झरोखा: फट्टे का कुरता, मिट्टी का टोप

झरोखा: फट्टे का कुरता, मिट्टी का टोप

पंकज पटेरिया/ शुद्ध फट्टे लम्बा कुरता, सिर पर मिट्टी का कटोरे नुमा टोपा, खिचड़ी केश। दाढ़ी ,वात्सल्य से भरे नेत्र मुख मंडल पर अदभुत तेज,ओर बोली इतनी मीठी कानों में मिश्री घोलती घर के किसी अपने बुजुर्ग सी प्यार करती दुलारती। ऐसे थे महान समाज सुधारक सिद्ध संत शिरोमणि पूज्य गाडगे जी महाराज। गाडगे महाराज जी का जन्म महाराष्ट्र अमरावती जिले के शेड गांवो ग्राम के एक बहुत साधारण धोबी (रजक) परिवार में 23 फरवरी 1876 में हुआ था। उनका पूरा नाम देवी दास डे बुजी झिगो राजी जनोकर था,लेकिन गाडगे जी महाराज सें उनकी कीर्ति सिद्धि प्रसिद्धि घर घर में व्याप गई थी। बचपन से ही उनका मन परमात्मा के चरण में ऐसा रम गया था, कि वे सकल मानव समाज के उद्धार शिक्षण और अंधविश्वास कुरूतियों भेदभाव नशाखोरी की समाप्ति मैं प्राण प्रण से लग गए। घर परिवार की चार दीवारी से सड़क पर भिक्षुक बनकर निकल गए। भिक्षा से उदर पोषण करते, नंगे पैर या कभी फ्ट्टी चप्पल पहने गांव गांव जाते, नाली नाले खुद साफ सफाई करते जन कल्याण के उपदेश देते, ओर शाम किसी के भी घर आग न ओटले पर कबीर दास जी रैदास अन्य संत महात्माओं के प्रेरक भजन सत्संग करते, अगली सुबह फिर नए गांव देहांत की ओर रुख करते। यही उनकी दिनचर्या थी। कोई लोभ लालच मोह माया उन्हें कभी छू तक नहीं सकी। भीख से जो पैसे उन्हें मिलते वे उन्हें समाज कल्याण शिक्षा, अस्पताल अनाथ आश्रम ओर ऐसे ही कामो के लिए लोगो या संस्था को दान करते देते थे।

(एक साथ कई स्थानों पर दर्शन) संत गाडगे जी महाराज को अनेक सिद्धि प्राप्त थी। लेकिन वे सिवाए किसी गरीब दुखी की मदद के अलावा इनका प्रदर्शन नहीं करते थे। इटारसी में हमारा जाना माना प्रतिष्ठित बहुत बड़ा परिवार था। पिताजी बाबू जी स्व. गणेश प्रसाद पटेरिया जी की ब्रिटिश सरकार के दौर में रेलवे में गार्ड पद पर सर्विस लगी,बाबूजी पूज्य अम्माजी स्व. रानी माँ को लेकर महाराष्ट्र पहुंचे ,जवंत माल में उनकी नियुक्ति हुई थी। वहा एक घर में कीर्तन करते बाबूजी की भेंट गाडगे जी महाराज से हुई थी। फिर सौभाग्य से उनकी कृपा दृष्टि से जब हर छोटी चीज तक के लिए भारी परेशानी होती थी, महाराज जी की कृपा दया से हमे सब सुख सुविधा उस अंजाने स्थान पर मिलती गई। समृद्धि बड़ी। बाबू जी अम्मा जी अत्यंत धार्मिक ओर परोपकारी उदार प्रकृति के थे। सादा जीवन शैली नोकरी चाकरी के बाद जो समय मिलता पूजा पाठ कीर्तन में सुख पूर्वक व्यतीत होता। एक साथ अनेक घरों में अपनी उपस्थिति यही बाबू जी को महाराज जी को अनुभव हुई। मेरे 80 बरसी अगे्रज शिक्षा विद श्री केशव प्रसाद पटेरिया ओर 75 बरसी रिटायर्ड पुलिस अधिकारी श्री शरद पटेरिया पुलकन भरे बताते है कि बाबूजी ने एक बार घर पर कीर्तन रखा। गाडगे महाराज की दिव्य उपस्थिति में भजन कीर्तन चलते रहे प्रसादी लेकर बस्ती के लोग अपने अपने घर चले गए।

