- अखिलेश शुक्ला
साल 1975 हिंदी सिनेमा के लिए ऐतिहासिक था। ‘शोले’ जैसी बड़ी फिल्म इसी साल आई थी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। लेकिन उसी साल एक और फिल्म आई, जिसने न तो धुआंधार प्रचार किया, न ही उसमें सुपरस्टार थे। वो फिल्म थी – ‘जय संतोषी मां’, जिसने न केवल पर्दे पर सफलता का परचम लहराया, बल्कि लोगों की श्रद्धा और विश्वास में भी अपना स्थान बना लिया।
पर ये कहानी सिर्फ एक हिट फिल्म की नहीं है। ये किस्सा है उस चमत्कार की, जिसने सिनेमाघरों को मंदिर बना दिया, और उस दुर्भाग्य की, जिसने फिल्म के निर्माता को दिवालिया कर दिया।
शुरुआत जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी
30 मई 1975 को जब ‘जय संतोषी मां’ रिलीज हुई, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि ये फिल्म इतिहास लिखने जा रही है। शुरुआती दिन बेहद निराशाजनक थे। मुंबई के एक सिनेमाहॉल में पहले दिन के तीनों शो मिलाकर सिर्फ 220 रुपये की कमाई हुई। ट्रेड पंडितों ने इस फिल्म को फ्लॉप घोषित कर दिया था।
मायथोलॉजी फिल्मों का चलन खत्म हो चुका था। आज के युवाओं की तरह तब की पीढ़ी भी मॉडर्न सिनेमा की ओर आकर्षित थी। ऐसे में एक अनजान देवी पर बनी फिल्म, जिसे बहुत से लोग जानते तक नहीं थे, किसे भाएगी? लेकिन दस दिन बाद फिल्म के भाग्य ने करवट ली। जैसे किसी दैवीय शक्ति ने हस्तक्षेप किया हो। छोटे कस्बों और गांवों से लोग कतार में लगकर फिल्म देखने लगे। यह सामान्य प्रतिक्रिया नहीं थी, यह श्रद्धा थी – अंधी नहीं, लेकिन आस्था से भरी हुई।
जब पर्दा बना मंदिर और सिनेमा बना पूजा
‘जय संतोषी मां’ की सबसे खास बात थी उसका संगीत। “मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की” जब थिएटर में बजता, तो महिलाएं आरती की थाल लेकर आतीं। वे फूल बरसातीं, सिक्के फेंकतीं, और गरबा करतीं।
कई सिनेमाघरों ने महिलाओं के लिए विशेष शो शुरू कर दिए, यह शनिवार को दोपहर में रखे जाते थे, ताकि महिलाएं घर के कामकाज और बच्चों की छुट्टी के बाद फिल्म देख सकें। उन शो में पुरुषों का प्रवेश निषेध था। जब पर्दे पर माता प्रकट होतीं, तो सिनेमाघर का हर कोना किसी मंदिर की भांति गूंज उठता। यह सिर्फ फिल्म देखना नहीं था, यह एक आध्यात्मिक अनुभव बन गया था।
सीमित बजट, असीमित कमाई
फिल्म का निर्माण बेहद सीमित संसाधनों में हुआ था। इसकी लागत को लेकर अलग-अलग आंकड़े हैं — कोई 3 लाख कहता है, कोई 11 लाख। लेकिन जो बात तय है, वह है इसका मुनाफा। फिल्म ने लगभग 5 से 10 करोड़ रुपये तक की कमाई की।
यह 1975 की दूसरी सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनी। उससे ऊपर सिर्फ ‘शोले’ थी। नीचे थीं ‘दीवार’, ‘प्रतिज्ञा’, और ‘संन्यासी’ जैसी बड़ी बजट वाली फिल्में। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह रही कि इस भारी-भरकम कमाई का लाभ फिल्म के निर्माता या कलाकारों को नहीं मिला।
निर्माता बना कंगाल, कलाकार हुए गुमनाम
फिल्म के निर्माता सतराम रोहरा को उम्मीद थी कि इस फिल्म की सफलता उनके जीवन की दिशा बदल देगी। लेकिन हुआ उल्टा। उन्हें अपने जीवन की सबसे बड़ी फिल्म के बाद खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा। बताया जाता है कि फिल्म को 50 से ज्यादा वितरकों ने ठुकरा दिया था। आखिर में केदारनाथ अग्रवाल और संदीप सेठी ने फिल्म के वितरण का जिम्मा लिया। लेकिन बाद में वितरकों ने वित्तीय धांधली कर दी और सारा मुनाफा खुद दबा लिया। नतीजा यह हुआ कि जिसने फिल्म बनाई, वह खाली हाथ रह गया। यही नहीं, फिल्म के प्रमुख कलाकार भी कभी बॉलीवुड में अपना स्थान नहीं बना सके।
