्म जिसने बॉक्स ऑफिस तो जीत लिया, लेकिन बनाने वालों की किस्मत हार गई

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अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक , ब्लॉगर

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अखिलेश शुक्ला

कल्पना कीजिए एक ऐसी फिल्म की, जो रिलीज होने के बाद पहले शो में सिर्फ 56 रुपए कमाती है। दूसरे शो में 64 और तीसरे में 100 रुपए। ट्रेड की दुनिया के ‘जानकार’ इसे ‘बंडल’ घोषित कर चुके हैं। अब कल्पना कीजिए कि वही फिल्म कुछ ही हफ्तों में सिनेमाघरों पर जादू करने लगती है। लोग गांव-देहात से ट्रेनें पकड़कर सिर्फ उसे देखने शहर आते हैं। सिनेमाघर मंदिरों में तब्दील हो जाते हैं, जहां दर्शक फिल्म के गानों पर आरती उतारते हैं और फूल चढ़ाते हैं। और फिर वह फिल्म 1975 की ‘शोले’ जैसी महाकाव्य फिल्म को पछाड़कर साल की दूसरी सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बन जाती है।

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि ‘जय संतोषी मां’ का असली और अविश्वसनीय सफर है। एक ऐसी फिल्म जिसने करोड़ों रुपए कमाए, लेकिन इसके निर्माता को दिवालिया घोषित होना पड़ा। एक ऐसी फिल्म जिसने एक अदना सी एक्ट्रेस को करोड़ों भारतीयों के लिए ‘माता’ का दर्जा दिलवाया, लेकिन उसी एक्ट्रेस का अपना जीवन त्रासदियों से भर गया। यह सिनेमा के इतिहास का सबसे विरोधाभासी, रहस्यमय और आस्था से जुड़ा किस्सा है। आइए, जानते हैं इसके पीछे के राज।

वो खराब शुरुआत जिसने कुछ दिन टेंशन दिया

साल था 1975। हिंदी सिनेमा ‘शोले’ की गूंज और ‘दीवार’ की बदलती परिभाषा से गूंज रहा था। ऐसे में, 30 मई को एक ऐसी फिल्म रिलीज हुई, जिसमें न कोई बड़ा स्टार था, न ही कोई भव्य सेट। निर्देशक विजय शर्मा और निर्माता सतराम रोहरा के नाम तब बहुत कम लोग जानते थे। फिल्म की एकमात्र पहचान थी गीतकार प्रदीप का नाम, जिन्होंने “ऐ मेरे वतन के लोगों” जैसा अमर गीत लिखा था।

फिल्म की कहानी एक ऐसी देवी के इर्द-गिर्द बुनी गई थी, जिसके बारे में उस जमाने में बहुत कम लोग जानते थे – संतोषी मां। माइथोलॉजी की फिल्में उस दौर में पुरानी हो चुकी थीं। नतीजा, फिल्म को रिलीज होते ही ‘फ्लॉप’ का ठप्पा लग गया। शुरुआती कमाई ने इसी की पुष्टि की। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

कैसे बदला रुख? क्या था वो ‘चमत्कार’?

रिलीज के लगभग दस दिन बाद, जैसे कोई जादू की छड़ी घूम गई हो, फिल्म की किस्मत बदलने लगी। अचानक, सिनेमाघरों के बाहर महिलाओं और परिवारों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं। यह चेन रिएक्शन था, जो मुंबई से शुरू होकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक पहुंच गया।

इसकी सबसे बड़ी वजह थीं महिलाएं। फिल्म ने उन्हें एक ऐसी देवी दी, जो सीधे-सीधे उनकी रोजमर्रा की पीड़ा, उनकी आशाओं और संतुष्टि (‘संतोष’) से जुड़ी थी। सिनेमाघरों ने इसका बेहतरीन फायदा उठाया और ‘महिला स्पेशल शो’ शुरू किए। शनिवार की दोपहर, जब बच्चों की छुट्टी हो जाती, तब ये शो रखे जाते। ये सिर्फ फिल्म देखने का अनुभव नहीं था; ये एक सामूहिक पूजा थी।

जब फिल्म में “मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की” गाना बजता, तो पूरा सिनेमाघर एक मंदिर में तब्दील हो जाता। महिलाएं अपने साथ लाई आरती की थालियां निकालतीं, फूल और मिठाई चढ़ातीं, परदे की ओर सिक्के फेंकतीं। फिल्म खत्म होने के बाद सिनेमाघर के फर्श पर सिक्कों और फूलों का अंबार लगा रहता। कहा जाता है कि सफाई कर्मचारियों के पैरों तले जमीन ‘खन-खन’ करती रह जाती थी।

सफलता का झूठा परचम: जिसके हाथ आया सिर्फ छल

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। 5 से 10 करोड़ रुपए के बीच की कमाई का अनुमान है, जो उस जमाने के हिसाब से एक विशाल रकम थी। यह ‘शोले’ के बाद 1975 की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। निर्माता सतराम रोहरा और डिस्ट्रीब्यूटर केदारनाथ अग्रवाल व संदीप सेठी के लिए ये मुनाफे की ऐसी बंदरबांट होनी थी, जिससे सबकी तकदीर बदल जाती।

