कविता: तुम्हारे आंचल की गिरहा में…

कविता: तुम्हारे आंचल की गिरहा में…

तुम्हारे आंचल की गिरहा में
इक धूप का टुकड़ा बांधा है हमने
गर तुम राह – ए – मंज़िल बनो
तो सुनहरी हो जाएं राहें।

कुछ ख़्वाब भी बांधे हैं
तुम्हारे लहराते आंचल से
गर तुम सुकून – ए – दिल बनो
तो इश्क से गूंजें फिजाएं।

और समेट दिए हैं कुछ
इश्किया लम्हे तुम्हारे आंचल में
गर तुम शरीक – ए – हाल बनो
तो शुकराना करें निग़ाहें।

अदिति टंडन(Aditi Tandan)
आगरा 

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