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ना तुम हमें जानो… सुमन कल्याणपुर की गायकी हमेशा के लिए अमर हो गई

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“ना तुम हमें जानो, न हम तुम्हें जानें…”

अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

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अखिलेश शुक्ला

हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा गीत होगा जिसने अपनी गायिका के साथ इतना बड़ा मज़ाक किया हो। दशकों तक लाखों लोग इस गीत को सुनते रहे और मानते रहे कि यह लता मंगेशकर ने गाया है। फिर जब सच पता चला तो वे सुखद आश्चर्य से भर उठे — यह आवाज़ किसी और की थी। यह आवाज़ थी सुमन कल्याणपुर की।

और शायद यही सुमन कल्याणपुर की पूरी कहानी भी है। एक ऐसी गायिका जिसकी पहचान अक्सर उसकी आवाज़ से पहले किसी और के संदर्भ में की गई। लेकिन जिसने कभी शिकायत नहीं की, कभी प्रतिवाद नहीं किया, कभी तुलना की लड़ाई में उतरने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस गाया — अपने ढंग से, अपनी गरिमा के साथ, अपनी पूरी क्षमता से। 31 मई 2026 को सुमन कल्याणपुर इस दुनिया से चली गईं। लेकिन जाते-जाते वह भारतीय सिनेमा को यह याद दिला गईं कि इतिहास सिर्फ़ सबसे ऊंची आवाज़ों से नहीं बनता, बल्कि उन सुरों से भी बनता है जो विनम्र होते हैं, संयमित होते हैं और समय के साथ और अधिक सुंदर होते चले जाते हैं।

कलाकार की बिरादरी से नहीं, दिल से आया संगीत

सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को ढाका हुआ था। उनका असली नाम सुमन हेमाडी था। बचपन में ही उनका परिवार मुंबई आ गया, जहाँ उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई की। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि सुमन जी ने J.J. स्कूल ऑफ आर्ट्स से पेंटिंग की पढ़ाई की थी। वह एक कलाकार बनना चाहती थीं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पेंटिंग के दौरान उन्हें तारपीन के तेल से एलर्जी हो गई। यह एलर्जी ही वह मोड़ बनी जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। धीरे-धीरे संगीत में उनकी रुचि बढ़ी और उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे दिग्गजों से संगीत की शिक्षा ली। संगीत की इस यात्रा की शुरुआत में उन्हें किसी ने पहचाना तो था — और वह थे खुद तलत महमूद।

तलत महमूद ने पहचानी प्रतिभा

एक संगीत समारोह में सुमन की आवाज़ सुनकर तलत महमूद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके साथ युगल गीत गाने की सहमति दे दी। फिल्म ‘दरवाज़ा’ के लिए रिकॉर्डिंग के दौरान सुमन बेहद रोमांचित थीं। तलत साहब उनके लिए सिर्फ़ एक गायक नहीं, बल्कि सौंदर्य और मधुरता के प्रतिमान थे। तलत महमूद ने ही सबसे पहले यह भविष्यवाणी की थी कि सुमन कल्याणपुर एक दिन कामयाब पार्श्वगायिका बनेंगी। और यह भविष्यवाणी सच भी हुई।

वह गीत जिसने पूरे देश को भ्रमित कर दिया

सुमन कल्याणपुर के करियर का सबसे बड़ा मोड़ आया 1962 की फिल्म ‘बात एक रात की’ के गीत “ना तुम हमें जानो” के साथ। यह गीत मूल रूप से हेमंत कुमार पहले ही गा चुके थे। अब महिला स्वर में यही गीत सुमन को गाना था। रिकॉर्डिंग से पहले एस. डी. बर्मन ( बर्मन दा) और आर. डी. बर्मन (पंचम दा) ने उन्हें हर नोटेशन विस्तार से समझाया। जब रिकॉर्डिंग शुरू हुई तो दादा बर्मन की छड़ी समुद्र की गंभीर लहरों की तरह चल रही थी। गीत पूरा हुआ तो स्टूडियो तालियों से गूंज उठा। पंचम दा ने कहा कि उनका गायन इसलिए इतना सुंदर हुआ क्योंकि वह बिल्कुल भी आत्मचेतस नहीं थीं।

और फिर वही हुआ — लोगों ने समझा कि यह गीत लता मंगेशकर ने गाया है।

यह भ्रम इतना गहरा था कि दशकों तक लोग इस गीत को सुनते रहे और लता जी का नाम जोड़ते रहे। संगीत के पारखी भी दोनों की आवाज़ों में फर्क नहीं कर पाते थे।

“मैंने कभी किसी की नकल नहीं की”

सुमन कल्याणपुर पर अक्सर यह आरोप लगता था कि उनकी आवाज़ लता जी से बहुत मिलती है। लेकिन सुमन जी का अपना दृष्टिकोण बिल्कुल साफ था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “मेरी आवाज़ लता ताई से मिलती-जुलती ज़रूर है, लेकिन एक पारखी श्रोता दोनों में अंतर पहचान सकता है। मैंने कभी किसी तुलना की परवाह नहीं की और कभी किसी की नक़ल नहीं की। मेरा विश्वास हमेशा अपनी शैली में गाने पर रहा।”

