– पंकज पटेरिया (वरिष्ठ पत्रकार)

इन्हीं दिनों की बात है। लगभग चार दशक पहले मैं नर्मदापुरम (तत्कालीन होशंगाबाद) में राजधानी के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत था। उस वर्ष समूचा जिला भीषण सूखे की चपेट में था। रिमझिम फुहारों का सावन का महीना बीतने को आया था, लेकिन बारिश का नामोनिशान न होने से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका था।
खेतों में गहरी दरारें पड़ चुकी थीं और जीवनदायिनी मां नर्मदा के आंचल में रेत के टीले उभर आए थे। क्या इंसान, क्या पशु-पक्षी, बारिश न होने से हर कोई व्याकुल था। लोग अपने-अपने तरीके से इंद्रदेव और भगवान शिव को मनाने में जुटे थे। कहीं मेंढक-मेंढकी का विवाह रचाया जा रहा था, तो कहीं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और टोने-टोटके जारी थे।
इसी बीच सूचना मिली कि प्रसिद्ध सेठानी घाट स्थित सिद्ध ‘पंचमुखी शिव मंदिर’ में सैकड़ों श्रद्धालु बारिश की आस में एक अद्भुत और कठिन अनुष्ठान कर रहे हैं। खबर मिलते ही मैं अपने प्रेस फोटोग्राफर और कवि मित्र प्रेम सोलंकी को साथ लेकर तुरंत सेठानी घाट पहुंचा।
वहां का विहंगम और आस्था से सराबोर दृश्य देखकर हम भी अभिभूत हो गए। श्रद्धालुओं की भगवान पंचमुखी शिव से एक हठीली अर्ज थी—“हे महादेव! जब तक आप बारिश नहीं कराएंगे, हम नर्मदा जल से आपको जलमग्न करते रहेंगे।”
सुबह से दोपहर ढलने को थी, सूरज आग उगल रहा था, लेकिन पसीने से लथपथ शिवभक्तों के उत्साह में रत्ती भर भी कमी नहीं थी। भक्तों की कतारें सीढ़ियों से नीचे उतरतीं, बाल्टी, गागर और गुंडी में नर्मदा जल भरतीं और ऊपर लाकर मंदिर में उड़ेल देतीं। जल को बाहर निकलने से रोकने के लिए मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार को सीमेंट से अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया था। जल का स्तर धीरे-धीरे बढ़ते हुए पंचमुखी शिव जी के मूल विग्रह और जलेरी तक पहुंचने लगा था।
और तभी… मानो आस्था की जीत हुई। सहसा आसमान में घनघोर बादल गरजने लगे, बिजलियां तड़कने लगीं। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे स्वयं महादेव ने प्रसन्न होकर अपना डमरू बजा दिया हो।
देखते ही देखते मूसलाधार झमाझम बारिश शुरू हो गई। घाट पर मौजूद हजारों श्रद्धालु खुशी से झूम उठे और ‘हर-हर महादेव’ व ‘नर्मदे हर’ के जयकारों से पूरा तट गुंजायमान हो उठा। आनन-फानन में सीमेंट से बंद किया गया मंदिर का द्वार तोड़ा गया। भगवान पंचमुखी महादेव की विशेष पूजा-अर्चना शुरू हुई और श्रद्धालुओं ने उत्साह में मक्खन, मिश्री व मेवों की न्योछावर कर दी। चारों ओर एक अत्यंत आह्लादकारी और दिव्य वातावरण निर्मित हो गया था।
इस घटना को बीते एक मुद्दत हो गई है, लेकिन आज भी जब सावन की घटाएं घिरती हैं, तो वह मनोहारी और अलौकिक दृश्य मेरी आंखों के सामने वैसा ही जीवंत हो उठता है।
हर नर्मदे!











