- कोयले-पानी के इंजन के उस दौर की एक अद्भुत दास्तान, जब ट्रेन का ड्राइवर प्यासों के लिए पुल पर रोक देता था गाड़ी
- वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार पंकज पटेरिया के अतीत के पन्नों से मां नर्मदा के आंचल और मानवीय संवेदनाओं का एक संस्मरण
- पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं ज्योतिष सलाहकार

नर्मदापुरम/इटारसी। अस्वस्थता भले ही आज मुझे राजधानी भोपाल ले आई हो, लेकिन मेरा मन हमेशा पुण्य सलिला मां नर्मदा के आंचल और उसकी यादों में ही डूबता-उतराता रहता है। मन के किसी कोने में अतीत की बातें और स्मृतियां आज भी उतनी ही जीवंत हैं, जितनी बरसों पहले थीं।
यह संस्मरण उन्हीं दिनों का है, जब पटरियों पर कोयले और पानी से चलने वाले रेल इंजन दौड़ा करते थे। उन्हीं में से एक पैसेंजर ट्रेन थी, जो सुबह-सुबह सूर्योदय के समय इटारसी से चलकर तब के होशंगाबाद (आज के नर्मदापुरम) आती थी। यह करीब 40-45 वर्ष पुरानी बात है, जब शहर में मात्र दो ही प्लेटफॉर्म हुआ करते थे—एक इस तरफ और एक उस तरफ।
बुधनी घाट के ग्रामीणों के लिए ‘महावरदान’ थी वह पैसेंजर
वह सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन भोपाल अप-डाउन करने वाले नौकरीपेशा साथियों के लिए तो वरदान थी ही, लेकिन नर्मदा नदी के उस पार बुधनी घाट के आसपास बसे गांवों के गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए तो सचमुच ‘महावरदान’ थी। उन दिनों पानी का भीषण संकट हुआ करता था। जैसे ही ट्रेन तेज सीटी देती हुई नर्मदा रेलवे पुल पर पहुंचती थी, गुंडी, कसेड़ी और पीतल के बर्तन लिए खड़े ग्रामीणों के चेहरे खिल जाते थे। प्यासे कंठ वाले लोग इस ट्रेन को चाव से ‘पानी देने वाली गाड़ी’ कहते थे।
संवेदना की पराकाष्ठा: जब लोगों के लिए रुक जाता था पहिया
रोज का दृश्य अद्भुत होता था। ट्रेन का दयालु ड्राइवर भी वहां खड़े लोगों की पीड़ा को बखूबी समझता था। वह रोज अपनी मर्जी से कुछ मिनटों के लिए ट्रेन को नर्मदा पुल पर ही रोक दिया करता था। गाड़ी रुकते ही पानी भरने वाले लोग बर्तनों के साथ उमड़ पड़ते थे। इंजन से मिलने वाले पानी को बर्तनों में भरकर वे ग्रामीण कितने प्रसन्न होते थे, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसके हृदय में आज के इस भागदौड़ वाले जमाने में थोड़ी सी भी संवेदना बची हो।
‘नर्मदे हर’ के जयघोष के साथ आगे बढ़ती थी जिंदगी
पानी पाकर ग्रामीण अत्यंत कृतज्ञता और आभार के साथ ‘नर्मदे हर’ का जयघोष करते थे। वह सहृदय ड्राइवर भी मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर ‘नर्मदे हर’ कहता और गाड़ी को आगे स्टेशन की ओर बढ़ाता था। उन दिनों बुधनी से इस ट्रेन के पीछे एक और अतिरिक्त इंजन लगाया जाता था, जिसे रेलवे की भाषा में ‘बैकर’ कहते हैं। यह पीछे से ट्रेन को धक्का लगाता था, ताकि ट्रेन आसानी से आगे की पहाड़ी वाले ट्रैक (घाट सेक्शन) को चढ़ सके। स्टेशन पर पीछे बैकर इंजन लगता और ट्रेन भोपाल की ओर सरक जाती।
कल की कल कहां रुकती है…
इस बात को बरसों-बरस बीत गए। आज कोयले के इंजन इतिहास बन चुके हैं, हमारा शहर विकास के पथ पर तेजी से दौड़ रहा है और आज घर-घर में सुविधाएं मौजूद हैं। वक्त का पहिया घूम चुका है और सच ही है कि कल की कल कहां रुकती है! लेकिन, स्मृतियों के कैनवास पर छपी वह मानवीय संवेदना आज भी फीकी नहीं पड़ी है। मेरे ‘यादों के स्टेशनÓ से वह ‘पानी वाली ट्रेनÓ आज भी रोज उतनी ही जीवंतता के साथ गुजरती है।