उनकी यह बात पूरी तरह सच थी। हालाँकि उनकी आवाज़ में लता जैसी तीक्ष्णता नहीं थी, लेकिन उसमें एक कोमलता, एक अनोखी नाज़ुकी थी। उच्च सुरों पर जहाँ लता जी क्रिस्टल-क्लियर चमक के साथ गाती थीं, वहीं सुमन जी का गायन अधिक कोमल, अधिक भावुक होता था। श्रोताओं को अंतर दिखता नहीं था, लेकिन संगीतकार जानते थे। और इसीलिए सलील चौधरी, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन और नौशाद जैसे दिग्गजों ने उनके साथ काम किया।

संघर्ष के वे पहलू जो कम लोग जानते हैं

सुमन कल्याणपुर ने अपने करियर में लगभग 740 से अधिक गीत रिकॉर्ड किए। उनमें से 140 से अधिक युगल गीत मोहम्मद रफी के साथ थे। उन्होंने हेमंत कुमार, मन्ना डे, मुकेश जैसे दिग्गजों के साथ भी युगल गीत गाए। लेकिन उनके साथ अन्याय भी हुए।अपने आखिरी इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया था कि कई बार उनके गाए गीत फिल्मों से हटा दिए गए। कई बार गीत तो फिल्म में थे लेकिन रिकॉर्ड्स में नहीं। कई बार रेडियो पर उनके गीत बजते थे लेकिन श्रेय किसी और को दे दिया जाता था। और फिर भी  कभी उन्होंने शिकायत नहीं थी। जब पूछा गया तो उन्होंने कहा, “मैंने जो गाने गाए, उनमें से 70 फीसदी हिट रहे। यही मेरी संतुष्टि है। जो नहीं मिला, वह मेरी किस्मत में नहीं था। मुझे कोई मलाल नहीं है।”

लता जी के साथ वह खास रिश्ता

यह मत सोचिए कि सुमन और लता जी में कोई रंजिश थी। बिल्कुल नहीं। जब सुमन जी सिर्फ 13 साल की थीं, तब वह अपनी सहेलियों के साथ लता जी के घर के सामने से जानबूझकर गुज़रती थीं, बस उनकी एक झलक पाने के लिए। बाद में जब वह खुद एक गायिका बन गईं, तो लता जी ने उनके साथ बड़ी गर्मजोशी से व्यवहार किया। एक बार रिकॉर्डिंग के बाद जब सुमन के पिता चले गए, तो लता जी ने खुद उन्हें कार से घर छोड़ा। उस सफर को सुमन जी जीवनभर याद करती रहीं।

लता जी के साथ अपने रिश्ते पर उन्होंने एक बार मज़ाक में कहा था, “लगता है हम दोनों भगवान के पास साथ-साथ गए होंगे माँगने के लिए, और उन्होंने हमें आधा-आधा दे दिया होगा। बस वह (लता जी) पहले आ गईं।”

सम्मान और पहचान — देर से सही

सुमन कल्याणपुर को कभी फिल्मफेयर पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर तब पहचान मिली जब 2023 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाजा था। इसके अलावा, उन्हें तीन बार सुर श्रृंगार संसद पुरस्कार मिला — 1964, 1967 और 1969 में, जो उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ शास्त्रीय-आधारित फिल्मी रचनाओं के लिए था।

सुमन कल्याणपुर की असली विरासत

सुमन कल्याणपुर सिर्फ एक गायिका नहीं थीं। वह एक उदाहरण थीं — उस सादगी और विनम्रता की मिसाल, जो आज के वक्त में बहुत दुर्लभ है। उन्होंने हिंदी, मराठी, बंगाली, पंजाबी, कन्नड़, असमिया, भोजपुरी, उड़िया सहित दर्जनों भाषाओं में गीत गाए। उनका गायन हर भाषा में, हर धुन में अपना एक अलग जादू बिखेरता था। जब 31 मई 2026 को उनका निधन हुआ, तब महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी।

निष्कर्ष

आज जब सुमन कल्याणपुर हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके बारे में लिखते हुए बार-बार वही गीत कानों में गूंजता है —

“ना तुम हमें जानो…”

लेकिन सच यह है कि भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास ने उन्हें पूरी तरह कभी जाना ही नहीं। संगीत की दुनिया में कुछ आवाज़ें सूरज की तरह होती हैं — जिनकी चमक सबको दिखाई देती है। और कुछ आवाज़ें चांदनी की तरह होती हैं — जो धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरती हैं, रात भर साथ निभाती हैं, और कभी शिकायत नहीं करतीं।

सुमन कल्याणपुर ऐसी ही चांदनी हैं। और यह चांदनी हमेशा फिल्म जगत को शीतलता देती रहेगी। चाहे रेडियो पर उनके गीत बजें या न बजें, चाहे रिकॉर्ड्स में उनका नाम हो या न हो — वह गाती रहेंगी। उन सुरों में, उन यादों में, हर उस दिल में जिसने कभी उनकी आवाज़ को पहचाना — चाहे गलती से ही सही।

आपको सुमन कल्याणपुर का कौन सा गीत सबसे प्रिय है? क्या आप भी उन्हें लता जी समझ बैठे थे? कमेंट में जरूर बताएं।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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