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झरोखा : भीगते सीलते शहर की व्यथा कौन कहे, साफ सुथरे हों न जाए खपा कौन कहे

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  • पंकज पटेरिया
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भीगते सीलते शहर की व्यथा कौन कहे, साफ सुथरे हो जाए खपा कौन कहे। खास लोगों की महफिल में आम मोहल्लों की कथा कैसे कौन कहे। मानसून के आगमन से बेशक राजधानी भोपाल और भी खूब सूरत हो गई। कोलार डैम, वीआईपी रोड, मनुआभान टेकरी, श्यामा हिल्स, वन बिहार आदि स्थानों पर खुशनुमा मंजरों को देखने राज धानी वासियों की भीड़ उमडऩे लगी है। जाहिर है इससे गरीब छोटे तबगे के गोल गप्पे, भुट्टे, भुनी मूंगफली, चाट पकोड़े के ठेलों पर चमक आगई। उनके उदास चेहरों पर भी खुशी के रंग उतरने लगे हैं। लेकिन इससे अलग शहर का भीतरी चेहरा बहुत सर्द, सिसकता हो गया है, जबकि बारिश की यह पहली आमद है, और ऐसे हालत हैं तो, जवाबदार लोगों की भूमिका पर सवाल खड़े होना हैरानी नहीं है।

कुछ दिनों से लगातार हो रही इस बरसात ने ढोल बजाकर गाल बजाकर किए तमाम प्रबंध की पोल खोल कर रख दी है। सब जगह एक से तरबतर मंजर हैं। हालत यह है कि सलीके से सफाई नहीं होने से नाले नालियां औकात छोड़ सड़कों पर बह रहे हैं। कहीं सड़कों की खुदाई दुखदाई बन गई। कहीं नवनिर्मित सड़क अपने साथ हुए ऊपरी लीपापोती और मेकअप के हालात बयान कर रही हैं। नतीजतन कार्य की पारदर्शिता प्रकट होने लगी। ताजा उदाहरण 90 डिग्री का प्रसंग काफी है जो कार्य की कथित मुस्तैदी ईमानदारी को रेखांकित करता है। वह तो निरंतर भाग दौड़ करते रहने वाले मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की लगातार मॉनिटरिंग है कि लोग चाक चौबंद होकर ड्यूटी दे रहे हैं। फिर भी मानसून के आगमन से व्यवस्था तो डिस्को करने ही लगी है।

यंू बारिश भी जरूरी है, ग्लोबिंग वार्मिंग को दृष्टिगत को रखते हुए। बहरहाल हम भी दोषी हैं, वार्मिंग के लिए क्या हम जवाबदार नहीं हैं? पर्यावरण बिगाडऩे के लिए, प्रदूषण करने के लिए, पानी वाले ये दिन आगे राहत भरे बीते, आफत भरे नहीं। ना भीगे, सीले झुग्गी झोपड़ी वाली बस्तियां, न लोगों के घरों में पानी भरे, न आए नदी नालों में उफान। क्या गारंटी? विकास के नाम पर पेड़ पौधों की बलि दी जाती है। क्या सरकार ही उसकी भरपाई करे। हम न क्यों नहीं? हमारी भी जिम्मेदारी है, बस एक दिन फोटो के लिए कोई पौधा लगाकर इति नहीं हो जाती दायित्व की।

हर कालोनी, मोहल्लों को संकल्प लेकर हरियाली की चादर धरती पर फैलाना होगी। उसी तरह क्यों जबरिया कब्जे, चौक नाले, नालियां गंदगी के पहाड़, पॉलीथिन का दानव धीरे-धीरे जल, जन, जमीन को लीलिता जा रहा है, और हम शुतुरमुर्ग बने हैं। दिन ब दिन यह नारकीय स्थिति भयावह होती जा रही है। अभी भी वक्त है, हम चेत जाएं। नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।

पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
संपादक, शब्द ध्वज

Rohit Nage

रोहित नागे वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में तीन दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक किया है तथा लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। अपने पत्रकारिता जीवन में उन्होंने दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राज एक्सप्रेस, पीपुल्स समाचार, नवभारत सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में रिपोर्टर, उप-संपादक, ब्यूरो प्रमुख एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य किया है। वे Narmadanchal.com के रिपोर्टर, उप-संपादक, एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य कर रहे हैं और नर्मदांचल क्षेत्र की निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय समाचारों पर विशेष रूप से लेखन एवं संपादन कार्य कर रहे हैं।

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