शिव को पाने पार्वती ने की तपस्या : मधुसूदन शास्त्री

शिव को पाने पार्वती ने की तपस्या : मधुसूदन शास्त्री

इटारसी। अवाम नगर में भगवान पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में शिवपुराण के द्वितीय दिवस यजमान मेहरबान सिंह चौहान एवं श्रीमती शमा चौहान ने आचार्य पं. मधुसूदन शास्त्री को व्यासपीठ पर विराजित कराया। आरती एवं पूजन के साथ कथा प्रारंभ हुई।
कथा व्यास आचार्य पं. मधुसूदन शास्त्री ने कहा कि पिता दक्ष के यहां मना करने के बाद भी सती पहुंची और अपने पति भगवान शंकर का स्थान यज्ञ शाला में न देखने पर अत्यधिक दुखी हुई। जैसे ही सती के खुद को योगाग्रि में भस्म कर लेने का समाचार शिवजी के पास पहुंचा। तब शिवजी ने वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहां जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल दिया। सती ने मरते समय शिव से यह वर मांगा कि हर जन्म में आप ही मेरे पति हों। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती का जन्म लिया।
उन्होंने कहा कि जब से पार्वती हिमाचल के घर में जन्म तब से उनके घर में सुख और संपतियां छा गई। पार्वती जी के आने से पर्वत शोभायमान हो गया। जब नारद जी ने ये सब समाचार सुने तो वे हिमाचल पहुंचे। वहां पहुंचकर वे हिमाचल से मिले और हंसकर बोले तुम्हारी कन्या गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और शांत है। यह कन्या सुलक्षणों से सम्पन्न है। यह अपने पति को प्यारी होगी। इसमें जो दो चार अवगुण हैं वे भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, उदासीन, लापरवाह। इसका पति नंगा, योगी, जटाधारी और सांपों को गले में धारण करने वाला होगा।
यह बात सुनकर पार्वती के माता-पिता चिंतित हो गए। उन्होंने देवर्षि से इसका उपाय पूछा। तब नारद जी बोले जो दोष मैंने बताए मेरे अनुमान से वे सभी शिव में है। अगर शिवजी के साथ विवाह हो जाए तो ये दोष गुण के समान ही हो जाएंगे। माता पार्वती के संबंध में माता मैना को कहा कि यदि तुम्हारी कन्या तप करे तो शिवजी ही इसकी किस्मत बदल सकते हैं। तब यह सुनकर पार्वतीजी की मां विचलित हो गई। उन्होंने पार्वती के पिता से कहा आप अनुकूल घर में ही अपनी पुत्री का विवाह कीजिएगा क्योंकि पार्वती मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है। पार्वती को देखकर मैना का गला भर आया। पार्वती ने अपनी मां से कहा मां मुझे एक ब्राहा्रण ने सपने में कहा है कि जो नारदजी ने कहा है तू उसे सत्य समझकर जाकर तप कर। यह तप तेरे लिए दुखों का नाश करने वाला है। उसके बाद माता-पिता को बड़ी खुशी से समझाकर पार्वती तप करने गई। पार्वतीजी ने शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या आरंभ की। लेकिन शिव को सांसारिक बंधनों में कदापि रुचि नहीं थीए इसलिए पार्वतीजी ने अत्यंत कठोर तपस्या की ताकि शिव प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लें।
आचार्य श्री ने कहा कि पार्वती के तप करने पर सप्तर्षि ने पार्वती से जाकर पूछा तुम किस के लिए इतना कठिन तप कर रही हो। तब पार्वती ने सकुचाते हुए कहा आप लोग मेरी मुर्खता को सुनकर हंसेंगे। मैं शिव को अपना पति बनाना चाहती हूं। पार्वती की बात सुनकर सभी ऋषि हंसने लगे और बोले की तुमने उस नारद का उपदेश सुनकर शिव को अपना पति माना है जो सब कुछ चौपट कर देता है। ऐसे वर के मिलने से कहो तुम्हें क्या सुख मिलेगा। सप्त ऋषियों ने कहा कि हमारा कहा मानो हमने तुम्हारे लिए बहुत अच्छा वर चुना है। हमने तुम्हारे लिए जो वर चुना है, वह लक्ष्मी का स्वामी और बैकुंठपुरी का रहने वाला है। तब पार्वती उनकी बात सुनकर बोली कहा है कि मेरा हठ भी पर्वत के ही समान मजबूत है। मैं अपना यह जन्म शिव के लिए हार चुकी हूं। मेरी तो करोड़ जन्मों तक यही जिद रहेगी। पार्वती की यह बात सुनकर सभी ऋषि बोले आप माया हैं और शिव भगवान हैं। आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता है। प्रतिदिन भारी संख्या में श्रद्धालु पशपतिनाथ मंदिर पहुंच रहे है एवं शिव पुराण का धार्मिक लाभ प्राप्त कर रहे है।

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