- अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

“मुझे एक्टिंग से कोई लेना-देना नहीं… मुझे तो गाना पसंद है।” ये शब्द हैं किशोर कुमार के, जो उन्होंने लता मंगेशकर को दिए एक दुर्लभ साक्षात्कार में कहे थे। 4 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में जन्मे इस महान कलाकार ने अपनी आवाज़ से हिंदी सिनेमा की दिशा ही बदल दी। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ गाने की नहीं, बल्कि ज़िद, हुनर और अद्भुत मनमौजीपन की भी है। आइए, जानते हैं किशोर कुमार के जीवन और करियर से जुड़ी 7 अनोखी बातें जो उनकी प्रतिभा को एक नई रोशनी में दिखाती हैं।
1. दो दशकों का संघर्ष: जब सलिल चौधरी ने कहा- “तुम्हें संगीत की एबीसी भी नहीं आती”
एक दौर था जब किशोर कुमार को सिर्फ एक मनोरंजक अभिनेता माना जाता था, गायक नहीं। 1950 के दशक में बॉलीवुड पर केएल सहगल, तलत महमूद और मोहम्मद रफी जैसे शास्त्रीय रूप से प्रशिक्षित गायकों का बोलबाला था। किशोर कुमार को गायकी के लिए गंभीरता से नहीं लिया जाता था। 1954 में बिमल रॉय की फिल्म ‘नौकरी’ में एक बड़ा हादसा हुआ। संगीतकार सलिल चौधरी किशोर की आवाज़ में गाना रिकॉर्ड नहीं करना चाहते थे, उन्हें हेमंत कुमार चाहिए थे। किशोर ने अपनी पुरानी रिकॉर्डिंग सुनाईं, लेकिन सलिल दा ने उन्हें साफ कह दिया, “तुम्हें संगीत की एबीसी भी नहीं आती।” बिमल रॉय के सहयोग से किशोर ने जिद पकड़ी और ‘छोटा सा घर होगा’ गाना रिकॉर्ड कराया – जो न सिर्फ सुपरहिट हुआ, बल्कि उनके गायन करियर की नींव भी बना।
2. जब गंजा होकर गए तो राजेश खन्ना को मिली ‘आनंद’ मूवी
किशोर कुमार एक्टिंग से इतनी नफरत करते थे कि वे रोल से बचने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। 1971 की क्लासिक फिल्म ‘आनंद’ में मुख्य भूमिका पहले उन्हें ही ऑफर की गई थी। गुलज़ार की यादों के अनुसार, शूटिंग से कुछ दिन पहले लुक-डिस्कशन मीटिंग में किशोर पूरी तरह गंजे सिर के साथ पहुँचे और नाचते-गाते बोले, “अब क्या करोगे हृषि?” यह देखकर ऋषिकेश मुखर्जी सहित पूरी टीम स्तब्ध रह गई। फिर क्या, यह भूमिका राजेश खन्ना को मिली, जिसने उसे अमर बना दिया। गुलज़ार ने इस हरकत पर कहा था, “मैंने कभी किसी को इस तरह अभिनय से मुंह मोड़ते नहीं देखा।”
3. जब आधी मूंछ और आधा सिर मुंडवाकर मांगा बकाया पैसा!
किशोर कुमार पैसे को लेकर बहुत स्पष्ट थे और किसी भी चालाकी को बर्दाश्त नहीं करते थे। एक बार एक निर्माता ने आधी फीस अग्रिम दे दी और बाकी फिल्म पूरी होने पर देने की बात कही। अगले दिन किशोर ने अपना आधा सिर और आधी मूंछ मुंडवाकर शूटिंग पर आ गए! उन्होंने कहा कि जब तक पूरा पैसा नहीं मिलेगा, वे हर शॉट में ऐसे ही दिखेंगे। निर्माता को हार माननी पड़ी। इसी तरह, जब एक निर्माता ने उन्हें 8,000 रुपये नहीं दिए, तो किशोर रोज़ सुबह उनके घर जाकर आवाज़ लगाते थे, “अए तलवार, दे दे मेरे आठ हज़ार!”
