कविता: हिय का स्वामी

कविता: हिय का स्वामी

ए सखी
चल उर की और चलें
जहाँ हिय का स्वामी
चिर काल से वास करें।
सब और खोजें
व्याकुल अंखियां
पर बाह्य चेतन में
सिर्फ उसका सखी
प्रतिबिंब दिखे।
सो सखी सुन
चलें भीतर ,जित
हिय का स्वामी
तित वास करे।
वो ऐसा सुवासित
कण कण में महके
हर कतरे में
वो श्वास बसे
पर प्रिय सखी
मत बिसरो
कस्तुरी भीतर
अन्तर्मन बसे।
चित्त की गति
समझी ना जाये
छिपा पिय को
द्वार खुले रख
हम से ही पी को
हमसे दूर करे
आ बंद करें अब
हृदय द्वार भी
बसे जहां नाथ सखी री
सिर्फ हम भी
वहीं वास करे।

मीनाक्षी ” निर्मल स्नेह “
खोपोली ( मुंबई )

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