प्रसंग: पितृपक्ष…नाव घाट से अब नहीं आती

प्रसंग: पितृपक्ष…नाव घाट से अब नहीं आती

बचाव बचाव की डरावनी आवाजे…

पंकज पटेरिया/पितृ पक्ष चल रहा है। पुण्य सलिला नर्मदा जी तट पर कोरोना काल के कारण सावधानी ओर नियम कायदों का पालन करते हुए लोग दिवंगत आत्मीय जन को जल तर्पण श्राद्ध कर्म आदि कर रहे है। भारतीय संस्कृति में इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से आत्मा की शांति के लिये किए जाने वाला शास्त्र सम्मत आवश्यक विधान बताया गया है। यह कर्म तिथि के हिसाब किए जाते हैं जिनकी तिथि ज्ञात नहीं, उनकी पितृ मोक्ष अमावस्या को, और अकाल हुई अज्ञात दिवगंत हुए लोगो की आत्माओं की शांति के लिए भी शांति पूजा आदि जानकार विद्वान पंडितो द्वारा की जाती है। नहीं होने की स्थिति में अतृप्त आत्माओं को शांति नहीं मिलती,और कष्ट होता है। ओर तरह तरह विघ्न बाधाए आती है। इस तरह मान्यता है।

प्रसंगवश इसी तरह की एक दर्दनाक नाव दुर्घटना में अकाल हुई लोगो की मृत्यु और उनके शांति कर्म नहीं होने से जन साधारण को हुई भीषण परेशानी का विवरण यह है। नर्मदा जी के प्रसिद्ध नाव घाट पर तब कैसा दहशत भरा साया छाया था, कितने डरे-डरे रहते थे लोग। पितृ मोक्ष अमावस्या खग्रास सूर्यग्रहण तथा एक कोई और योग था। मैं दैनिक भास्कर का होशंगाबद प्रतिनिधि था।

2 अक्टूबर 1977-78 की घटना है संभवतः याद हैं। महा पुण्य पर्व के कारण बड़ी संख्या में बैतूल, रायसेन, सीहोर, नरसिंहपुर से श्रद्धालु नर्मदा जी स्नान करने आए थे। प्रशासन ने भी अपने स्तर सुरक्षा प्रबन्ध करे थे। सुबह सात आठ के आसपास की बात है। दो नाव में बड़ी संख्या में लोग सवार हुए,नाव कुछ दूर ही उस पार जाने के लिए आगे बड़ी ही थी कि बीच नर्मदा में बड़ी सख्या के वजन के कारण डूब गई। सब तरफ हाहाकार मच गया शोर शराबा बचाओ-बचाओ चिल्लाते छटपटा ते डूब रहे थे लोग।  मठ मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. गोपाल प्रसाद खडर बताते है मेंने देखा पूजापाठ का मनोहारी वातावरण पलभर में मातम में बदल गया था । जो तैर सकते थे वे किनारे आने लगे, ओर जिन्हें लोग बचा पाए वे बच सके। बाकी की नर्मदा में जलसमाधि हो गई। सेठानी घाट पर लाइन से नर्मदा जी में से शवों को ला कर रखा गया था। पूरा नगर गहरे शोक में डूब गया था। धीरे धीरे स्थिति सामान्य हो गई।

लेकिन नाव घाट से लगे रहवासी मोहल्ले के लोग रात गहन सन्नाटे में नाव घाट से अचानक आती बचाओ-बचाओ की डरावनी आवाजो से डरने घबराने लगे। तवियत भी बिगड़ने लगी। पहले इसे वहम समझा गया, लेकिन जब चाहे जो यह तकलीफ बताने लगा । चिंता बढ़ गई। पत्रकारों ने खबरे लगाई। अंत में नगर के विद्वान पुरोहितो ने मसले पर गहन विचार किया। तपो मूर्ति नर्मदा जयंती महोत्सव के संस्थापक पूज्य पाद श्री राधे महाराज आगे आए प्रख्यात लेखक श्री हरि हर व्यास समाज सेवी स्व. ज्ञानी भाई ओर अन्य लोग सहयोगी बने। अकाल मृत्यु हुए लोगो की आत्मा की शांति के लिए पूजन आदि कर्म किया गया, तब वे डरावनी आवाजे आना बन्द हुई। साहित्यकार समाज सेवी विश्वबन्धु द्विवेदी हरीओम दीक्षित बताते है कि कई प्राचीन मंदिरों के साथ ग्यारह मुखी हनुमान जी का मन्दिर अब यहां बन गया और बहुत ही भक्ति पूर्ण मनोहारी वातावरण अब सदा रहता है। सुंदर घाट सुरम्य दृश्य देख कर मन को असीम शांति और सुख मिलता है।नर्मदे हर के पावन जयघोश चतुर्दिक अलौकिक सृष्टि रचते है।

पंकज पटेरिया(Pankaj Pateria)
वरिष्ठ पत्रकार/कवि
संपादक: शब्दध्वज
होशंगाबाद
9893903003

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