अनीता गुहा: जो देवी बनीं, लेकिन गुमनाम गईं
‘जय संतोषी मां’ में संतोषी माता की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री अनीता गुहा के लिए यह फिल्म वरदान भी साबित हुई और अभिशाप भी। वह पहले ही कई मायथोलॉजिकल फिल्मों में काम कर चुकी थीं और टाइपकास्ट हो रही थीं।
जब उन्हें इस फिल्म का ऑफर मिला, तब उन्हें संतोषी माता के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। शूटिंग के दौरान उन्होंने पूरी श्रद्धा से व्रत रखे और नाश्ता तक नहीं किया।
जब फिल्म हिट हुई, तो उन्हें सच्ची देवी समझा जाने लगा। महिलाएं उनके पैरों में गिर जाती थीं, बच्चे उनकी गोद में रख दिए जाते थे। अनीता अब अभिनेत्री नहीं रहीं, वह आस्था का प्रतीक बन गईं।
लेकिन यह सब उनके निजी जीवन में भारी पड़ गया। उन्हें Leukoderma नामक त्वचा रोग हो गया। उन्होंने घर से निकलना बंद कर दिया, कैमरे से दूरी बना ली। 2007 में उनकी मृत्यु हुई, और उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा में कहा था, “मेरे मरने से पहले मेरे चेहरे पर मेकअप कर देना।”
कोर्ट में फिल्म, न्याय में आस्था
फिल्म के एक हिस्से में तीन देवियां – लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती – सत्यवती नाम की लड़की से ईर्ष्या करने लगती हैं, क्योंकि वह संतोषी माता की भक्त होती है। गुजरात की उषाबेन को यह बात बुरी लगी। उन्होंने कोर्ट में केस कर दिया कि फिल्म में देवताओं को गलत तरीके से दिखाया गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा, “अगर आपको आपत्ति है, तो आप फिल्म न देखें। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है।” मामला खारिज हो गया।
यह निर्णय आज भी भारतीय सिनेमा के लिए मिसाल माना जाता है।
चमत्कार की विरासत, लेकिन अधूरी कहानी
‘जय संतोषी मां’ एक फिल्म थी, लेकिन उसने धार्मिक विश्वासों में क्रांति ला दी। संतोषी माता जो कभी भारत के ग्रामीण हिस्से की देवी मानी जाती थीं, अब हर शहर, हर गली की आराध्य बन गईं। मंदिरों में संतोषी माता की मूर्तियां आने लगीं, उनके व्रत की लोकप्रियता बढ़ी। 16 शुक्रवार का व्रत भारत के कई इलाकों में महिलाओं का आस्था-संपन्न अनुष्ठान बन गया। लेकिन इस विरासत के पीछे दर्द भरी दास्तां भी जुड़ी रही। किसी को पैसा नहीं मिला, कोई पहचान में खो गया, तो कोई बीमारी में। फिल्म ब्लॉकबस्टर हुई, लेकिन उससे जुड़े लोग गुमनामी की धुंध में खो गए।
अंतिम दृश्य: आस्था, विडंबना और सिनेमा
‘जय संतोषी मां’ कोई साधारण फिल्म नहीं थी। यह उस दौर की फिल्म थी, जब दर्शकों का विश्वास कहानी पर हावी हो जाता था। आज की फिल्मों में चाहे VFX हो, बड़े सितारे हों या हजार करोड़ की कमाई—वैसी श्रद्धा फिर नहीं दिखती।
निष्कर्ष
यह फिल्म आज भी एक आस्था का प्रमाणपत्र है, और एक सिनेमा की विडंबना भी। जिसने दिलों में देवी को जगा दिया, पर उसी देवी की फिल्म ने अपने ही निर्माता और कलाकारों को सोने नहीं दिया। यदि आपने यह फ़िल्म नहीं देखी है तो एक बार अवश्य देखें। इस तरह की फिल्में गिनी चुनी ही बनी है।
आपकी सुविधा के लिए फ़िल्म का लिंक हमनें नीचे दिया है।
https://youtu.be/_SjrLt7-D6Q?si=DcBERx3PYG9b1Esg
अखिलेश शुक्ला
सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक ब्लॉगर










