समीक्षा : काव्य संग्रह ‘फ़र्क पड़ता है’- के.पी.सत्यानंदन

समीक्षा : काव्य संग्रह ‘फ़र्क पड़ता है’- के.पी.सत्यानंदन

सत्येन्द्र सिंह की अनुभूत सच्चाइयों की अभिव्यक्ति है

मेरे मित्र सत्येन्द्र सिंह द्वारा रचित ‘फ़र्क पड़ता है’ नामक काव्य संग्रह पढ़ने का सुअवसर मिला। वैसे काव्य संग्रह पढ़ने की मुझे आदत नहीं है। लेकिन मेरे मित्र द्वारा भेजी गई ‘फ़र्क पड़ता है’काव्य संग्रह की पहली कविता पढ़ने के पश्चात मुझमें उनकी इस काव्य-संग्रह में संकलित सभी 70 कविताएं पढ़ने की जिज्ञासा जागृत हुई। वास्तव में बहुत दिनों के बाद इतनी अच्छी, मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी कविताएँ पढ़ने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था। इसमें संकलित सभी कविताएं साधारण से असाधारण का अन्वेषण है। कविता किसी भी रूप में हों, इसका हर रूप हमारे जीवन को, हमारी संस्कृति को और हमारे जीवन मूल्यों को एक सार्थक दिशा प्रदान करती है। कविता वास्तव में एक दिव्य शक्ति है, यह चिंतन की समस्त प्रणालियों का मूल भी है और फूल भी।

कवियों के लिए अनुभव महत्त्वपूर्ण है। अतः यह कविता संग्रह अनुभूत सच्चाइयों की अभिव्यक्ति कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं है। उनका प्रयास तो केवल जीवन के स्पंदन और गहरे मर्म को उद्घाटित करने का रहा है। इस काव्य संग्रह को सत्येन्द्र सिंह की रचनाशीलता की गहरी पहचान स्थापित करने वाले प्रतिनिधि और विशिष्ट कविताएँ कहा जा सकता है। उन्होंने आमुख में निःसंकोच भाव से अपने जीवन के अभावों को स्वीकार किया है। जिन घटनाओं और विचारों ने कवि की संवेदना को छुआ है, उनकी चर्चा खुले ह्रदय से उसने की है। इनकी भाषा इनके ह्रदय जैसी ही सरल है।

श्री सत्येद्र की कविताओं की प्रवृति और संवेदना के स्वरूप में एक नयापन दिखाई देता है। लगता है कि पाठक को झकझोरना उनका साहित्यिक उद्देश्य रहा है। सभी कविताएँ भावपूर्ण और मार्मिक है और अधिकतर कविताएँ दैनिक जीवन की घटनाओं पर आधारित और उद्देश्य प्रधान भी हैं। विषय वस्तु की दृष्टि से ये कविताएँ जीवन और समाज के यथार्थ का विश्लेषण करती हैं। श्री सत्येद्र ने इसी ओर संकेत करते हुए अपनी ‘फ़र्क पडता है’ शीर्षक कविता में यह कहने का प्रयास किया है कि नए शासन से जनता में अच्छे दिन देखने की आशाएँ बँधी थी, लेकिन अब लगता है कि कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला नहीं है, मुखौटे लगाए ये शासक भी पुराने शासकों जैसे ही है।

सत्येन्द्र सिंह ने अपने कवि-धर्म का पूरी ईमानदारी से पालन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह पाठक को झकझोरना तथा समाज को सचेत करना चाहता है। पूरा काव्य संग्रह पढ़ने पर, मैं कह सकता हूँ कि वह मानव मूल्यों का कवि है। जनता के दुःख दर्द का कवि है। बोलचाल की भाषा को अपनी कविता में साधकर उन्होंने सहजता और संप्रेषणीयता का प्रतिमान गढ़ा है। सत्येन्द्र सिंह की अभिव्यक्ति कौशल, समृद्ध भाषा, प्रचुर कल्पना, नया प्रतीक एवं बिंब- विधान आदि ऐसी काव्यगत उपलब्धियाँ जो उन्हें काव्य क्षेत्र में एक विशिष्ठ कवि के रूप में स्थापित करेगी। विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में इस काव्य संग्रह को पाठ्य पुस्तक के रूप में भविष्य में शामिल करेंगे, ऐसी मेरी कामना है । ऐसी कविताओं से छात्रों में ऊर्जा का संचलन होगा, चिंतन और मनन करने के लिए मजबूर करेंगे। विस्तृत समीक्षात्मक अध्ययन के लिए उन्हें मंच उपलब्ध होगा।

उनके व्यंग का लक्ष्य व्यक्ति विशेष न होकर तत्कालीन स्थितियाँ हैं। दरअसल उनके काव्य में तत्कालीन समाज बोलता है। उन्होंने जीवन की खेती करके कविता को उगाया है। समकालीन मनुष्य जीवन और जगत से संदर्भित संश्लिष्ट अनुभवों और वेदनाओं को समेटे उनकी कविताएँ सामाजिक आग्रह के अधीन मानवता से जुडती है। इसे पढ़कर लगता है जैसे आप कविता का पठन नहीं, बैठे-बैठे किसी से बात-चीत कर रहे हैं।
उनकी ‘फ़र्क पड़ता है’ ‘शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए-
मुझे क्या फ़र्क पड़ता है
जब सीमा पर
कोई जवान गोली खाता है
और
शहीद हो जाता है। 
मुझे फर्क पड़ता है तब
जब शहीद का आठ वर्षीय बालक
पिता के दाह संस्कार के बाद 
मैं भी अपने पिता के समान
बहादुर बनूंगा
तब बहुत फ़र्क पडता है….