लेकिन हुआ उल्टा। कहा जाता है कि डिस्ट्रीब्यूटर्स ने धांधली की और सारा पैसा हजम कर लिया। नतीजा? फिल्म के निर्माता सतराम रोहरा को आर्थिक तंगी के चलते खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा। फिल्म के लीड एक्टर आशीष कुमार, जिन्होंने खुद को इस फिल्म का आइडिया जनक बताया, ने मुनाफे में हिस्से को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। करोड़ों कमाने वाली फिल्म के पीछे भागते लोगों के हाथ में आखिरकार कुछ भी नहीं आया।

अनंत दुखों की कहानी: क्या सच में था ‘श्राप’?

फिल्म की सफलता के बाद जो हुआ, वह इसे एक अलौकिक, भयावह मोड़ देता है। लोगों ने इसे ‘देवी के नाराज होने’ का नतीजा माना।

  • अनीता गुहा: देवी बनीं, लेकिन खो बैठीं अपनी पहचान अनीता गुहा, जिन्होंने संतोषी मां का किरदार निभाया, रातों-रात करोड़ों भारतीयों के लिए ‘माता’ बन गईं। लोग उन्हें सिनेमा की स्क्रीन नहीं, बल्कि एक साक्षात देवी के रूप में देखते थे। वे जहां भी जातीं, लोग उनके पैर छूने को आतुर रहते। लेकिन यही पहचान उनकी सबसे बड़ी जेल बन गई। उन्हें और कोई रोल नहीं मिला। लोग उन्हें सिर्फ एक देवी के रूप में ही देखना चाहते थे। इसके बाद उन्हें ल्यूकोडर्मा (सफेद दाग) हो गया, जिससे वह टूट गईं और पूरी तरह से एकांतवास में चली गईं। 2007 में उनके निधन से पहले उनका आखिरी अनुरोध था – “मेरे मरने के बाद मेरे चेहरे पर मेकअप कर देना।”
  • केदारनाथ अग्रवाल: फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर केदारनाथ को कुछ सालों बाद लकवे का अटैक आया, जिसे कई लोगों ने दैवीय प्रतिकार का हिस्सा माना।
  • कलाकार गुमनामी में खो गए: फिल्म का कोई भी अन्य कलाकार बड़ा स्टार नहीं बन पाया। सबकी किस्मत ने जैसे यहीं से मुंह मोड़ लिया हो।

विवादों में घिरी फिल्म: एक महिला पहुंच गई कोर्ट

फिल्म की सफलता से एक और विवाद पैदा हुआ। गुजरात की एक महिला, उषाबेन, फिल्म देखकर आगबबूला हो गईं। उनका आरोप था कि फिल्म में अन्य देवियों – लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ‘खलनायिका’ जैसा दिखाया गया है, जो एक साधारण भक्त सत्यवती की परीक्षा लेती हैं। उन्होंने इसके खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला मानते हुए खारिज कर दिया, लेकिन यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि फिल्म ने लोगों की भावनाओं को कितनी गहराई से छुआ था।

निष्कर्ष: एक अमर विरोधाभास

‘जय संतोषी मां’ का किस्सा सिनेमा के इतिहास में एक अद्भुत और अद्वितीय विरोधाभास है। यह आस्था, व्यवसाय, नियति और मानवीय लालच की एक ऐसी गाथा है, जिसका कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं है।

यह फिल्म इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि सिनेमा की ताकत सिर्फ स्टार्स और बजट में नहीं, बल्कि दर्शकों के दिलों तक सीधे पहुंचने में होती है। इसने एक ऐसी देवी को राष्ट्रीय पहचान दी, जो पहले सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर जानी जाती थी। आज भी देश के कोने-कोने में संतोषी मां के 16 शुक्रवार के व्रत रखे जाते हैं और उनकी आरती के तौर पर उसी फिल्म का गाना गाया जाता है।

लेकिन यह कहानी एक चेतावनी भी है। एक चेतावनी उन लोगों के लिए जो लोक-आस्था का अनियंत्रित व्यवसायीकरण करते हैं। एक चेतावनी उस कीमत के बारे में जो कभी-कभी अप्रत्याशित सफलता चुकानी पड़ती है।

‘जय संतोषी मां’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक घटना थी। एक ऐसा चमत्कार जिसने लोगों का भाग्य बदल दिया, लेकिन खुद अपने रचयिताओं का भाग्य नहीं बदल पाया। यह इतिहास का वो पन्ना है जो हमेशा याद दिलाता रहेगा कि सफलता का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि उससे मिले सम्मान और कर्म की पवित्रता को बनाए रखना है। और शायद, यही इस पूरे किस्से का सबसे बड़ा नैतिक संदेश है।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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