4. ‘पांच रुपैया बारह आना’: कॉलेज कैंटीन का कर्ज़ बना मशहूर गाना
क्या आप जानते हैं कि ‘चलती का नाम गाड़ी’ का मशहूर गाना ‘पांच रुपैया बारह आना’ इंदौर के कॉलेज कैंटीन के एक पुराने कर्ज़ से प्रेरित था? किशोर कुमार ने अपने कॉलेज के दिनों में कैंटीन से 5 रुपये 75 पैसे (पांच रुपैया बारह आना) उधार लिए थे, जिसे उन्होंने इस हिट गाने की कहानी बना दिया। इस गाने में मधुबाला भी थीं, जो बाद में उनकी दूसरी पत्नी बनीं।
5. एक गाना, दो आवाज़ें: जब लता मंगेशकर की अनुपस्थिति में खुद गाया दोनों पार्ट
‘हाफ टिकट’ का गाना ‘आके सीधी लगी दिल पे’ आज भी अपनी अनोखी अदाओं के लिए याद किया जाता है। यह गाना मूल रूप से लता मंगेशकर के साथ एक युगल गीत (duet) था, लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन लता जी उपलब्ध नहीं थीं। तब किशोर कुमार ने सलिल चौधरी को सुझाव दिया कि वे दोनों – पुरुष और महिला – पार्ट खुद गा लेंगे। सलिल दा ने इसे मज़ाक समझा, लेकिन किशोर ने यह कर दिखाया! एक ही गाने में उन्होंने दोनों सप्तकों (octaves) में अद्भुत गाया, जो उनकी अद्वितीय प्रतिभा को दर्शाता है।
6. बिना शास्त्रीय संगीत के बने बहुभाषी’ गायक
सबसे हैरानी वाली बात यह है कि किशोर कुमार को कभी शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी। फिर भी, वे 10 से अधिक भारतीय भाषाओं – हिंदी, बंगाली, मराठी, गुजराती, असमिया, मलयालम, उड़िया, कन्नड़, भोजपुरी और अंग्रेज़ी – में गा सकते थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें देश का सबसे पसंदीदा पार्श्वगायक बना दिया। बाद में, आरडी बर्मन ने उनकी इसी खूबी को पहचाना और अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैन इमेज के लिए उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया, जो राजेश खन्ना की रोमांटिक छवि से बिल्कुल अलग थी।
7. योडलिंग की शुरुआत और ‘बेवेयर ऑफ किशोर’ का बोर्ड
उनके गायन की सबसे खास पहचान ‘योडलिंग’ (yodelling) थी – आवाज़ को सामान्य से अत्यधिक स्वरों में उतार-चढ़ाव के साथ गाना। यह तकनीक उन्होंने अपने भाई अनूप कुमार के ऑस्ट्रियाई रिकॉर्ड्स से सीखी थी। लेकिन यही वह मनमौजी व्यक्तित्व था जिसने अपने घर के बाहर ‘Beware of Kishore’ (सावधान किशोर से) का बोर्ड लगा रखा था! उनकी यह सादगी और अलगपन उन्हें बाकियों से अलग बनाती थी।
निष्कर्ष
किशोर कुमार सिर्फ एक गायक या अभिनेता नहीं थे; वे एक विचार, एक विद्रोह और अद्भुत रचनात्मकता का नाम थे। खंडवा की मिट्टी से निकले इस कलाकार ने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के वह मुकाम हासिल किया, जो विरलों को ही नसीब होता है। जब सलिल चौधरी ने उनकी संगीत की काबिलियत पर शक किया, तब उन्होंने हार नहीं मानी। जब उन्हें वह रोल करने को कहा गया जो उन्हें पसंद नहीं था, तो उन्होंने गंजा होकर मना कर दिया। उन्होंने साबित किया कि सफलता का मतलब केवल तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि जज़्बा, ईमानदारी और अपनी पहचान बनाना है।
13 अक्टूबर 1987 को जब वे इस दुनिया से गए, तो अपने पीछे हज़ारों गाने छोड़ गए, जो उनकी कहानी बयां करते हैं। आज भी जब कभी ‘पल पल दिल के पास’, ‘मेरे सपनों की रानी’, या ‘ज़िंदगी एक सफर है सुहाना’ बजता है, तो किशोर कुमार जीवंत हो उठते हैं। उनकी आवाज़ हमेशा ज़िंदा रहेगी, हमें सिखाती रहेगी कि मज़ा लें, अलग बनें और अपनी धुन में जिएँ। बस, यही है किशोर कुमार – “ज़िंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो, किसने जाना…”











