यादें : उफनती नर्मदा, याद आई 30 अगस्त 1973 की भीषण बाढ़…!

यादें : उफनती नर्मदा, याद आई 30 अगस्त 1973 की भीषण बाढ़…!

पंकज पटेरिया (Pankaj Pateriya) :
हमारी जीवन रेखा माँ नर्मदा (Maa Narmada) भारी बारिश और बांधो के गेट खोले जाने से उफान पर है। हालाकि निचले इलाके पानी से घिरे है, जिला प्रशासन ने युद्ध स्तर पर चाक चौबंद होकर सभी सुरक्षा इंतजाम कर लिए है।सेना को अलर्ट कर लिया गया है। नर्मदा के रोद्र रूप को देख कर सहसा ही मुझे याद आई 47 बरस पहले 30-31 की रात आए सैलाब की भयावह याद, जिससे आज भी दहशत से से सिहर उठते नगर के लोग। मै दैनिक भास्कर रिपोर्टर था, सारा घटनाक्रम मुझे याद है। एक लूंगी शर्ट पहने रिपोर्टिंग करते रहे। अपने परिवार जनों के साथ सब तरफ पानी से घिरे हम लोगो ने रेलवे स्टेशन पर एक रिश्तेदार के यहां शरण ली थी।

गांव शहर में सैकड़ों लोग विप्लव से बरबाद हो गए थे। लगातार हो रही बारिश और अचानक होम साइंस कॉलेज (Home Science College) के पास के ब्रिटिश दौर की पिचन दीवाल टूटने से उफनती नर्मदा की धारा,गुरूप्रसाद स्कूल की तरफ से, इतवारा बाजार ओर निचले इलाके को तबाह करते मिश्रा बगला को चपेट में लेते हुए, बालागंज बीटीआई तक फेल गई। हलवाई चौक में नाव चलने लगी। उधर राजा मोहल्ला, जुमेराती, शनिचरा, बजरिया सहित तीन चौथाई शहर के हालात खराब थे। सब तरफ चीख पुकार हाहाकार मचा था। एकाएक आया देवी प्रकोप का सीमित साधनों से सामना करने में शासन प्रशासन सक्षम नहीं था।

बेघर दुख, तकलीफ से घिरे लोगो के रोष का शिकार अफसर, मंत्री आदि हुए। मिल्ट्री के कमान सँभालने के बाद हालत कुछ कुछ काबू में आने लगे थे। इटारसी, भॊपाल, हरदा, पिपरिया, बैतूल आदि जगहों के सेवाभावी लोग देवदूत बन कर आए थे, ओर हमारी मदद की थी। राहत सामग्री उपलब्ध कराई। एक गरीब युवती सरस्वती ने अपनी नाव से अनेक जान बचाई थी। नगर के अनेक सहासी युवकों ने अपने जान की परवाह न करते हुए पीड़ित लोगो की मदद की।

शासन प्रशासन अग्रणी भूमिका में आया, राहत काम किए। तब खतरे के निशान से 10-11 फिट ऊपर नर्मदा का पानी बह रहा था। नर्मदा जी सौम्य रूप में आने लगी, शहर भी सामान्य होने लगा। लेकिन भयंकर बदबू भरे नारकीय माहोल में डूबे शहर को उबरने ओर अपनी रोजी रोटी को फिर खडा करने में लोगो को लंबी जददोजहद से गुजरना पड़ा। जिंदादिल लोग फिर रोटी, कपड़े मकान के लिए संघर्ष करने जुट गए।
आज फिर संकट से सामना कर रहा है शहर, लेकिन आज प्रशासन सक्षम है। मा नर्मदा जी भी सौम्य रूप में आ जाएगी। लेकिन 1973 की याद दहलाती तो है। हर नर्मदे।


पंकज पटेरिया (Pankaj Pateriya)
वरिष्ठ पत्रकार/ कवि
संपादक : शब्द ध्वज
9893903000

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