सुबह चैक पर पर चित लोग आपस में एक दूसरे के घर महाराज जी के कीर्तन में न आने की वजह पूछ उलहाने देने लगे। लेकिन बाबूजी हैरत में पड़ गए जब सब यह कह रहे थे। महाराज जी उनके यहां कीर्तन कर रहे थे। ऐसे प्रसंग जब चाहे जब होते रहते। इसी तरह किसी की मदद इमदाद के लिए भी गाडगे बाबा एक साथ सभी जगह पहुँच जाते थे। बाद में का पिताजी का तबादला नागपुर हो गया, बाबा की कृपा छाया यहां भी परिवार को मिलती रही। जब भी उनका मन होता या उनका स्मरण होता, बे घर में आ जाते। भाई साहब भाव विभोर होकर बताते घर आते आंगन में नीचे बैठ जाते बहुत कहने पर भी भीतर नहीं आते ओर न चरण छूने दे दे। नको नको बोलते कहते तुम्ही ब्राम्हन आहे बाबा। अम्मा बाबूजी कहते महाराज जी आप संत है, हम साधारण मनुष्य है।लेकिन वे भागने लगते। एक बार दो पहर तीन अन्य लोगो के साथ गाडगे जी महाराज अजनी स्थित हमारे घर आए ओर बोले अम्माजी माई भोजन हो।गया है न ? अम्माजी ने कहा जी बोले चोंके जो भी बचा वह लादो बहुत भूख लगी है। अम्मा ने कहा बहुत थोड़ा है।आप थोड़ा समय दस मिनिट दीजिए ताजा बना देती हूं। लेकिन बाबा ने वही बचे खाने की जिद की।

अम्माजी थाली लगाने लगी तो बोले नको नको इस पर डालदो माई। अम्मा जी ने दाल,चावल ,सबजी रोटी जितनी भी थी सब जो पेपर महाराज जी ने बिछाया था, उस पर डाल दी।तीनों विभूतियों ने प्रेम से भोजन किया, ओक से पानी पिया और जय राम हरे राम बोल चल दिए। एक बार फिर कभी भोजन करने आए भोजन के बाद अम्माजी से बोले माई तू ने जो चो ली पहनी है मुझे अभी दे,अम्माजी को संकोच करने लगी पर बच्चो जैसी जिद करने लगे तब अम्मा जी ने चोली त हकर नीचे रख दी। महाराज जी ने तुरन्त फुर्ती से उठाई और पानी पीते हुए पूरी निगल गए। ओर चले गए उसके पीछे क्या लीला थी कोन सी मुसीबत से परिवार को बाबा ने बचाया भगवान ही जाने। ऐसे बहुत सारे अदभुत किस्से जो मेरे सबसे बड़े भाई स्व. एस जी पटेरिया (वरिष्ठ रेलवे अधिकरी) भी बताते थे। ऐसे अनेक कृपा संस्मरण है। महाराष्ट्र ओर देश में उनके नाम अनेक विश्व विद्यालय अस्पताल अनाथ आश्रम सेवा संस्थान चल रहे। गाडगे महाराज ने भक्तो से कहा था मेरी मृत्यु जहा हो वही ही अंतिम संस्कार करदे ना। लिहाजा अमरावती जाते 20 दिसम्बर 1956 को महाराज की मृत्यु हुई।उसी स्थान पर उनका इच्छा अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकिट जारी किया। लेकिन बे खुद की मूर्ति फोटो की स्थापना के विरोधी थे।मानव कल्याण सेवा के काम।आगे भी चलते रहे, वही ईश्वर की सच्छी सेवा पुजा और उपासना है। यही उनकी सदा मंषा रही।हम उनके आदर्शो ओर बताए मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बना सकते है। जय श्री गाडगे महाराज की।

पंकज पटेरिया (Pankaj Pateria)
संपादक शब्द ध्वज
पत्रकार कवि
ज्योतिष सलाहकार होशंगाबाद,
मो. 9893903003,9407505691

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