कुदरत के डाकिए क्यों नहीं पड़ते बीमार..?

कुदरत के डाकिए क्यों नहीं पड़ते बीमार..?

पंकज पटेरिया :
क्यों नहीं पढ़ते बीमार परिंदे? क्या यह सवाल कभी आपके दिलो-दिमाग पर नहीं कोंधा? कुदरत के डाकिए मौसम की हर चिट्ठी आपके घर आंगन में समय पर डालते रहते, पर कभी आपने उन्हें अस्वस्थ होते नहीं देखा होगा। इसका सीधा साधा जवाब और कारण है उनकी लाइफ स्टाइल। प्रकृति के साथ उनका तारतम्य। उनकी सारी दिनचर्या कुदरतन है। जब प्रकृति अलस भोर में पलक झपकते उठती है, मंद मंद बहती है, मलयानिल प्रभाती गाती उठाती है। तभी ची ची चू चू की कर्णप्रिय मधुर स्वर लहरियां वातावरण में मोहक मधुर संगीत घोलती, हमे शुभ प्रभात कहती है।
वे भी उदर पोषण, आहार, घर परिवार का पेट भरने का उपक्रम साधते रोजमर्रा की तरह हम मनुष्य के समान, संघर्ष करने निकल जाते। गर्मी, जाड़ा, बरसात उन्हें भी परेशान करते हैं। लेकिन पेट की रोटी के लिए उनका भी युद्ध चलता रहता है। गाहे-बगाहे अगर तबीयत नाशाद हुई तो यह परिंदे प्राकृतिक चिकित्सा ही करते देखे जाते हैं। कभी धूल गर्द में लौटते अथवा घास फूस पत्ते की मेडिसन लेकर यह भले चंगे हो जाते हैं और फिर अपने पंख फैलाकर जिंदगी का गीत गाने लगते हैं।
आज जबकि बहुत सी सुख सुविधा के बीच मिनरल वाटर पीकर, महंगी मेडिसिन खा कर अपनी सेहत ठीक नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी सूरत में जरूरी है कि हम अपने दादी, नानी की लंबी उम्र को, उनकी दिनचर्या को याद करके अपनी जड़ों की ओर लौटे। अपनी परंपरा विरासत को याद करे, पशु पक्षियों की लाइफस्टाइल से प्रेरणा ले और रोज जिंदगी को गर्मजोशी से वेलकम करें। चुस्त दुरुस्त रहने के लिए।

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