कविता: सपने

कविता: सपने

सत्येंद्र सिंह(Satyendra singh)

ऐसा लगता है अंदर भी रतौंधी आ गई है,
सारे सपने धुंधले धुंधले दिखते हैं,
लोगों ने जो सपने दिखाए थे
उनका अंबार लग गया है
और एक दूसरे में गड्डमगड्ड हो गए हैं।
मैं उनमें ढूंढता हूं अपना सपना
सोचता हूं कब /क्या, देखा था सपना।
न देख पाता हूं/न पहचान पाता हूं
अपना सपना।
अतीत मुखर हो जाता है/
क्या करोगे भविष्य का/सपने का
तुम्हारे सपनों मै ही तो हूं—
युगों युगों तक विस्तृत,
मुझसे ही बनीं हैं सारी पुस्तक।
बांचो और उनमें डूब जाओ
सपने देखना भूल जाओ।
तभी वर्तमान कह उठता है
मैं नित्य हूं/सत्य हूं/जीवन हूं
मैं ही अतीत था
मै ही भविष्य होऊंगा
अतीतजीवी न बन
तुम्हारे सपने पैदा हुए हैं
कभी ईर्ष्या से/कभी द्वेष से
और तुम्हारा अतीत भी
इन्हीं से भरा हुआ है,
तुमने स्वयं कभी नहीं देखा कोई सपना
जिसे तुम कह सको अपना।
अब बाहर भी-
मुझे सब कुछ धुंधला सा लगता है,
आंख बंद कर सोने का प्रयास करता हूं/
देखने अपना सपना/क्योंकि
खुली आंख से नहीं देखे जाते
सपने।

सत्येंद्र सिंह, पुणे महाराष्ट्र

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    सपनों की दुनिया का आभासी विश्लेषण, बहुत बढिया।

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    विश्लेषण बढिया।

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