प्रशासन पर भारी पड़ रहे छूट के तीन घंटे

प्रशासन पर भारी पड़ रहे छूट के तीन घंटे

इटारसी। निषेधाज्ञा के बीच सुबह 6 से 9 बजे तक तीन घंटे की छूट प्रशासन पर भारी पड़ रही है। एक साथ एक ही स्थान पर हजारों लोगों की भीड़ के आगे महज एक दर्जन पुलिस कर्मी बौने साबित हो रहे हैं। चौबीस में से 21 घंटे घरों में रहने वाले लोग महज तीन घंटे में सारी मर्यादाएं तोड़कर एक जगह एकत्र हो रहे हैं, प्रशासन इस छूट की अवधि में उनको नियंत्रित नहीं कर पा रहा है। लोग भी ऐसे पहुंच रहे हैं, जैसे आज के बाद सब्जी मिलेगी ही नहीं, जबकि हर रोज तीन घंटे के लिए सब्जी, दूध, किराना खरीदने का मौका मिल रहा है, दवाएं तो सारा दिन मिलेंगी, फिर भी दवा दुकानों पर भारी भीड़ हो रही है। अधिकारी, केवल तमाशायी बनकर रह गये हैं।
दो दिन में सब्जी मंडी में नजारा किसी मेले से कम नहीं था। पहले दिन सब्जी मंडी में पांव रखने की जगह नहीं थी, आज बुधवार को दूसरे दिन भी तस्वीर मंगलवार से जुदा नहीं थी। ऐसा लग रहा था कि लोग प्रतिबंध को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं। सब्जी मंडी के शेड के अलावा शनि मंदिर के सामने, भारत टाकीज चौराह से पत्ती बाजार तक सड़क पर हर जगह मानव सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। इस भीड़ को नियंत्रित करने एक दर्जन से भी कम पुलिस कर्मी थे। अलबत्ता पुलिस का वाहन अनाउंस करते हुए घूम रहा था कि सोशल डिस्टेंसिंग बनाये रखें। यह मुनादी भी इस भीड़ में मजाक लग रही थी।
न मास्क था, ना सेनेटाइजर
सब्जी मंडी में न तो दुकानदारों ने मास्क लगाया था और ना ही ग्राहकों ने। तीन से चार हजार की भीड़ में दस फीसद लोगों ने भी मास्क नहीं लगाया था। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग, सुरक्षित खरीद, खुद को बचाने जैसे शब्दों के मायने नहीं थे। सब्जी बाजार किसी त्योहार के बाजार से कम न था। सब्जी और फलों के दुकानदार भी सड़कों तक सामान फैलाये बैठे थे। भारत टाकीज चौराह से गुरुनानक काम्पलेक्स तक दुकानें लग गयी थीं। हालात इतने खराब थे कि बार-बार जाम लग रहा था। यही वक्त छूट का था तो इसी समय नीलामी और बाहर से आने वाली सब्जियों की अनलोडिंग का भी था। मजदूर माल उतार रहे थे, आढ़तिये नीलामी कर रहे थे, ग्राहक सब्जी खरीद रहे थे। सबकुछ छोटे से हिस्से में ही हो रहा था। कुल मिलाकर सुरक्षा प्रबंध जैसी कोई बात नहीं थी और कोरोना का डर तो कतई नहीं था।

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