लेखक: पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्कार, ज्योतिषविद

25 जून 1975
यह सिर्फ एक तारीख नहीं, आज़ाद भारत के इतिहास का वो स्याह पन्ना है जिसने पूरे देश सहित मेरी पुण्य सलिला माँ नर्मदा की गोद में हँसते-मुस्कुराते नगर ‘नर्मदापुरम’ को भी कुम्हाला कर रख दिया। माँ नर्मदा की लहरों का संगीत जैसे अचानक थम गया हो। पूरा शहर सहमा-सहमा सा था, और रातें किसी अनजाने खौफ से डरी-डरी सी गुज़र रही थीं।
सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को कुचलने का फरमान था। किसी को नहीं पता था कि कब, किसे, और कहाँ उठा लिया जाए। कलेक्टोरेट से हर रोज़ पाबंदियों के नए आदेश जारी होते थे। मुझे याद है, तब शायद कलेक्टर यादव साहब थे और जनसंपर्क अधिकारी डॉ. सुशील त्रिवेदी जी। पत्रकारिता पर पहरे बिठा दिए गए थे। दोपहर ठीक तीन बजे हमारी ख़बरों की डाक (कॉपी) कलेक्टर की मेज पर पहुँच जाती थी। शब्दों को छाँटा जाता था, परखा जाता था। सरकार के खिलाफ लिखी एक भी पंक्ति का मतलब था—सीधे जेल या सख्त चेतावनी!
दहशत का आलम यह था कि एक खाकी वर्दी वाले शुभचिंतक पुलिस अधिकारी (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) अक्सर गश्त के दौरान हमें चुपके से चेता जाते—*”कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चले जाओ, वरना मजबूरी में हमें तुम्हें रात के अंधेरे में उठाना पड़ेगा।”*
उन दिनों शाम ढलते ही पूरा शहर घरों में दुबक जाता था। सुबह जब होती, तो सूरज की किरणें पीली और बीमार सी लगती थीं, जैसे सुबह भी गूँगी हो गई हो। हर नागरिक, हर पत्रकार पुलिस के रडार पर था। संदेह की सुइयाँ हर दिल पर चुभ रही थीं।
आज के पड़ाव पर…
आज ईश्वर की असीम अनुकंपा है। उम्र के इस मुकाम पर आकर जब मैं मुड़कर देखता हूँ, तो सुकून मिलता है कि आज पत्रकारिता आज़ाद है। मैं खुलकर साँस ले रहा हूँ, बेबाक लिख और पढ़ रहा हूँ। लेकिन जब-जब अतीत के झरोखे से वो ‘काले दिन और काली रातें’ झांकती हैं, मेरी रूह आज भी भीतर तक सिहर उठती है।
परतंत्रता के उस भयावह दौर को झेलकर ही हम आज इस आज़ादी की कीमत समझ पा रहे हैं।
वन्दे मातरम्!