कविता की समस्त विशेषताएँ उनके इस काव्य संग्रह में मौजूद है। एक तरफ़ वह व्यक्तिगत सुख-दुःख को कविता में बाँटते चलते हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक घात-प्रतिघातों का चित्रण कर चारों तरफ व्याप्त विसंगतियों को चित्रित करते हैं। इसी प्रकार इसमें संकलित ‘हुनर‘, ‘वर्षा’,’दीपक’, ‘अनुभव’,’पगड़डी और सडक’,’अभिव्यक्ति के बिंब’, ’तुम नहीं होते’, ’पितृपक्ष’,’स्वीकृति’,’भारत’,’भारतीय सैनिक’,’जीवन’,’इंतजार’,’मुश्किल’ जैसी अनेक कविताएँ हमें सोचने और चिंतन करने में मज़बूर करते हैं। ग्रामीण जीवन के अनेक प्रयोग और प्राकृतिक परिवेश का सुंदर समन्वय इसमें दिखाई पड़ता है।
श्री सत्येन्द्र ने कविता की अंतर्वस्तु को रूप से अधिक मूल्यवान माना है। रूप विधान के अनुशासन में उन्होंने विषय की तीव्रता को दबाना उचित नहीं समझा। इसलिए उन्होंने कृत्रिम भाषा में नहीं वरन् जीवन की भाषा में कविताएँ लिखीं है। जहाँ सामान्य से सामान्य शब्दों में उन्होंने गहरा अर्थ भरा। घर-परिवार और आसपास में नित्य घटित होने वाली बेहद साधारण घटनाएँ भी उनकी सजग निगाहों के विशेष दृष्टिकोण पर व्यवस्थित होकर पाठकों के ह्रदय को छूने में सफल हुई हैं। अलग –अलग स्थितियों, परिस्थितियों, घटनाओं पर आधारित अलग-अलग रंगों से रंगी कविताएँ इसमें संकलित हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाठकों को इन्हें अवश्य पसंद आएंगी। ’रेल का दर्द’ शीर्षक कविता में उन्होंने जो दर्द प्रकट किया है, वह साधारण दर्द नहीं है, बल्कि अपने 35 वर्ष से अधिक की हिंदी अधिकारी की लंबी रेल सेवा के दौरान अनुभव किया हुआ दर्द है। इसे मात्र रेल का दर्द नहीं मानें,यह स्वतंत्र भारत का भी दर्द है।

समग्रतः इस काव्य संग्रह में सत्येंद्र सिंह ने वर्तमान समय में संत्रास और घुटन भरे वातावरण से उत्पन्न अनैतिकता के भीषण परिणाम की ओर भी संकेत किया है। रचनाकार सामाजिक विसंगतियों एवं विषमताओं को जितनी तीव्रता के साथ अनुभूतिजन्य कसौटी पर कसता है, उतनी ही प्रभावी एवं सक्षम होकर वे प्रकट होती हैं तथा पाठकों को अभिभूत करती हैं। श्री सत्येंद्र सिंह की भाषा सरल,सरस और प्रभावशाली और सब के समझ में आनेवाली है। शब्द विन्यास में सहजता, चित्रमयता और सजीवता लाने में उन्हें विशेष सफलता मिली है। विषय की गंभीरता, रोचकता आदि के अनुरूप भाषा को ढालने में श्री सत्येंद्र सिंह सिद्धहस्त है। श्री सत्येंद्र सिंह की भाषा शैली में जो सहजता, स्वाभाविकता, प्रवाह तथा स्थानीय शब्दों का प्रयोग पाते हैं, उनसे काव्य-विधा जीवन से सर्वाधिक संश्लिष्ट हो सकी है और यही उनकी सफलता का रहस्य भी है। आशा है कि भविष्य में भी सत्येंद्र सिंह की और बेहतर कविताएँ पढ़ने का हमें अवसर मिलता रहेगा। श्री सत्येंद्र सिंह इसी तरह साहित्य-सर्जन करते हुए हिंदी भाषा के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों की कोटि में अपना नाम रोशन करे, यही मेरी शुभकामना है।
पुस्तक के मुखपृष्ठ के लिए प्रज्ञा भूपेंद्र सिंह का प्रयास बहुत ही सराहनीय है। उत्कृष्ट कागज पर उत्कृष्ट मुद्रण प्रकाशन के जवाहर पुस्तकालय प्रकाशन, सदर बाज़ार, मथुरा बधाई का पात्र है।

 

समीक्षा
के.पी.सत्यानंदन, पूर्व निदेशक, राजभाषा
रेल मंत्रालय, रेलवे बोर्ड,
नई दिल्ली

काव्य संग्रह
सत्येंद्र सिंह (Satendra Singh)
सप्तगिरी सोसायटीजांभुलवाडी रोड,
आंबेगांव खुर्द पुणे 411046

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COMMENTS

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    बहुत समर्पक समीक्षा, हर दृष्टिकोण को परिचित करती समीक्षा। बधाई!

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      सत्येंद्र सिंह 1 month

      बहुत बहुत धन्यवाद मैडम।

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    Narmadanchal

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